Tuesday, November 11, 2008

नौकरी के नौ काम दसवां काम हाँ हजूरी


नौकरी के नौ काम दसवां काम हाँ हजूरी
फिर भी मिलती नही मजूरी
पूरी मिलती नही मजूरी
जीना भी तो बहुत जरूरी
इसीलिये कहते हैं भइया
कम करो बस यही जरूरी

घंटे आठ काम के होते
दो घंटे का आना-जाना
इसी तरह बारह हो जाते
इसको सबने ही है माना

कहने को हम बड़े काम के
फिर भी तो छुट्टी हो जाती
एक बात का और भी गम है
छुट्टी सारी ही कट जाती

कल क्या होगा किसने देखा
आज की बात अभी करते हैं
काम नही होता है जब भी
एक ब्लॉग यूँ ही लिखते हैं

बात लिखी है अभी अधूरी
पढ़कर कर तुम कर दोगे पूरी
ऐसा है विश्वास हमारा
यह नेता का नही है नारा

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

दसवाँ नहीं पहल काम है हजूरी।

Udan Tashtari said...

सही कह रहे हैं दिनेश जी. :)

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