पाला पड़ा गपोड़ों से।
डर लग रहा थपेड़ों से।।
अर्थव्यवस्था पटरी पर
आई चाय पकौड़ों से।
बच्चे बिलखें कलुआ के,
राहत बँटी करोड़ों से।
जीत गए फिर से खच्चर,
शर्त लगाकर घोड़ों से।
जो ठोकर के आदी हैं,
उनको क्या डर रोड़ों से।
यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...
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