Saturday, February 17, 2018

कहानी पूरी फिल्मी है।


क़रीब कोई बीस साल पहले की बात है। एक देश में एक परिवार पापड़ बनाकर बेचता था। उनके दिन बहुत गरीबी में बीत रहे थे। फ़िर उन्हें उनके पड़ोसी ने बताया कि, आप बैंक से लोन ले लीजिए। बैंक गरीबों को रोजगार के लिए लोन देता है, जिसे धीरे धीरे करके चुकाया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने एक बैंक से लोन लिया। इसके बावजूद भी उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ बल्कि और भी कमज़ोर होती गयी।

उनकी इस स्थित का कारण दो लोग थे-एक वो बैंक जो लोन वापस लेने के लिए उन पर अत्याचार कर रहा था (जबकि उस समय अन्य कम्पनी वाले लोग लोन वापस नहीं कर रहे थे) और दूसरा उस देश का कंपनी क़ानून जो छोटे-छोटे उद्योंगों को पनपने नहीं दे रहा था। कुछ वर्षों बाद वह परिवार घोर ग़रीबी से तंग आकर विदेश में जाकर बस गया। उनका एक होनहार पुत्र, जिसने चाणक्य की तरह क़सम खाई कि, वह उस देश से और वहाँ के बैंकों से अपने परिवार का बदला लेकर रहेगा।

इसी दौरान उस देश में एक नेता का उदय हुआ, जिनने देश की ग़रीब जनता को सपना दिखाया कि वह कारोबार को आसान बना देगें (हालांकि उद्योग का गरीबों से कोई ताल्लुक़ नहीं था) फिर भी लोगों ने ख़ूब तालियां बजाई। जीतने के बाद उन्होंने एलान किया कि, अब कोई भी व्यापारी (यहां व्यापारी का मतलब बड़े उद्योगपति से था) बिना किसी गारंटी के कितना भी लोन ले सकता है, लेकिन इसके लिए शर्त ये थी वह अपने व्यापार में लिखेगा कि यह वस्तु उसी देश में तैयार की गई है (हालांकि वह वस्तु उसके पड़ोसी दुश्मन देश से बनकर आती और आते ही उस पर रबर लग जाती कि, यह वस्तु यहीं बनी है) जरूर लिखेगा। विपक्ष ने आरोपों में कहा कि, उनने देश की सत्ता को कंपनियों की गोदी में रख दिया है और सच्चाई थी भी कि अब उस देश में हर चीज़ बाज़ार थी। और इधर उस देश की गोदी मीडिया उनके गुणगान में व्यस्त थी।

इसके बाद वही हुआ, जैसा कि, उन व्यापारी व्यक्ति ने प्रण लिया था कि, वह उस देश और वहां की बैंकिंग को बर्बाद कर देगें, तो, उनने एक नामी गिरामी बैंक को चूना लगाकर उस देश से रफ़ूचक्कर हो गये। यह सब तब हुआ जबकि उस देश के ख्याति प्राप्त नेता ने चुनाव से पहले कहा था कि कोई भी भ्रष्टाचारी हो उसे सख्त से सख्त सजा मिलेगी (हालांकि, महान नेता ने यह कभी नहीं कहा था की, भ्रष्टाचारी को भागने नहीं दिया जाएगा)।

जहाँ आजकल, उस देश के बैंक भागे हुए व्यक्ति के बचे-खुचे समान की नीलामी में व्यस्त है, वहीं ख्याति प्राप्त महान नेता लोगों को रोज़गार के लिए खाने पीने की वस्तुवें बेंचने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।

डिस्क्लेमर: इस कहानी का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है।
#शिशु

Wednesday, February 7, 2018

रंग बहुत ही चोखा है, लेकिन खाया धोखा है।

रंग बहुत ही चोखा है, लेकिन खाया धोखा है। तुम भी कर सकते हो प्यार, तुमको किसने रोका है! जिसको आंधी समझा तूने, वो एक हवा का झोंका है। ये जो पेड़ लिपिस्टिक के, इसने पानी सोका है। जिसको समझा है दुकान, वो लकड़ी का खोखा है। जिसने चाहा है तब लूटा, मिला जिसे जब मौका है।

Sunday, December 17, 2017

प्रथम पंक्ति में आज खड़ी सब ग़द्दारों की टोली है

प्रथम पंक्ति में आज खड़ी सब ग़द्दारों की टोली है,
देशभक्त को भूल गए ये जनता बिल्कुल भोली है।
थे ग़रीब पहले भी बेबस, अब भी हाल न अच्छा है,
भारत की इस  राजनीति में नेता हुआ न सच्चा है।
असल स्वतंत्र तभी होंगें, जब सबका विकास होगा।
प्रजातंत्र में जब  हर व्यक्ति आम नहीं ख़ास होगा।
जब हर कोई रोटी, कपड़ा, घऱ-मकान पा जाएगा।
तब  सच्चे अर्थों में  'शिशु' लोकतंत्र आ जायेगा।।

Friday, November 10, 2017

याद सब गुरु'जी और पाठशाला रहें।

दादा रहें, दादी रहें, बनीं बूढ़ी खाला रहें!
पेंशन  बरक़रार  सबकी साठ'साला रहे।

कड़कड़ाती सर्द में हो तापने को आग़,
हाथ में अख़बार, चाय का प्याला रहे।

दोस्तों का साथ हो तब पुरानी याद में,
गप्पबाज़ी के लिए मौजूद म'साला रहे।

जो पढ़े थे साथ बचपन में, जहन में हैं,
उन सभी की ज़िन्दगानी में उजाला रहे।

जिस बदौलत हैं 'शिशु' इस मुक़ाम पर,
वो याद सब गुरु'जी और पाठशाला रहें।

Saturday, November 4, 2017

लाइन लगी कि लगी न लगी, नोट बदलने की है नहि आशा

नरोत्तम दास की प्रसिद्ध कविता 'सुदामा चरित्र' की लय पर आधारित है-
सीस पगा न झगा तन में,
प्रभु जाने को आहि बसे केहि ग्रामा

लाइन लगी कि लगी न लगी, नोट बदलने की है नहि आशा।
लोग लगे वो लगे कहने चहुँओर है छायी घोर निराशा।
नोटबंद से ग़रीब-किसान का' घाटा हुआ है अच्छा-ख़ासा।
पुलिश बजावति लठ्ठ कि, कबहूँ बैंक के बाबू देति दिलाशा।

'मन की बात' रेडियो में कह चौकीदार ने सबको फाँसा।
मीठे-मीठे बोल बोलि 'शिशु' वित्त मंत्री भी देता झांसा।
और भक्त मंडली श्राप देति सबहीं जैसे देते दुरवासा।
काला धन है आया नही कुल बीत गए तीनों चौमासा।

Thursday, October 26, 2017

गदहे को पंजीरी बांट प्रभु, इंसान के आगे घास करो।।

विकास की कोई न आस करो,
हैं फ़ेल तो फ़िर भी पास करो।
सब भक्त बनो, गुणगान करो,
भगवान को यूं न निराश करो।।

सरकार को परमेश्वर माना-
तब आँख मूंद विश्वास करो।
गदहे को पंजीरी बांट प्रभु,
इंसान के आगे घास करो।।

सब बंद पुराने नोट करो,
यह अर्थव्यस्था नाश करो।
आलोचक को सूली दे दो,
लेकिन उनका न ह्रास करो।।

जनता पर कर्ज़ डाल भारी,
जीते जी सबको लाश करो।
है एक गुज़ारिश और 'शिशु'
जनता का न उपहास करो।

Wednesday, October 25, 2017

सब बंद पुराने नोट करो, यह अर्थव्यस्था नाश करो।

विकास की कोई न आस करो,
हैं फ़ेल तो फ़िर भी पास करो।
सब भक्त बनो, गुणगान करो,
भगवान को यूं न निराश करो।।

सरकार को परमेश्वर माना-
तब आँख मूंद विश्वास करो।
गदहे को पंजीरी बांट प्रभु,
इंसान के आगे घास करो।।

सब बंद पुराने नोट करो,
यह अर्थव्यस्था नाश करो।
आलोचक को सूली दे दो,
लेकिन उनका न ह्रास करो।।

जनता पर कर्ज़ डाल भारी,
जीते जी सबको लाश करो।
है एक गुज़ारिश और 'शिशु'
अपना तुम ना उपहास करो।

कहानी पूरी फिल्मी है।

क़रीब कोई बीस साल पहले की बात है। एक देश में एक परिवार पापड़ बनाकर बेचता था। उनके दिन बहुत गरीबी में बीत रहे थे। फ़िर उन्हें उनके पड़ोसी ने बत...