Thursday, August 13, 2009

जो अनाम कुर्बान हो गए, श्रधा सुमन करुँ अर्पण

आधी रात मिली आजादी,
कितने अरमानो के बाद!
पढ़कर मन भावुक हो जाता,
सुनकर कुर्बानी की याद !

नाम याद ही कुछ लोगों का,
उनको नमन करुँ अर्पण!
जो अनाम कुर्बान हो गए,
श्रधा सुमन करुँ अर्पण!

हत्या नही यज्ञ कहते थे,
क्रांतिवीर, अंग्रेज मारकर!
सत्य अहिंसा भी अपनाते,
गाँधी जी को सुनसुनकर!

कौन ठीक था कौन गलत,
कहना ठीक नही होगा!
सत्य सोच थी उनकी लेकिन,
देश का मेरे क्या होगा !

देश हुआ आजाद हमारा,
आज गर्व से हम कहते!
लेकिन क्या हम कभी सोचते,
उनका मान कभी करते!

अब ख़ुद की मूर्ती लगते नेता,
स्वयं का करते ख़ुद गुणगान!
जिसने दिलवाई आजादी,
उसका करते ये अपमान!

आज देश में मारा-मारी,
भाषा-प्रांती के चलते!
लगा बाग़ आजादी का जो,
उसमे बिच्छू हैं पलते!

'शिशु' कहें हैं शुक्र न जिन्दा,
जिसने दिलवाई आजादी!
देख देश की इस हालत को,
कहते अब है बर्बादी!

Tuesday, August 11, 2009

बने फिरंगी फिर रहे गली-गली गंगू तेली

गरम-गरम चाय हम पीते ठंडा पानी,
देख विदेशी बन गए हमसब हिन्दुस्तानी

पीजा मिलता यंहा पर वेज़-नानवेज
व्रत वाला भी बेचते राधे और परवेज़

मेकप मुंह पर थोपकर पुरूष घूमते आज
महिला मेकप कम ही करती इसमे गहरा राज

रिसेशन का दौर है पूरा विश्व तबाह
हिन्दुस्तान अछूता इससे हम कहते हैं 'वाह'

हिन्दी पढ़ डिग्री ले घूमे पढ़े लिखे हैं फिरते
दसवीं पढ़ अंग्रेजी वाले लिए नौकरी फिरते

बने फिरंगी फिर रहे गली-गली गंगू तेली
अजब-गजब की दाढी-बाल अनजानी है बोली

हम जैसों का होगा क्या? हम हैं बहुत निखट्टे

नौ दिन की है नौकरी, नौ महीने का काम,
नौ-नौ लोग लगे करने में ख़त्म न होता काम!

नए लोग आते गए, क्या अधिक मिलेगा दाम?
ऐसा मान काम पर लग गए, हैं पाले अरमान!

गए छोड़कर जो सभी उनका काम कमाल,
एक-आध को छोड़कर उनका नही मलाल!

नही मिला पैसा अगर तो क्या होगा हाल
छोड़ गए कुछ लोग हैं फाड़ के मकडी जाल,

उन्हें काम मिल जाएगा जो हैं हट्टे-कट्टे
हम जैसों का होगा क्या? हम हैं बहुत निखट्टे

यही सोंचकर आजकल आती नींद न रात
झूठ 'शिशु' कहता नही कहता सच्ची बात

Friday, July 31, 2009

सपने मुझको रात डराते इसीलिये हूँ जगता

सपने मुझको रात डराते
इसीलिये हूँ जगता
जाग-जाग कर इन रातों में
कुछ पढता कुछ लिखता

घर में छोटी है एक दुनिया
जिसमे रहती पुस्तक प्यारी
एक नही कई बार पढ़ गया
सबकी सब न्यारी- प्यारी

पढ़ी 'जीवनी लेनिन' की
और बागी सिख लड़े कैसे
कैसी किसने रखी 'प्रतिज्ञा'
थे जीवन मक्सिम के कैसे

'भगत सिंह की जेल नोट बुक'
दसियों बार पढ़ी मैंने
'आधी रात मिली आज़ादी'
यह जाना पढ़कर मैंने

'सन 1857 में दिल्ली का
था कौन दलाल'
खबरें देकर गोरों को
जो हो गया कैसे मालामाल

बीस बार तक पढ़ी 'नास्तिक'
अब तक समझ नही आयी
'नर्क' भी पढ़ गया उतनी बार
बात लेकिन बन पायी

'है रहस्य क्या हिंदुत्व' का
यह भी मैं खरीद लाया
पढ़कर के 'कबीर' को फिर से
जाना दुनिया सब माया

'सहकारी खेती' होती क्या
कुछ - कुछ समझ मेरे आया
'शहर में कर्फु' लगता कैसे
इसका मर्म समझ पाया

क्या है दर्द 'भाखडा' गाँव का
कैसे लोग हुए बेघर
'कौन लोग आगे बढ़ते हैं
किसको मिलता है अवसर'

'खुदा कहीं क्या चला गया है'
के साथ पढी मैंने 'गीता'
'बाइबिल' पढी 'कुरान' पढ़ गया
तुलसी की पढ़ था सीता

'कुछ तो कहो यारों' की कविता
अच्छी मुझको सब लगती
और 'विश्व के कोनो में क्या
दुनिया हम जैसी रहती'

इतिहास पढ़ गया 'पश्चिमी एशिया'
कैसे, कब, क्यूँ घटनाएं थीं
बंकिम के लेखों में देखा
भारत की क्या घटनाएं थी

कल की रात बीत गयी फिर से
लिखते लिखते गीतों में
आज सोचता हूँ क्या होगा
पता चला संगीतों में

Wednesday, July 29, 2009

बरस गया पानी!

बरस गया पानी!
हँसे मुस्कराए
गीत खूब गाए
भीग के घर आए
बाद में याद आयी नानी
बरस गया पानी

जब बोला मीठी बानी!
वो हो गए हैरान
बोले मान ना मान
मै तेरा मेहमान
सुनकर हुयी हैरानी
बरस गया पानी

किये काम खूब!
प्रात रात जारी
रात हुयी अंधियारी
लेकिन मति गयी थी मारी
बस एक बात न मानी
बरस गया पानी

मैडम जी मुसकायीं!
वो और कुछ समझ गया
खुद मुस्करा गया
इशारा और कर गया
पड़ गयी मार खानी
बरस गया पानी

श्रीमती का गुस्सा!
तौबा-तौबा बड़ा सख्त
आता वक्त-बे-वक्त
'शिशु' का सूख जाता रक्त
पता चला बाद में है ये प्यार की निशानी
बरस गया पानी

Thursday, July 23, 2009

मीठी बानी बोलता दुर्जन सिंह है आज.....

मीठी बानी बोलता दुर्जन सिंह है आज
पता नहीं क्यूँ दीखता है गहरा कुछ राज
है गहरा कुछ राज, रात को सपने में आता
बैठ के बाजू, राजू के खाना खा जाता
'शिशु' कहें राजू है भौचक्का-भौचक्का
मीठी बानी बोलता क्यूँ आजकल दुर्जन कक्का

नयी नौकरी खोज में लोग लगे हैं रोज
ढूँढ रहे वो लोग हैं जो ऑफिस पर बोझ
जो ऑफिस पर बोझ दूसरों को शिक्षा देते
जैसे ही खुद मौका मिलता अप्लाई कर देते
'शिशु' कहें आजकल बस यही चलता है
नयी नौकरी के चक्कर में काम टलता है

नाम डूब जाए भले लेकिन हम हैं नेक
हमने ही खुशियाँ दी सबको बाकी भ्रष्ट अनेक
बाकी भ्रष्ट अनेक नाम मेरा चलता है
काम नहीं कुछ खास हाथ राजू मलता है
'शिशु' कहें दोस्तों क्या-क्या बतलाएं
नाम न डूबे इसीलए लेख दूसरों से लिखवाये

नाश्ते में क्या है?

नाश्ते में क्या है?
जवाब मिला
दूध केला!
इसे क्यूँ लाये?
जबकि
पास नहीं है
एक धेला!
काली चाय बनाती
वो दूध तो बचाती ही
ऊपर से बीमारी
भी भगाती!

चलो खैर,
खाने में क्या है?
जवाब मिला दाल!
सुनकर श्रीमान जी
हो गए बेहाल
इतनी महंगाई!
दाल क्यों बनाई
अंडा करी बनाते
बीयर के साथ
मजे से खाते

क्या कहा रात में पियेंगे सूप!
दिन में क्या कम है धूप
कोका कोला पियेंगे
साथ-साथ जियेंगे
गर्मी भगायेगा
रात का खाना भी बच जाएगा!

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