Thursday, November 27, 2008

पापी मैं नहीं, पापी मेरा पेट है

गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है-
विवाह काले रति संप्रयोगे प्राणाताये सर्वधनापहारे।
विप्रभ्य चार्थे ह्यन्नुतम वदते पक्षी वृतान्यत्नूर।।

अर्थात विवाह के बाद रतिक्रीडा, प्राणवियोग (आत्महत्या) और सर्व स्वापहरण (खुद का धन चुराने) के समय तथा ब्राहम्ण के निमित्त (नियमित) मिथ्या प्रयोग करने से पाप नहीं लगता।

कहा जाता है कि इस दुनिया संसार कोई भी दूध का धुला नहीं है। हर मनुष्य पापी है। फिर चाहे वह राजा हो या रंक। हां पाप करने के तरीके हर किसी के अपने-अपने हैं। और इन किये गये पापों के परिणाम भी अलग अलग तरह के हैं। हर कोई पाप किसी न किसी प्रयोजन के लिए ही करता है। धनीवर्ग पाप करता है पूंजी जमा करने के लिए, नाम के लिए, शोहरत के लिए और ऐशो-आराम के लिए। बाबा लोग पाप के भागीदार बनते हैं पुण्य कमाने के लिए। नेता पाप करते हैं कुर्सी पाने के लिए और राजनेता पाप करते हैं इतिहास दोहराने के लिए। इसी तरह आतंकवादी पाप करते हैं भगवान को खुश करने के लिए अर्थात जेहाद के लिए। हां, आम आदमी का पाप केवल पापी पेट को पालने के लिए होता है। कहने का तात्पर्य यह कि इस पाप की दुनिया में हर कोई पापी है आम आदमी से लेकर खास आदमी तक। भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी, चोरी-चकारी, क्या है? पाप है और क्या? लेकिन फिर भी लोग किये जा रहे हैं।

पिता, माता, भ्राता, भगिनी, पुत्र, कन्या, भार्या, स्वामी, कुटुम्ब के लिए मनुष्य सदियों से पाप करता आ रहा है। किसलिए इसी पापी पेट के लिए। इसी पापी पेट की खातिर आर्य लोग चार श्रेणियों में विभक्त हुए - ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वै’य और शूद्र। यहां शूद्र सबसे निचनी श्रेणी के पापी हैं। इसलिए तब से अब तक सबसे ज्यादा पाप के भागीदार यही लोग हैं। ऐसा शास्त्रों में लिखा है। कहा तो यहां तक जाता है कि पहले के समय यदि मनुष्य समुद्र यात्रा करे तो वह पाप का भागीदार माना जाता था, तो क्या मनुष्य ने समुद्र के रास्ते से यात्रा नही की। की है, किसलिए इसी पापी पेट के लिए।

गीता में जब अर्जुन अपनों के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए तैयार नहीं होते तो श्रीकृष्ण ने उन्हें उपदेश दिया। हे पार्थ धर्म की रक्षा करने के लिए अपने सगे-संबंधियों का वध करोगे तो तुम्हें पाप नहीं लगेगा। यहां पर अर्जुन का उस समय धर्म क्या था? यही कि अपने भाइयों और सगे-संबंधियों का पेट पालन और कोई दूसरा धर्म तो हमें दिखाई नहीं देता। तो क्या श्रीकृष्ण ने पाप की शिक्षा अर्जुन को नहीं दी, ऐसा कहने से हम विर्धमी कहलाये जायेंगे और पाप की श्रेणी में आ जायेंगे। इसलिए मैं ऐसा पाप नहीं करना चाहता।

जो भी हो मनुष्य जीवन चिरकाल से ही पाप की गठरी से परिपूर्ण है। फिर आप भी हमसे पूछेंगे कि ‘तू क्या पापी नहीं है, इसका मतलब तू भी पापी है।’ जनाब उस समय तो मैं यही कहूंगा कि पापी मैं नहीं पापी मेरा पेट है।

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