Tuesday, April 3, 2018

अब ऐसी नादानी कुछ...

नज़र-नज़र का फ़ेर 'शिशु'-
होती है हैरानी कुछ।
भरी जवानी में करता हूँ,
अब ऐसी नादानी कुछ।।

फूहड़ता पर बहसें करता,
अपने गाँव की भाषा में।
क्या फ़िर से मैं वहीं बसूँगा?
रहता इस जिज्ञासा में।।
         दिवास्वप्न यदि देख रहा हूँ,
         क्या इसमें है हानि कुछ!
         भरी जवानी में करता हूँ,
         अब ऐसी नादानी कुछ।।

ऊब गया शहरी जीवन से,
चारों ओर उदासी है।
अनजाने लोगों की भीड़,
जीवन कितना बासी है।।
        बोल रहा हूँ ऐसी बोली,
        जो लगती अनजानी कुछ।
        भरी जवानी में करता हूँ,
        अब ऐसी नादानी कुछ।।

बोली-भाषा, दाना-पानी,
जीना मरना धंधा है।
पानी और हवा की क्या!
पर्यावरण ही गंदा है।
      इससे अच्छा तालाबों का
      लगता अच्छा पानी कुछ।
      भरी जवानी में करता हूँ,
      अब ऐसी नादानी कुछ।।

जीतना भी लगा ऐसे आपसे हार जैसा है।

तुम्हारी  चाहतों  का  रस  नहीं  श्रृंगार  जैसा  है,
मधु का रस जिसे समझा, लगे वह खार जैसा है।
भूमिका वीर रस की बाँधना मुझको नहीं आता,
जीतना  भी  लगा  ऐसे  आपसे  हार जैसा है।

Sunday, April 1, 2018

भरी जवानी में करता हूँ, ऐसी अब नादानी कुछ।

नज़र नज़र का फ़ेर समझिए,
होती है हैरानी कुछ।
भरी जवानी में करता हूँ,
ऐसी अब नादानी कुछ।।

फूहड़ता पर बहसें करता,
अपने गाँव की भाषा में।
फ़िर से वहीं बसूँगा जाकर,
जीवन है इस आशा में।।
दिवास्वप्न यदि देख रहा हूँ,
क्या इसमें है हानि कुछ।
भरी जवानी में करता हूँ,
ऐसी अब नादानी कुछ।।

ऊब गया शहरी जीवन से,
चारों ओर उदासी है।
अनजाने लोगों की भीड़,
जीवन कितना बासी है।।
बोल रहा हूँ ऐसी बोली,
जो लगती बेगानी कुछ।
भरी जवानी में करता हूँ,
ऐसी अब नादानी कुछ।।

झूठ नहीं ये सत्य कह रहा,
सारा सब कुछ गंदा है।
बोली भाषा, दाना-पानी,
सारा सब कुछ धंधा है।।
तलब लगी तालाबों की,
अब पीना गंदा पानी कुछ।
भरी जवानी में करता हूँ,
ऐसी अब नादानी कुछ।।

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