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Thursday, August 30, 2018

कबहूँ बैंक के बाबू देते दिलासा।

नरोत्तम दास की प्रसिद्ध कविता 'सुदामा चरित्र' की लयताल पर आधारित है-
सीस पगा न झगा तन में,
प्रभु जाने को आहि बसे केहि ग्रामा।

लाइन लगी कि लगी न लगी,
कि, नोट बदलने की है नहि आशा।
लोग लगे वो लगे कहने-
चहुँओर है छायी घोर निराशा।
नोटबंद से ग़रीब-किसान का'
घाटा हुआ है अच्छा-ख़ासा।
पुलिश बजाती थी लठ्ठ कि,
कबहूँ बैंक के बाबू देते दिलासा।
'मन की बात' रेडियो से कहकर,
'चौकीदार' ने सबको फाँसा।
मीठे-मीठे बोल बोल अब,
वित्त मंत्री जी देते हैं झांसा।
भक्त मंडली श्राप देति 'शिशु'
जैसे देते थे ऋषि दुरवासा।
काला धन है आया नहीं,
कुल बीत गए कितने चौमासा।

Thursday, October 26, 2017

गदहे को पंजीरी बांट प्रभु, इंसान के आगे घास करो।।

विकास की कोई न आस करो,
हैं फ़ेल तो फ़िर भी पास करो।
सब भक्त बनो, गुणगान करो,
भगवान को यूं न निराश करो।।

सरकार को परमेश्वर माना-
तब आँख मूंद विश्वास करो।
गदहे को पंजीरी बांट प्रभु,
इंसान के आगे घास करो।।

सब बंद पुराने नोट करो,
यह अर्थव्यस्था नाश करो।
आलोचक को सूली दे दो,
लेकिन उनका न ह्रास करो।।

जनता पर कर्ज़ डाल भारी,
जीते जी सबको लाश करो।
है एक गुज़ारिश और 'शिशु'
जनता का न उपहास करो।

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