Friday, November 10, 2017

याद सब गुरु'जी और पाठशाला रहें।

दादा रहें, दादी रहें, बनीं बूढ़ी खाला रहें!
पेंशन  बरक़रार  सबकी साठ'साला रहे।

कड़कड़ाती सर्द में हो तापने को आग़,
हाथ में अख़बार, चाय का प्याला रहे।

दोस्तों का साथ हो तब पुरानी याद में,
गप्पबाज़ी के लिए मौजूद म'साला रहे।

जो पढ़े थे साथ बचपन में, जहन में हैं,
उन सभी की ज़िन्दगानी में उजाला रहे।

जिस बदौलत हैं 'शिशु' इस मुक़ाम पर,
वो याद सब गुरु'जी और पाठशाला रहें।

Saturday, November 4, 2017

लाइन लगी कि लगी न लगी, नोट बदलने की है नहि आशा

नरोत्तम दास की प्रसिद्ध कविता 'सुदामा चरित्र' की लय पर आधारित है-
सीस पगा न झगा तन में,
प्रभु जाने को आहि बसे केहि ग्रामा

लाइन लगी कि लगी न लगी, नोट बदलने की है नहि आशा।
लोग लगे वो लगे कहने चहुँओर है छायी घोर निराशा।
नोटबंद से ग़रीब-किसान का' घाटा हुआ है अच्छा-ख़ासा।
पुलिश बजावति लठ्ठ कि, कबहूँ बैंक के बाबू देति दिलाशा।

'मन की बात' रेडियो में कह चौकीदार ने सबको फाँसा।
मीठे-मीठे बोल बोलि 'शिशु' वित्त मंत्री भी देता झांसा।
और भक्त मंडली श्राप देति सबहीं जैसे देते दुरवासा।
काला धन है आया नही कुल बीत गए तीनों चौमासा।

Thursday, October 26, 2017

गदहे को पंजीरी बांट प्रभु, इंसान के आगे घास करो।।

विकास की कोई न आस करो,
हैं फ़ेल तो फ़िर भी पास करो।
सब भक्त बनो, गुणगान करो,
भगवान को यूं न निराश करो।।

सरकार को परमेश्वर माना-
तब आँख मूंद विश्वास करो।
गदहे को पंजीरी बांट प्रभु,
इंसान के आगे घास करो।।

सब बंद पुराने नोट करो,
यह अर्थव्यस्था नाश करो।
आलोचक को सूली दे दो,
लेकिन उनका न ह्रास करो।।

जनता पर कर्ज़ डाल भारी,
जीते जी सबको लाश करो।
है एक गुज़ारिश और 'शिशु'
जनता का न उपहास करो।

Wednesday, October 25, 2017

सब बंद पुराने नोट करो, यह अर्थव्यस्था नाश करो।

विकास की कोई न आस करो,
हैं फ़ेल तो फ़िर भी पास करो।
सब भक्त बनो, गुणगान करो,
भगवान को यूं न निराश करो।।

सरकार को परमेश्वर माना-
तब आँख मूंद विश्वास करो।
गदहे को पंजीरी बांट प्रभु,
इंसान के आगे घास करो।।

सब बंद पुराने नोट करो,
यह अर्थव्यस्था नाश करो।
आलोचक को सूली दे दो,
लेकिन उनका न ह्रास करो।।

जनता पर कर्ज़ डाल भारी,
जीते जी सबको लाश करो।
है एक गुज़ारिश और 'शिशु'
अपना तुम ना उपहास करो।

Sunday, October 8, 2017

नौटंकीबाज

नौटंकीबाज

मेरी बचपन की यादों में नौटंकी और ड्रामें की यादें बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। तो बात उन दिनों की है जब मैं कोई 5 या छठी में पढ़ता था। हमारा गांव सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए जाना जाता रहा है, कोई भी पारिवारिक या धार्मिक कार्यक्रम हुआ लोग फटाक से नौटंकी बाँध के आ जाते हैं। इसका प्रभाव कुछ यहां तक पड़ा कि गांव के लोगों भी बाद में नौटंकी का साजो-सामान रखना शुरू कर दिया।

खैर ये तो रही ये बात! अब सुनिये, मुझे नौटंकी देखने का इतना चस्का लगा कि गांव के आसपास की कोई नौटँकी बकाया नहीं रखी। होता यह था, जैसे ही नक्काड़ा कानों को सुनाई देता मन में बेचैनी शुरू हो जाती थी। वैसे ही जैसे कोई अनिंद्रा का बीमार, वो लाख सोने की कोशिश करे नींद नहीं आती। हमारा अपना एक गैंग था, जिसमें मेरा चचेरा भाई, मेरे मुहल्ले के कुछ बदमाश लौंडे तथा मेरे लंगोटिया यार भी शामिल थे। और हाँ! ये सब लौंडे वही थे, जिनके घरों में नौटंकी ड्रामा देखने पर कड़ा प्रतिबंध होता था। हम बैठने का सामान अपने घर से ले जाते और अक्सर सबसे आगे बैठते, जहाँ से नचनियों को परेशान किया जा सके, हम इशारों से उन्हें चिढ़ाते थे, उनका मज़ाक उड़ाते और उनकी नज़र में स्वयँ नौटंकीबाज हो जाते। नौटंकी के प्रबंधक हमारे पर विशेष ध्यान रखते। और बीच-बीच में चेतावनी देते कि यदि अगली बार कुछ हरक़त की तो हमें भगा दिया जाएगा, हालाँकि ये चेतावनी रात भर चलती रहती।

ऐसा नहीं था कि हम नौटंकी का मनोरंजन खेल या ड्रामा देख कर करते बल्कि, हमारा मनोरंजन तो नौटंकी देखने वाले दूसरे व्यक्ति और छोटे बड़े लौंडे होते, जिनके पीछे से टिप्प मारना, उनके कान में लकड़ी घुसेड़ना तथा मुंह बनाकर उनका मज़ाक उड़ाना से हमारा मुख्य मनोरंजन होता। जोकड़ और नचनिये  का फूहड़ वार्तालाप हमारा मनोरंजन का मुख्य भाग होता।

इन नौटंकियों द्वारा मैंने कितने ही दोस्त बनाएं, जो आज भी हमारी यादों में हैं हालांकि उनसे अब मिलना मुश्किल है। मैंने बाद के वर्षों में नौटंकी को मनोरंजन से ज्यादा उसकी कहानी पर ग़ौर करना शुरू किया। और बाकायदा चौगोलों को याद करना भी शुरू कर दिया। आज भी न जाने कितने ही ज़बानी याद हैं, देखिये क्या ख़ूबसूरत चौगोला:-
"मोर मुकुट मांथे तिलक, भृकुटि अधिक विशाल
कानन में कुंडल बसे, देखो गल बैजंती माल,
गल बैजंती माल, हाँथ में लिए लकुटिया आला
ता ता थैया करत निरत संग गोपि ग्वालिनी ग्वाला।
मेरे ब्रज के रखवारे, हमारो करउ गुजारे
राखो लाज द्वारिकादीश, श्रीपति नंद दुलारे।।"

मुझे याद है पहली बार मैंने नौटँकी तकिया गांव में देखी थी, शायद मैं कोई 7 या आठ साल का रहा होऊंगा और आख़िरी बार मैंने कोई पाँच साल पहले देखी थी। आज मैं नौटंकी को फिर उन दोस्तों के साथ देखने का सपना देखता हूँ, पता नहीं ये सपना कब पूरा होगा।

Saturday, October 7, 2017

लाइक और कमेंट


अन्ने बन्ने में इतनी ज़्यादा गाढ़ी दोस्ती थी, कि कहने वाले कहते थे खाना एक के घर बनता था तो चूल्हे का धुवाँ दूसरे के घर उड़ता था। गांव के मसखरे मज़ाक में कहते थे कि वो दोनों एक से ही हगते हैं। बन्ने अपने नाम के पीछे खान लगाते थे। अन्ने केवल अन्ने ही लिखते थे आगे-पीछे और कुछ नहीं! इसलिए, उन्हें न तो हिन्दू, न मुस्लिम और न ईसाई कह सकते हैं। वैसे गांव में ईसाई कोई था ही नहीं। दोनों दोस्त किस धर्म से हैं औ उनकी जाति क्या है ये न तो बन्ने ने अन्ने से और न अन्ने ने बन्ने से कभी पूछा। अन्ने, बन्ने के बारे में केवल ये जनता था कि वो अलग धर्म से हैं। लेकिन कभी कभी अन्ने को उनके पड़ोसी और ग़ैर दोस्त याद दिला देते थे कि बन्ने का धरम क्या है। पंडिताइन दादी ने अन्ने को एक रोज़ शाम को बताया कि बन्ने का बाप राज मिस्त्री था और क़स्बा से भैंसे का मांस लाता था, जिसके झोले को एक बार टिल्लू (पंडिताइन का बड़ा बेटा, जो अब दिल्ली में रहता है) ने गलती से छू लिया था जिसके बाद पंडिन ने उसकी कैसी मरम्मत की थी। ये सुनकर अन्ने इतनी जोर हँसे कि पंडित बाबा को लठ्ठ उठाकर उन्हें भगाना पड़ा था।

अब तक व्हाट्स और फेसबुक का चलन गांव में नहीं आया था। बावजूद इसके गांव में छुआछूत का चलन कम हो गया था, हाँ खानपान में कुछ हद तक मनाही थी, लेकिन गांव के पंडितों के लौंडे चोरी छुपे कलिया और मछरी जरूर खाने लगे थे। अब खटिया पर सिरहाने या पैताने बैठो कोई ख़ास मनाई नहीं थी, बस कोई बुजुर्ग आ जाये तो ठाढे हो जाइये। इतने पर भी गांव में सब ठीक ठाक ही था।

दोनों गांव की रामलीला और नौटंकी में साथ-साथ बैठते, और नाचनिये को दिए गए ईनाम को 'अन्ने के ना बन्ने के, रूपये हैं ये धन्नो के' नाम से बुलवाते। दोनों ग़रीब थे, दोनों पेट पालन के लिए खेती करते थे हालाँकि दोनों को मजूरी करना ज्यादा अच्छा लगता था। अन्ने और बन्ने अब अधेड़ हो रहे थे।

अन्ने और बन्ने के लड़के भी अपने बाप की ही तरह गहरे दोस्त थे। दोनों दसवीं में दो बार फेल हुए थे अब दिल्ली में कमाने की सोच रहे थे। दोनों ने 'माल' में नौकरी की जहाँ एक राशन की दुकान और दूसरा मोबाइल की दुकान में काम करते हैं। दोनों साथ रहते हैं कुछ दिनों तक दोनों ने अलग अलग खाना बनाया, फिर होटल में खाया, पहले अन्ने का लड़का खाता फिर बन्ने का, उनके बाद दोनों साथ साथ खाने लगे इसके कुछ दिनों बाद दोनों ने कमरे पर ही बनाना शुरू कर दिया।

आगे की कहानी फेसबुक और व्हाट्स ऐप के आने के बाद शुरू होती है। लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी चुनाव जीत चुकी थी, जिसे चुनावी रणनीतिकार ऐतिहासिक जीत कहते हैं। दोनों लड़कों के पास स्मार्ट मोबाईल है और वे व्हाट्स फेसबुक पर हैं। इन पर धार्मिक से लेकर अश्लील मेसेज आते हैं दोनों एक दूसरे ले लिए लाइक और कंमेंट करते हैं। अभी कुछ दिनों से अन्ने और बन्ने के लड़कों को राजनीतिक, धार्मिक, देह प्रेम, आदि आदि मेसेज आने शुरू हो गए हैं । जिनमे लिखा होता है अधर्मी और देश द्रोही देश से गद्दारी कर रहे हैं और कभी कभी बीफ़ वीफ़ आदि वाले मेसेज भी आते हैं। हालांकि दोनों नॉनवेज खाते हैं पर बीफ नहीं। पर उन्हें सही में यह भी पता नहीं कि बीफ़ का मीट क्या होता है। अन्ने के लड़के और बन्ने के लड़के में अब बहसें शुरू होने लगीं थीं।

कुछ दिनों तक दोनों के बीच बहसों का दौर चलता रहा। बाद में ये माहौल तनाव भरा हो गया। अब दोनों लड़के एक साथ रहते जरूर पर वो बात नहीं थी। खाना फिर से होटल का हो गया। दशहरा नजदीक आ रहा था। गांव की रामलीला दोनों को गाँव की तरफ खींच रही थी। दोनों ने बिना बात किये एक दूसरे को अवगत कराया कि वो गांव जा रहे हैं। आनंद विहार से बस पकड़नी है 4 बजे वाली। ये उन दोनों की आख़िरी बातचीत थी।

लौंडे अपने अपने घर गए और सबसे पहले व्हाट्सअप और फेसबुक के किस्से घर पर सुनाये। धर्म अधर्म और देश भक्ति, सेना, विदेश, राजनीति, दिल्ली, केजरीवाल, मोदी उनके चर्चा के मुख्य बिंदु थे। घर में किसी को कुछ समझ नहीं रहा था । अन्ने ने बन्ने से पूछा ये सब क्या है बच्चे पैसे की जगह ये क्या कमाकर लौटे हैं। हमने 50 साल गुज़ारे एक दूसरे से आजतक कभी भी नमाज़ और पूजा पर चर्चा नहीं की। वास्तव में न बन्ने ने नमाज़ पढ़ी न अन्ने कभी मंदिर गए। बन्ने ने ईद में बम्बा पार नमाज जरूर अता की जबकि कार्तिक नहान में दोनों गंगा घाट गए मेला देखा और नहान किया।

अब अन्ने और बन्ने अक्सर कम ही मिलते हैं। गांव में  अब लौंडे कांवर निकलने लगे हैं सुना है स्टेशन के पास वाली मस्जिद में भोंपू से अल्लाह अकबर का शोर भी होने लगा है। बन्ने मस्जिद में पांच वक्त की नमाज़ अता करते हैं और अन्ने मंदिर के लिए बन रहे चबूतरे पर दिहाड़ी कर रहे हैं। लोगों से सुना गया है मंदिर बनने के बाद अन्ने ही मंदिर के मुख्य कर्ता धर्ता होंगे।

लौंडे फिर से दिल्ली लौट आये हैं और अब दोनों अलग अलग रहते हैं। दोनों को एक दूसरे का पता नहीं पता।

सुनने में आया कि अन्ने बीमार हैं और बन्ने उन्हें देखने तक नहीं आये। बन्ने का भी कुछ यही हाल है। और इधर लौंडे लाइक और कमेंट पेले जा रहे हैं।

Tuesday, October 3, 2017

थानापति बाबा

हमारे गांव के लोकप्रिय ग्राम देवताओं में श्री थानापति बाबा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। बाबा का स्थान कुरसठ से गौसगंज जाने वाली सड़क के किनारे है। जिस स्थान की दूरी गाँव कुरसठ से लगभग एक किलोमीटर है।

मेरा बचपन, मेरे पिता का बचपन तथा मेरे दादा बचपन
सबके लिए इस स्थान की महत्ता है। मेरे दादा किसान थे, उन्होंने हमें बताया था इसके पास उपस्थिति कुएं से पूरे इलाके के किसान पानी भरने आते थे, यहाँ छाँव के लिए एक पकरिये का पेड़ था, जो राहगीरों के लिए सराय का कार्य करता था। लोग बैठकर सुस्ताते थे और फिर अपने गंतव्य के लिए रवाना होते थे। बाद में पकरिये का पेड़ गिर गया तब मेरे सामने यहाँ भल्लू भुरजी ने एक पीपल का पेड़ लगाया था। आज यह पेड़ इतना बड़ा हो गया है कि यकीन नहीं होता कि इसकी उम्र मेरी  उम्र से कम है।

मेरे अंदर का डर इस स्थान की वजह से ही भगा था। पहले हम खेत जाते समय डरते थे तब बुज़ुर्ग पांडे बाबा ने सिखाया था, यदि दर लगे तो बरम्बाबा का नाम लेने भर से भय का भूत भाग जाता है। इस स्थान की बहुत सी कथाएं प्रचलित हैं।यह स्थान आधात्म्य का केंद्र होने के साथ ही साथ पौराणिक रूप से भी महत्व रखता है। यहाँ किसी ने कभी टटका टोना नहीं किया और न ही कोई अंधविश्वास से कोई काम लिया। यहां लोग अपनी आस्था और विश्वास की वजह से आते हैं। बाबा किसी एक जाति और मज़हब के नहीं हैं वरन यहां हिन्दू मुसलमान, पढ़े लिखे या अनपढ़ सभी का सर स्थान से गुजरते ही नतमस्तक हो जाता है। बाबा के स्थान पर लोग मन्नत मानते हैं और बहुतों को मन्नतें पूरी भी हुई हैं। हम आज भी खेत जाते और खेत से आते समय यहाँ पानी पिये बिना नहीं रहा पाते।

वैसे तो इस स्थान हमेशा कुछ न होता रहता है लेकिन महिलाओं के पवित्र त्यौहार करवाचौथ के दिन यहाँ चहल-पहल बढ़ जाती है। दो दिन तक चलने वाले मेले के आखिरी दिन दंगल का आयोजन किया जाता है जहाँ जिले के प्रसिद्ध पहलवानों से लेकर देश और प्रदेश के पहलवान हिस्सा लेते हैं। गांव के नौजवानों को भी इसी बहाने हाँथ आजमाने का मौक़ा मिल जाता है। समय के बदले स्वरूप से बावजूद भी आज भी यहाँ लोकप्रिय लोक नृत्य नौटंकी का आयोजन किया जाता है। कलाकारों के लिए यह स्थान आज भी वैसा ही है जैसे हमारे बुजुर्गों के समय था।

Sunday, September 24, 2017

कुरसठ के चुनाव

कुछ दिन बाद हमारे गांव में नगर पंचायत के चुनाव आने वाले हैं। अंदाजन 40 से पचास लोग चैयरमेन के लिए अपना दावा पेश करेंगे। जिनमें से लगभग 30 लोग एक ही समुदाय से होंगें, और इनमें से लगभग सभी व्यक्ति मोदी जी के पक्के भक्त हैं। हर कोई चाहेगा कि उसके पम्पलेट में मोदी जी का फोटो छपे। कुछ लोगों ने तो अभी से ही बड़े बड़े होडिंग लगा दिए हैं बाकायदा फ़ोटो के साथ। कुछ लौंडे भी मैदान में हैं। उन्होंने ने तो योगी कुर्ता भी पहनना शुरू कर दिया है। दूर से ही प्रणाम करते हैं। इनमें से अधिकतर लौंडों को मैं नाम और शक्ल दोनों से नहीं जानता। लेकिन ज़्यादातर लौंडे मुझे मेरी चाल से पहचानते हैं।

इस बार के चुनाव में भाई भतीजावाद चले ऐसा कम ही है क्योंकि जीतने वाले अधिकतर उम्मीद एक ही समुदाय से होंगे, ऐसा पान की दुकान पर सुना। खैर कोई भी जीते, लेकिन आँकड़ेबाजों की मानें तो यह चुनाव इस बार सिर फुटव्वल तक जाएगा।

कसक देखिये की, हमारे लोग (कुम्हार) आज तक मेम्बर तक का चुनाव नहीं जीते पाए। कई बार खड़े हुए मुंह की खानी पड़ी। ऐसा नही की हमारे वोट नहीं, लेकिन, वो कहते हैं न कि, राजनीति बड़ी कुत्ती चीज है इसलिए हमलोग आधे एक मुहल्ले में कर दिये जाते हैं और आधे दूसरे में।

अब हम ही वो वोटर हैं जो जीत और हार के आंकड़े बिगाड़ सकते हैं इसलिए हम पर सभी ने अभी से डोरे डालना शुरू कर दिया है।

इस बार वोट डालने जरूर जाऊंगा ताकि लाइव देख सकूं। हमारे लिए तो वो क्रिकेट मैच जैसा है। चाय के साथ पकौड़े खाऊंगा और चटकारे लेकर खबरों पर ठठ्ठा लगाऊंगा।

चुनाव के बाद एक लंबा लेख लिखूँगा, रिसर्च पर अभी से कार्य चल रहा है। इसलिए रिसर्च वालिंटियर की आवश्यकता है।

Saturday, September 2, 2017

ख़तम पहले जाति-पांत करें।

अज़नबी ही सही कोई बात करें,
ये सफ़र तय साथ-साथ करें।

दुश्मनी भूल कर दोस्ती से कहो,
नफ़रतों से दो-चार हाँथ करें।

राह में कांटे कंकड़ बहुत हैं यहाँ,
चलो मेहनत दिन और रात करें।

धर्म की बात भी यदि ज़रूरी यहाँ
तो ख़तम पहले जाति-पांत करें।

फ़ोन करते 'शिशु' हैं बराबर, मगर,
वक़्त निकाल चलो मुलाक़ात करें।

Tuesday, August 22, 2017

ज़िन्दगी का नहीं कोई आधार है...

ज़िन्दगी का नहीं कोई आधार है,
गप्पबाज़ी यहाँ अब धुआँधार है।...

झूठ बोलूं न क्यों अब ज़रूरत है ये,
सत्य का आजकल फ़ीका बाज़ार है।

जो गरजते थे कल वो बरसने लगे।
बादलों का लगा देखो अम्बार है।।

शाम से इस शहर में रह भीगता,
सर छुपाने का कोई न आसार है।

मेरे हमदर्द कबसे हैं रूठे 'शिशु',
डाकबाबू न लाया कोई तार है।।

Wednesday, May 24, 2017

रस्म और रिवाज

रस्म एक टोटका है जबकि,
रिवाज में अंधविश्वास की बू आती है।
और धर्म इन दोनों की रक्षक,
वो इन्हें एक साथ आगे बढ़ाती है।।

रस्म और रिवाज़ का विरोध
कोई क्यों नहीं करता है?
क्योंकि व्यक्ति 'आस्था' और
'धर्म' से बहुत डरता है।।

ढोंगी-पाखण्डी इन रस्मों और
रिवाजों के रखवाले हैं।
आस्तिक इनके गुलाम और
'नास्तिक' प्रश्न करने वाले हैं।।

कुछ भी।

रात के सफ़र में आप अकेले नहीं हैं 'शिशु',
चाँद-तारे, हवाओं का कारवां भी साथ है।

उसके प्यार का नशा इस क़दर चढ़ा
'शिशु' अब पीने की नौबत नहीं आती।
इस कदर सँभला हूँ बिगड़कर कि,
मुझमें कोईं सोहबत नज़र नहीं आती।

सोहबत:- वह बात (विशेषतः बुरी बात) जो बुरी संगत के कारण सीखी गयी हो।

शहादत को यूँही कभी भुलाया न जाएगा,
गुनाहगार को कटघरे में लाया ही जाएगा।।
बक्से नहीं जाएंगे जो साँप आस्तीनों में हैं,
उनको पहले ही शूली पर चढ़ाया जाएगा।।

कितनी पी है ख़बर नहीं कुछ,
फिर से कुछ पी लेता हूँ।
रो-रो जीवन कब तक काटूँ,
अब हंस कर जी लेता हूँ।।

गाँव को क़स्बा बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

मील का पत्थर, किनारे पर गड़ा हूँ मैं।
आप गुजरें इस सहारे पर खड़ा हूँ मैं।।

भीड़ है भारी लेकिन हैं बस्तियां सुनसान,
गाँव को क़स्बा बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

प्यार में उसने मुझे क्या देवता बोला,
ख़ुद ही ख़ुद का बुत बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

घर के लोगों में मची है लूट चारों ओर,
इन झमेलों में न जाने क्यों पड़ा हूँ मैं।

युद्ध को भड़का रहे हैं धर्म के रक्षक,
शांति के पैग़ाम के अंदर सड़ा हूँ मैं।।

गाँव का होकर गाँव की नहीं!

गाँव का होकर गाँव की नहीं!
किसी बिरवे की छाँव की नहीं!
धूल और नंगे पाँव की नहीं!
नदी में तैरती नाव की नहीं!
तो बात किसी करूँगा 'शिशु'!

Tuesday, April 4, 2017

अग्नि की अब परीक्षा ज़रूरत नहीं

राम का जन्म दिन हो मुबारक़ सभी,
कर्म का फ़ल मिलेगा अभी के अभी।
हो पुनर्जन्म का कोई झंझट नहीं,
पूर्ण कारज करो जी अभी के अभी।।

अग्नि की अब परीक्षा ज़रूरत नहीं,
कौन कहता है तुम ख़ूबसूरत नहीं।
राम की झूठी कसमें न खाया करो,
राम दिल में बसे कोई मूरत नहीं।

भाई कैसे मिले राम जैसा कहीं-
जब लखन न मिले उनके जैसा कहीं।
बात रिश्तों की बनती-बिगड़ती गयी
बाप मिल जाएंगे, मिलता पैसा नहीं।।

धारणा बन गयी पैसे का है समय,
अब गरीबों का बिल्कुल नहीं ये समय।
आ गया अब समय आप जैसों का है,
मेरे जैसों का बिल्कुल नहीं ये समय।।

Wednesday, February 15, 2017

असली न लोग रंग किसको लगाऊं मै.....

रंग भी न असली है ढंग भी न असली है,
असली न लोग रंग किसको लगाऊं मै!
रंग किसको लगाऊं मै!

प्यार है दिखावा ही प्रेमिका न अपनी है,
अपनी न भाभी कोई सारी ही मैडम हैं !
रंग किसको लगाऊं मै!

भीड़-भाड़ इतनी है मेला हाट जितनी है,
कौन कौन अपनों है कुछ न समझ आवे है!
रंग किसको लगाऊं मै!

इंग्लिश ही मिलती है देशी का नाम नहीं,
'और हम जैसे लोंगन का यंहा कोई काम नहीं !
रंग किसको लगाऊं मै!

'शिशु' कहें पीने पिलाने का दौर यंहा कन्हा,
जितना मज़ा गाँव में है उतना और कन्हा
रंग किसको लगाऊं मै!

प्रातःकाल करो मतदान, वोट कीमती है जानो।

पाँच साल का समय बहुत है,
यदि कुछ करने की इच्छा है।
अब तक वोटर को नेता से,
मिली भीख में बस भिक्षा है।।

समय के अपराधी होंगे हम,
अब भी नहीं चेतना जागी।
अपना वोट डालने की यदि
ख़ुद में लगन नहीं लागी।।

फिर पीछे से मत कहना,
सब नेता भ्रष्टाचारी हैं।
'शिशु' समझ में ये आयेगा,
बुद्धि भ्रष्ट तुम्हारी है।।

प्रातःकाल करो मतदान,
वोट कीमती है जानो।
लोकत्रंत के इस संगम की
महिमा को सब पहचानों।।
#उत्तरप्रदेश #चुनाव कुरसठ युवा मंच

Monday, February 13, 2017

कविता का शीर्षक आप जो उचित समझें।


बाग़ हुए ग़ायब क्यों-
पसरा खेतों में सन्नाटा है।
क्यों हमने खेती की ख़ातिर
तालाबों को पाटा है?

पगडंडी को काट-छाँट कर
फ़सलें बोयी जाती क्यों?
चरागाह के लिए नज़र अब
भूमि नहीं आती है क्यों?

सड़क किनारे आम और
महुए के पेड़ नहीं दिखते।
क्यों पढ़ने-लिखने वाले अब
इन पर शोध नहीं लिखते?

सुना है विद्यालय, शिक्षा की-
परिभाषा है बदल गयी।
पढ़ने और पढ़ाने वालों की
भाषा भी बदल गयी।।

'शिशु' याद हैं वो दिन,
जब हम विद्यालय जाते थे।
उपयोगी शिक्षा के साथ
ज्ञान प्राकृतिक पाते थे।

याद आ गए बाग़ और वो-
जंगल जिनमें जाते थे।
जहाँ इमलिया, खट्टे बेर
यार-दोस्त संग खाते थे।।

अब विद्यालय के नज़दीक
कोई बाग़ नहीं दिखते।
पर्यावरण प्रदूषण पर अब
बच्चे हैं निबंध लिखते।।

Tuesday, August 16, 2016

'शिशु' गुजरी है वो गुजर गयी,

'शिशु' गुजरी है वो गुजर गयी,
अब अमन चमन में बना रहे।
वो चले गए ग़म बहुत भरा,
दिल प्यार में उसके सना रहे।
पतझड़ में पत्ते गिरते हैं,
पर जड़ के साथ में तना रहे।
अब जीत गए तब कहते हैं,
मंहगाई का पेड़ ये घना रहे।
उनको समझा था नेक हैं दिल,
वो सांप अभी फन फना रहे।

मिलते हैं भीड़ में, और खो जाते हैं।

मिलते हैं भीड़ में,
और खो जाते हैं।
इनमें कुछ ख़ास,
अपने से हो जाते हैं।।
पता ही नहीं क्यों,
हम याद करते हैं।
वो अनजान हैं,
बताने से डरते हैं।
सपनों में खो जाते हैं।
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
कई बार ऐसा होता है
वो आते ही मुड़ते हैं
बिना बात किये ही
एक दुसरे से जुड़ते हैं
फिर अपने आप में खो जाते हैं
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
कहीं धुप में छाता लिए,
कभी बारिश में भीगते हुए।
और चले जा रहे हैं मस्ती में
यूँ ही रीझते हुए।
दिल में खिंचे चले आते हैं
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
एक हल्की सी आहट,
उनकी वो मुस्कराहट,
ये बंदिशों की रेखा,
'शिशु' पलटकर नहीं देखा।
चलो अब सो जाते हैं।
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।

भक्त संग आपिया भी महंगाई का मारा है।

हाय महंगाई है! हाय महंगाई 'शिशु'
शोर चहुँओर सुनायी रहा भोर से।
जाति-धर्म इसका न सभी जन एक हैं,
त्राहि-माम त्राहि-माम सुनो सभी छोर से।।
बड़े बड़े लोग भी दाल-भात बोल रहे,
कितने बेहाल सभी भेद जो हैं खोल रहे।
आते-जाते पैदल ही हेल्थ की दुहाई देते।
अच्छे दिन कहाँ हो, ख़ुदा की ख़ुदाई लेते।
हैं इतने बेहाल, अब होता न गुजारा है,
भक्त संग आपिया भी महंगाई का मारा है।

'शिशु' पान के ऐसे हैं अजब अनोखे किस्से।

बिन चूने का पान चबाकर चौबे बाबा बोले।
बचा-खुचा भी ऐसे बीते जय शिवशम्भू भोले।
लौडे चक्कर लगा रहे हैं सभी पान के खोखा।
घरवालों को चकमा देकर दुकानदार को धोखा।।
चूना कम कत्था है ज्यादा, खाकर बोले कोके,
उधरा पूरा मिल जायेगा, हमका काहे हो रोके।
खाके मीठा पान, पिचकारी थूक की छोड़ी।
घुमि रहे हैं गॉव में शोहदा हंसी हँसे हैं भोंडी।।
'शिशु' पान के ऐसे हैं अजब अनोखे किस्से।
लिखते रहो दोस्तों इसमें अपने भी हिस्से।।

...असल में जिंदगी सब कुछ हमें वहीं सिखाती है।

जहाँ न दूर-दूर कोई भी परिंदा दिखता है,
वहीं बैठ कवि अपनी कविता लिखता है।
जहाँ तक नज़र जाती है पानी ही पानी है,
वहां एक लेखक लिख सकता कहानी है।
जहाँ शोर नहीं, केवल सन्नाटा ही सन्नाटा है,
असल में किसान वहीं कहीं अन्न उपजाता है।
जहाँ दुःख और तकलीफ़ बहुत नज़र आती है,
असल में जिंदगी सब कुछ हमें वहीं सिखाती है।
जहाँ, प्रेम, करुणा, दया आदि बातें होती हैं,
'शिशु' असल में दुनियां वहां जाकर रोती है।

बोलिये! क्यों मौन हो?


बोलिये! क्यों मौन हो?
है शमा जब खूबसूरत,
तब 'शिशु' बेचैन हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?
तपतपाती धूप है तो
छाँव मैं बन जाऊंगा।
आँधियाँ आएं तो क्या
दयार मैं बन जाऊंगा।।
है गुज़ारिश एक ये-
मत कहो तुम कौन हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?
हो खुशी का आशियाना,
जिंदगी में ग़म न हो।
आंशुओं के साथ मैं हूँ,
आँख अब ये नम न हो।।
हो उजाला ज़िन्दगी में
दीप में कम लौ न हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?
सात जन्मों की न कसमें,
हों न झूठी कोई रश्में।
इस तरह हो साथ अपना,
हमसफ़र सच हो ये सपना।।
ये सफऱ चलता रहे बस
साल चाहें सौ न हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?

Sunday, July 17, 2016

देश गर्त में चला गया फिर बाद में भाड़ को झोकोगे

गंगा, गाय है उनका मुद्दा, जिनका भ्रष्टाचार था।
अब बेकाबू बोल रहे हैं, पहले शिष्टाचार था।।
महंगाई को कोस रहे थे, पीकर महंगा पानी।
हाय हाय के नारे देकर, बोले कड़वी बानी।।
अब सत्ता में आते ही, महंगाई को भूल गए।
जाने कितने ही किसान फांसी पर हैं झूल गए।।
काला धन - काला धन, जो बोले थे जोर से।
युवा जोश में जाग गया था, बहुत सवेरे भोर से।।
सोचा था काले धन में, जो पैसा मिल जायेगा।
मिलने वाले 15 लाख से एक कोट सिल जायेगा।।
अब ट्वीटर पर गाली देते, लेखक लिखने वालों को।
बोल रहे हैं देश द्रोही हैं मारों इन सब सालों को।।
'शिशु' लगा मुँह पर ताला है लिखना कैसे रोकोगे।
देश गर्त में चला गया फिर बाद में भाड़ को झोकोगे।।

अब सत्ता में करते मौज इन्हें न हिलना पड़ता है!

ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।

भ्रष्टाचार विरोधी आँधी अण्णा जी की आयी थी।
उसी विरोधी रैली ने ही कुछ की मौज बनायी थी।।
नेताओं के रहे विरोधी, उनकी हंसी उड़ाते थे।
लोकतंत्र में लोकपाल का सबको पाठ पढ़ाते थे।।
अब सत्ता में करते मौज इन्हें न हिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

आम आदमी दिल्ली वाले हरदम रोते रहते हैं।
काम न करने मोदी देते ऐसा सबसे कहते हैं।।
कहाँ कभी कहते फिरते थे लोकपाल वो लाएंगे।
भ्रष्टाचार ख़त्म होगा तब घूस न कोई खायेंगें।।
मुफ़्त की वाई-फाई खातिर उनसे मिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

ऐसे-ऐसे थे उपदेशक काला धन ही रटते थे।
टीवी की लंबी बहसों से पीछे कभी न हटते थे।।
योगा एक बहाना है बस, ये तो बनिया पक्के हैं।
आज देख के इनकी पूंजी हमसब हक्के-बक्के हैं।।
फटे पार्क में जो कपड़े थे उनको सिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

शाखा वालों ने पब्लिक को ऐसा पाठ पढ़ाया।
कांगेस के दुश्मन से फिर अपना हांथ बढ़ाया।।
कुछ ऐसा हो गया अचंभा सूरज पूरब अस्त हुआ।
भ्रष्टाचारी कांग्रेस फिर इनके आगे पस्त हुआ।
महंगाई के कीचड़ में कमल को खिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

अब महंगाई की बात करो तो रोना रोने लगते हैं।
खड़ी फसल में जोत दुबारा फसलें बोने लगते हैं।
बात वहीं की वहीं रही कुछ बदला हो बतलाओ जी।
कसम तुम्हें है सिया राम की झूठी कसम न खाओ जी।।
ऐसे वैसे मुद्दों में फिर 'शिशु' कोे पिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

अब सत्ता में करते मौज इन्हें न हिलना पड़ता है!
मुफ़्त की वाई-फाई खातिर उनसे मिलना पड़ता है!
फटे पार्क में जो कपड़े थे उनको सिलना पड़ता है!
महंगाई के कीचड़ में कमल को खिलना पड़ता है!
ऐसे वैसे मुद्दों में फिर 'शिशु' कोे पिलना पड़ता है!
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है!!!

Saturday, June 25, 2016

हर शख़्स कीमती, किसी का मोल न मोलो।

झूठ जो बोलें, न उनसे झूठ तुम बोलो,
हैं खोलते गर भेद, उनके भेद न खोलो।
मीठी जुबाँ से बात करता है सभी से 'शिशु',
आप भी हर बात में रस कान में घोलो।
क्या हुआ जो साथ चलते हैं नहीं अपने,
ग़ैर हैं तो क्या हुआ कुछ साथ तुम होलो।
लगे न ठेस बातोँ से, न हो कोई कभी रुसवा,
बात जब भी हो, उसे सौ बार तुम तोलो।।
बख्श इज्ज़त, कर सभी का मान और सम्मान,
हर शख़्स कीमती, किसी का मोल न मोलो।

अब दिख गया हकीकत में कौन-कौन है..

हम दुःखी हैं पर राहत की बात ये है 'शिशु' 
पता चल गया अपना और पराया कौन है। 
बड़ा सुना था कहते कि सुख-दुःख में साथ हैं,
अब दिख गया हकीकत में कौन-कौन है।

सरे आम रहजनी हो गयी गाँव हमारे आज

सरे आम रहजनी हो गयी गाँव हमारे आज,
लुटा टमाटर, आलू, तेल और पाव भर प्याज,
और पाव भर प्याज, मित्रों दुख़दायी क्षण है,
जबकि, नेताजी के लिए यही चुनावी रण है,
'शिशु' कहें कुछ सालों से महंगाई ही चुनाव है,
रहजन ही बनाता चुनाव का असली तनाव है।

Friday, June 17, 2016

अरे सियासत को समझो ये सब छल है।

इतिहास की बातेँ सब किताबी बात हैं,
आज जो है हक़ीक़त में वही असल है।
घुमा-फिरा कर मत किया करो कोई बात,
बात से ही निकलता हर बात का हल है।
ये कविता, ये गीत, ये दोहे, वो तरन्नुम,
मतला ये है ये सब भी तो एक गजल है।
वो मन्दिर था ये मस्जिद है कहने दो उन्हें,
अरे सियासत को समझो ये सब छल है।
अगर मिलना है तो एक कोशिश करना 'शिशु'
बहुत सुना है ये कहते कि मिलते हम कल हैं
लिखो! जी चाहे जो लिखो पर अपना लिखो,
दूसरों के कॉपी पेस्ट को ही कहते नक़ल हैं।

Monday, June 13, 2016

‎मनकीबात‬

हमारे एक दोस्त हैं। पता नहीं! लगता है आजकल बहुत परेशान हैं या दूसरों को परेशान कर रहे हैं। ज्ञान पर ज्ञान पेले जा रहे हैं। अमूमन ज्ञान व्यक्ति दो परिस्थितियों में देता है या बहुत खुश है या बहुत दुखी। भाई की बातों से लगता है बहुत दुखी हैं और दुखी मन से अपने मन को दूसरों को ज्ञान देकर हल्का हो रहे हैं। पूछा तो बोल रहे हैं कि ‪#‎मनकीबात‬ है।
यही हाल कुछ इधर है। जबसे बीबी मायके गयी है। कुछ मेरा भी ज्ञान पेलने का मन करने लगा है। उट-पटांग शेरो शायरी लिखने लगता हूँ। शहरी भारतीयों के तरह नेताओं पर कटाक्ष कर लेता हूँ, क्यों कि मन हल्का हो जाता है। वैसे आजकल नेताओं पर कटाक्ष के लिए बैलेंस बनाना पड़ता है नहीं तो वो तुमको आप और आप को भक्त साबित कर देंगे और कटाक्ष किये गए पर ऐसा कटाक्ष करेंगे कि अपने मन को हल्का करके आपके मन को हल्का करने पर मजबूर कर देंगे।
एक दौर है आजकल, वैसे छोटे मुंह बड़ी बात होगी लेकिन कहना पड़ेगा कि आलोचना और बुराई दोनों को जबसे मिक्स कर दिया गया है तबसे परेशानियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी हैं। अब किसी की आलोचना करोगे लोग उसे बुराई समझ लेंगे। हो गया मन दुखी, अब करना पडेगा हल्का। अब आलोचना शब्द विलुप्त होता जा है वैसे ही जैसे आपने बोला कि मैं आम आदमी हूँ लोग आप को आपिये समझ लेंगे और जो जोक सुनाएंगे कि आप हंसते हंसते मर जाएँ।
अब लाइक और कमेंट करके तुम लोग भी अपने अपने मन को हल्का कर लो।

Saturday, June 11, 2016

हसरते लखनऊ, दिल में बसी दिल्ली है,

हसरते लखनऊ, दिल में बसी दिल्ली है,
हरदोई रग-रग में भीतर तक समाया है।
सुनते हैं कुरसथ तो होठ खिल जाते हैं,
नागपुर तन-मन में उतना ही भाया है।।
ताम-झाम दूर रहे 'भावना' ये रहती है,
मेहनत से काम करूँ! नाम कुछ कमाया है।
क्षमता है सीखने की ललक अभी बाकी है,
'शिशु' 'हार्दिक' उसकी की छत्र-छाया है।।

सुना है अगले साल चुनाव है!

सुना है अगले साल चुनाव है!
न दौलत न शोहरत न कोई पेंच-दांव है,
उसके पास टूटी पतवार एक छोटी नाव है...
सुना है अगले साल चुनाव है!
न जाति, न धर्म, न कोई हथकंडा है,
बंदूक, अरे उसके पास न न कोई छड़ी-डंडा है,
न ही किसी बड़े दल का कोई झंडा है,
'शिशु' सा है न कोई बनाव है।
सुना है अगले साल चुनाव है!
न खाऊंगा न खाने दूंगा की लय-ताल है,
न ही वो करता कोई हड़ताल है,
और तो और न किसी ऐरे-गैर का कोई दलाल है,
बस चुनाव लड़ने का एक ताव है।
सुना है अगले साल चुनाव है।
जीतेगा नहीं ये हर कोई बोलता है,
उसे पैसे से छोड़ो...
तराज़ू-बाँट से कोई नहीं तौलता है,
ऊपर से देखकर और खौलता है,
क्योंकि उसका नहीं कोई भाव है।
सुना है अगले साल चुनाव है।
सुना है अगले साल चुनाव है!
न दौलत न शोहरत न कोई पेंच-दांव है,
उसके पास टूटी पतवार एक छोटी नाव है...
सुना है अगले साल चुनाव है!