Tuesday, August 11, 2009

हम जैसों का होगा क्या? हम हैं बहुत निखट्टे

नौ दिन की है नौकरी, नौ महीने का काम,
नौ-नौ लोग लगे करने में ख़त्म न होता काम!

नए लोग आते गए, क्या अधिक मिलेगा दाम?
ऐसा मान काम पर लग गए, हैं पाले अरमान!

गए छोड़कर जो सभी उनका काम कमाल,
एक-आध को छोड़कर उनका नही मलाल!

नही मिला पैसा अगर तो क्या होगा हाल
छोड़ गए कुछ लोग हैं फाड़ के मकडी जाल,

उन्हें काम मिल जाएगा जो हैं हट्टे-कट्टे
हम जैसों का होगा क्या? हम हैं बहुत निखट्टे

यही सोंचकर आजकल आती नींद न रात
झूठ 'शिशु' कहता नही कहता सच्ची बात

Friday, July 31, 2009

सपने मुझको रात डराते इसीलिये हूँ जगता

सपने मुझको रात डराते
इसीलिये हूँ जगता
जाग-जाग कर इन रातों में
कुछ पढता कुछ लिखता

घर में छोटी है एक दुनिया
जिसमे रहती पुस्तक प्यारी
एक नही कई बार पढ़ गया
सबकी सब न्यारी- प्यारी

पढ़ी 'जीवनी लेनिन' की
और बागी सिख लड़े कैसे
कैसी किसने रखी 'प्रतिज्ञा'
थे जीवन मक्सिम के कैसे

'भगत सिंह की जेल नोट बुक'
दसियों बार पढ़ी मैंने
'आधी रात मिली आज़ादी'
यह जाना पढ़कर मैंने

'सन 1857 में दिल्ली का
था कौन दलाल'
खबरें देकर गोरों को
जो हो गया कैसे मालामाल

बीस बार तक पढ़ी 'नास्तिक'
अब तक समझ नही आयी
'नर्क' भी पढ़ गया उतनी बार
बात लेकिन बन पायी

'है रहस्य क्या हिंदुत्व' का
यह भी मैं खरीद लाया
पढ़कर के 'कबीर' को फिर से
जाना दुनिया सब माया

'सहकारी खेती' होती क्या
कुछ - कुछ समझ मेरे आया
'शहर में कर्फु' लगता कैसे
इसका मर्म समझ पाया

क्या है दर्द 'भाखडा' गाँव का
कैसे लोग हुए बेघर
'कौन लोग आगे बढ़ते हैं
किसको मिलता है अवसर'

'खुदा कहीं क्या चला गया है'
के साथ पढी मैंने 'गीता'
'बाइबिल' पढी 'कुरान' पढ़ गया
तुलसी की पढ़ था सीता

'कुछ तो कहो यारों' की कविता
अच्छी मुझको सब लगती
और 'विश्व के कोनो में क्या
दुनिया हम जैसी रहती'

इतिहास पढ़ गया 'पश्चिमी एशिया'
कैसे, कब, क्यूँ घटनाएं थीं
बंकिम के लेखों में देखा
भारत की क्या घटनाएं थी

कल की रात बीत गयी फिर से
लिखते लिखते गीतों में
आज सोचता हूँ क्या होगा
पता चला संगीतों में

Wednesday, July 29, 2009

बरस गया पानी!

बरस गया पानी!
हँसे मुस्कराए
गीत खूब गाए
भीग के घर आए
बाद में याद आयी नानी
बरस गया पानी

जब बोला मीठी बानी!
वो हो गए हैरान
बोले मान ना मान
मै तेरा मेहमान
सुनकर हुयी हैरानी
बरस गया पानी

किये काम खूब!
प्रात रात जारी
रात हुयी अंधियारी
लेकिन मति गयी थी मारी
बस एक बात न मानी
बरस गया पानी

मैडम जी मुसकायीं!
वो और कुछ समझ गया
खुद मुस्करा गया
इशारा और कर गया
पड़ गयी मार खानी
बरस गया पानी

श्रीमती का गुस्सा!
तौबा-तौबा बड़ा सख्त
आता वक्त-बे-वक्त
'शिशु' का सूख जाता रक्त
पता चला बाद में है ये प्यार की निशानी
बरस गया पानी

Thursday, July 23, 2009

मीठी बानी बोलता दुर्जन सिंह है आज.....

मीठी बानी बोलता दुर्जन सिंह है आज
पता नहीं क्यूँ दीखता है गहरा कुछ राज
है गहरा कुछ राज, रात को सपने में आता
बैठ के बाजू, राजू के खाना खा जाता
'शिशु' कहें राजू है भौचक्का-भौचक्का
मीठी बानी बोलता क्यूँ आजकल दुर्जन कक्का

नयी नौकरी खोज में लोग लगे हैं रोज
ढूँढ रहे वो लोग हैं जो ऑफिस पर बोझ
जो ऑफिस पर बोझ दूसरों को शिक्षा देते
जैसे ही खुद मौका मिलता अप्लाई कर देते
'शिशु' कहें आजकल बस यही चलता है
नयी नौकरी के चक्कर में काम टलता है

नाम डूब जाए भले लेकिन हम हैं नेक
हमने ही खुशियाँ दी सबको बाकी भ्रष्ट अनेक
बाकी भ्रष्ट अनेक नाम मेरा चलता है
काम नहीं कुछ खास हाथ राजू मलता है
'शिशु' कहें दोस्तों क्या-क्या बतलाएं
नाम न डूबे इसीलए लेख दूसरों से लिखवाये

नाश्ते में क्या है?

नाश्ते में क्या है?
जवाब मिला
दूध केला!
इसे क्यूँ लाये?
जबकि
पास नहीं है
एक धेला!
काली चाय बनाती
वो दूध तो बचाती ही
ऊपर से बीमारी
भी भगाती!

चलो खैर,
खाने में क्या है?
जवाब मिला दाल!
सुनकर श्रीमान जी
हो गए बेहाल
इतनी महंगाई!
दाल क्यों बनाई
अंडा करी बनाते
बीयर के साथ
मजे से खाते

क्या कहा रात में पियेंगे सूप!
दिन में क्या कम है धूप
कोका कोला पियेंगे
साथ-साथ जियेंगे
गर्मी भगायेगा
रात का खाना भी बच जाएगा!

Wednesday, July 15, 2009

कल तीस का हो जाऊंगा

कल तीस का हो जाऊंगा
इन तीस सालों में
अब मै हिसाब लगता हूँ
तो पाता हूँ
कि एक पैर से
अपाहिज होने के अलावा
कुछ भी तो ऐसा नहीं घटा
जिस पर हानि समझ कर रोऊँ,

हां यह कहना कि
मैंने पाया भी कुछ कम नहीं,
तो क्या इस पर
बखान करके खुश होऊं

सोचता हूँ क्या शादी, नौकरी, रुतबा
केवल दिखावे के लिए है
या
यही जीने का मकसद है मेरा,
बहुत दिमाग लगाया
पर आज तक नहीं समझ पाया

हाँ समाज से गरीबी कैसे दूर होगी?
क्या अंतर है शहरी गरीबी
और
गाँव की गरीबी में
यह डेवलपमेंट सेक्टर में
रहकर जरूर सीख पाया

लेकिन
क्या फर्क पड़ता है
यह सब जान लेने से,
गाँव से ज्यादा शहर में गरीब हैं
यह मान लेने से,
की शहरों में गरीबी का ग्राफ बढ़ा है

मेरी नज़र में तो जी बस गरीब तो गरीब हैं,
फिर क्या फर्क पड़ता है
कि
वे शहर में रहें या गाँव में
हमें क्या हक कि हम उन्हें
धर्मं-जाति और मज़हब
की तरह बाँट दें
सच तो यह है
कि
वो एक हिस्सा हैं
हमारे समाज का

हम तो केवल
रोजी-रोटी के लिए
उन गरीबों के लिए काम करते हैं
वर्ना
किसे फिक्र है
और
किसे पड़ी है कि
वो गरीबी दूर करे

बीते कई सालों से
इसी सेक्टर में काम करते-करते
और
यह देखते-देखते कि
कौन गरीबों का मशीहा है
थक गया हूँ
और यह सोचकर कि
क्या होगा आगे के सालों में
सोचकर पक गया हूँ

अब किसकी फिक्र करू
किसकी नही
ये कौन बताएगा
मुझे पक्का यकीन है की
जो भी बताएगा
अपने बारे में ही बताएगा

Tuesday, July 14, 2009

अंतर बस इतना सा है!

हमें शांति भाईचारा से प्यार है
उन्हें इस पर एतराज है

हमें गीत, संगीत से लगाव है
उन्हें इससे अलगाव है

हमें अहिंसा, सत्य पर विश्वास है
उन्हें इस पर नहीं आस है

हमें अँधेरे, अत्याचार से इनकार है
वो मारामारी पर तैयार हैं.

हम हमेशा बातचीत के लिए तैयार हैं
वो करने लगते तकरार हैं.

हमें तो बस यही अंतर नज़र आता है
वर्ना रिश्ता निभाने में हमारा क्या जाता है.

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