धन्ना सेठ पधारे दिल्ली धन-दौलत के चक्कर में,
पूँजी सभी लगाई उसने महंगी जो है शक्कर में।
उधर खरीदी सदर मार्केट इधर बेंच दी फुटकर,
बेटे-बाप सभी धंधे में लगे हुए हैं डटकर।
पिता हमारे बतलाते हैं उनका नमक का धंधा था,
पैसा उससे बहुत बनाया जबकि नमक तब मंदा था।
बीस साल हो गए गाँव से जब वो आए दिल्ली,
सभी गाँव वालों ने उनकी तब उडाई थी खिल्ली।
धन्ना सेठ गाँव में अब हैं सबसे पैसे वाले,
गाँव में महल खड़ा हैं उनका जंहा जड़े हैं ताले।
दिल्ली में भी कोठी उनकी अच्छे दो हैं बंगले,
पर धन्ना के नज़रों में धन्ना अब भी कंगले।
जो भी गाँव से आता, पहले धन्ना के घर जाता,
खाने-पीने-रहने की सारी सुविधा पा जाता।
धन्ना के घर वाले सारे गरमी में घर जाते,
सारे गाँव को उसदिन वो महंगी दावत करवाते।
'शिशु' कहें सब लोग काश धन्ना काका से होते,
दौलत वाले होकर भी वो नही घमंडी होते।
Friday, November 20, 2009
Wednesday, November 18, 2009
पिल्ला पाल रहे लोगों से विनती एक है मेरी....
पिल्ला पाल रहे लोगों से विनती एक है मेरी,
टीके सब उनको लगवाएं बिना लगाये देरी।
पार्क जाएँ पिल्ले ना लेकर ना सडकों पर खुल्ला छोड़ें,
भाग रहा यदि पिल्ला है तो पीछे-पीछे ख़ुद भी दौड़ें।
अच्छी बात और होगी यदि पिल्ला देसी पालें,
बाँध चैन से उस पिल्ले को उसमे ताला भी डालें।
पिल्ला धोके से यदि काटे किसी व्यक्ति को भाई,
डाक्टर को फिर उसे दिखाएँ स्वयं दिलाएं दवाई।
अन्तिम एक गुजारिश ये है पिल्ला घर पर ही रखें
इधर-उधर न करे वो पोट्टी इसका ध्यान सदा रखें।
टीके सब उनको लगवाएं बिना लगाये देरी।
पार्क जाएँ पिल्ले ना लेकर ना सडकों पर खुल्ला छोड़ें,
भाग रहा यदि पिल्ला है तो पीछे-पीछे ख़ुद भी दौड़ें।
अच्छी बात और होगी यदि पिल्ला देसी पालें,
बाँध चैन से उस पिल्ले को उसमे ताला भी डालें।
पिल्ला धोके से यदि काटे किसी व्यक्ति को भाई,
डाक्टर को फिर उसे दिखाएँ स्वयं दिलाएं दवाई।
अन्तिम एक गुजारिश ये है पिल्ला घर पर ही रखें
इधर-उधर न करे वो पोट्टी इसका ध्यान सदा रखें।
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