Tuesday, September 8, 2009

शराब!

शराब!
बाप पिए तो ठीक, बेटा पिए ख़राब!

जुआरी!
कभी न जीते, कभी न माने हारी!

समाज सेवा!
काम से साथ पैसे की मेवा!

बॉस का दूत!
मुखबिरी की पूरी छूट!

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आंदोलन

यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...