Saturday, September 2, 2017

ख़तम पहले जाति-पांत करें।

अज़नबी ही सही कोई बात करें,
ये सफ़र तय साथ-साथ करें।

दुश्मनी भूल कर दोस्ती से कहो,
नफ़रतों से दो-चार हाँथ करें।

राह में कांटे कंकड़ बहुत हैं यहाँ,
चलो मेहनत दिन और रात करें।

धर्म की बात भी यदि ज़रूरी यहाँ
तो ख़तम पहले जाति-पांत करें।

फ़ोन करते 'शिशु' हैं बराबर, मगर,
वक़्त निकाल चलो मुलाक़ात करें।

Tuesday, August 22, 2017

ज़िन्दगी का नहीं कोई आधार है...

ज़िन्दगी का नहीं कोई आधार है,
गप्पबाज़ी यहाँ अब धुआँधार है।...

झूठ बोलूं न क्यों अब ज़रूरत है ये,
सत्य का आजकल फ़ीका बाज़ार है।

जो गरजते थे कल वो बरसने लगे।
बादलों का लगा देखो अम्बार है।।

शाम से इस शहर में रह भीगता,
सर छुपाने का कोई न आसार है।

मेरे हमदर्द कबसे हैं रूठे 'शिशु',
डाकबाबू न लाया कोई तार है।।

Wednesday, May 24, 2017

रस्म और रिवाज

रस्म एक टोटका है जबकि,
रिवाज में अंधविश्वास की बू आती है।
और धर्म इन दोनों की रक्षक,
वो इन्हें एक साथ आगे बढ़ाती है।।

रस्म और रिवाज़ का विरोध
कोई क्यों नहीं करता है?
क्योंकि व्यक्ति 'आस्था' और
'धर्म' से बहुत डरता है।।

ढोंगी-पाखण्डी इन रस्मों और
रिवाजों के रखवाले हैं।
आस्तिक इनके गुलाम और
'नास्तिक' प्रश्न करने वाले हैं।।

कुछ भी।

रात के सफ़र में आप अकेले नहीं हैं 'शिशु',
चाँद-तारे, हवाओं का कारवां भी साथ है।

उसके प्यार का नशा इस क़दर चढ़ा
'शिशु' अब पीने की नौबत नहीं आती।
इस कदर सँभला हूँ बिगड़कर कि,
मुझमें कोईं सोहबत नज़र नहीं आती।

सोहबत:- वह बात (विशेषतः बुरी बात) जो बुरी संगत के कारण सीखी गयी हो।

शहादत को यूँही कभी भुलाया न जाएगा,
गुनाहगार को कटघरे में लाया ही जाएगा।।
बक्से नहीं जाएंगे जो साँप आस्तीनों में हैं,
उनको पहले ही शूली पर चढ़ाया जाएगा।।

कितनी पी है ख़बर नहीं कुछ,
फिर से कुछ पी लेता हूँ।
रो-रो जीवन कब तक काटूँ,
अब हंस कर जी लेता हूँ।।

गाँव को क़स्बा बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

मील का पत्थर, किनारे पर गड़ा हूँ मैं।
आप गुजरें इस सहारे पर खड़ा हूँ मैं।।

भीड़ है भारी लेकिन हैं बस्तियां सुनसान,
गाँव को क़स्बा बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

प्यार में उसने मुझे क्या देवता बोला,
ख़ुद ही ख़ुद का बुत बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

घर के लोगों में मची है लूट चारों ओर,
इन झमेलों में न जाने क्यों पड़ा हूँ मैं।

युद्ध को भड़का रहे हैं धर्म के रक्षक,
शांति के पैग़ाम के अंदर सड़ा हूँ मैं।।

गाँव का होकर गाँव की नहीं!

गाँव का होकर गाँव की नहीं!
किसी बिरवे की छाँव की नहीं!
धूल और नंगे पाँव की नहीं!
नदी में तैरती नाव की नहीं!
तो बात किसी करूँगा 'शिशु'!

Tuesday, April 4, 2017

अग्नि की अब परीक्षा ज़रूरत नहीं

राम का जन्म दिन हो मुबारक़ सभी,
कर्म का फ़ल मिलेगा अभी के अभी।
हो पुनर्जन्म का कोई झंझट नहीं,
पूर्ण कारज करो जी अभी के अभी।।

अग्नि की अब परीक्षा ज़रूरत नहीं,
कौन कहता है तुम ख़ूबसूरत नहीं।
राम की झूठी कसमें न खाया करो,
राम दिल में बसे कोई मूरत नहीं।

भाई कैसे मिले राम जैसा कहीं-
जब लखन न मिले उनके जैसा कहीं।
बात रिश्तों की बनती-बिगड़ती गयी
बाप मिल जाएंगे, मिलता पैसा नहीं।।

धारणा बन गयी पैसे का है समय,
अब गरीबों का बिल्कुल नहीं ये समय।
आ गया अब समय आप जैसों का है,
मेरे जैसों का बिल्कुल नहीं ये समय।।

Wednesday, February 15, 2017

असली न लोग रंग किसको लगाऊं मै.....

रंग भी न असली है ढंग भी न असली है,
असली न लोग रंग किसको लगाऊं मै!
रंग किसको लगाऊं मै!

प्यार है दिखावा ही प्रेमिका न अपनी है,
अपनी न भाभी कोई सारी ही मैडम हैं !
रंग किसको लगाऊं मै!

भीड़-भाड़ इतनी है मेला हाट जितनी है,
कौन कौन अपनों है कुछ न समझ आवे है!
रंग किसको लगाऊं मै!

इंग्लिश ही मिलती है देशी का नाम नहीं,
'और हम जैसे लोंगन का यंहा कोई काम नहीं !
रंग किसको लगाऊं मै!

'शिशु' कहें पीने पिलाने का दौर यंहा कन्हा,
जितना मज़ा गाँव में है उतना और कन्हा
रंग किसको लगाऊं मै!

प्रातःकाल करो मतदान, वोट कीमती है जानो।

पाँच साल का समय बहुत है,
यदि कुछ करने की इच्छा है।
अब तक वोटर को नेता से,
मिली भीख में बस भिक्षा है।।

समय के अपराधी होंगे हम,
अब भी नहीं चेतना जागी।
अपना वोट डालने की यदि
ख़ुद में लगन नहीं लागी।।

फिर पीछे से मत कहना,
सब नेता भ्रष्टाचारी हैं।
'शिशु' समझ में ये आयेगा,
बुद्धि भ्रष्ट तुम्हारी है।।

प्रातःकाल करो मतदान,
वोट कीमती है जानो।
लोकत्रंत के इस संगम की
महिमा को सब पहचानों।।
#उत्तरप्रदेश #चुनाव कुरसठ युवा मंच

Monday, February 13, 2017

कविता का शीर्षक आप जो उचित समझें।


बाग़ हुए ग़ायब क्यों-
पसरा खेतों में सन्नाटा है।
क्यों हमने खेती की ख़ातिर
तालाबों को पाटा है?

पगडंडी को काट-छाँट कर
फ़सलें बोयी जाती क्यों?
चरागाह के लिए नज़र अब
भूमि नहीं आती है क्यों?

सड़क किनारे आम और
महुए के पेड़ नहीं दिखते।
क्यों पढ़ने-लिखने वाले अब
इन पर शोध नहीं लिखते?

सुना है विद्यालय, शिक्षा की-
परिभाषा है बदल गयी।
पढ़ने और पढ़ाने वालों की
भाषा भी बदल गयी।।

'शिशु' याद हैं वो दिन,
जब हम विद्यालय जाते थे।
उपयोगी शिक्षा के साथ
ज्ञान प्राकृतिक पाते थे।

याद आ गए बाग़ और वो-
जंगल जिनमें जाते थे।
जहाँ इमलिया, खट्टे बेर
यार-दोस्त संग खाते थे।।

अब विद्यालय के नज़दीक
कोई बाग़ नहीं दिखते।
पर्यावरण प्रदूषण पर अब
बच्चे हैं निबंध लिखते।।

Tuesday, August 16, 2016

'शिशु' गुजरी है वो गुजर गयी,

'शिशु' गुजरी है वो गुजर गयी,
अब अमन चमन में बना रहे।
वो चले गए ग़म बहुत भरा,
दिल प्यार में उसके सना रहे।
पतझड़ में पत्ते गिरते हैं,
पर जड़ के साथ में तना रहे।
अब जीत गए तब कहते हैं,
मंहगाई का पेड़ ये घना रहे।
उनको समझा था नेक हैं दिल,
वो सांप अभी फन फना रहे।

मिलते हैं भीड़ में, और खो जाते हैं।

मिलते हैं भीड़ में,
और खो जाते हैं।
इनमें कुछ ख़ास,
अपने से हो जाते हैं।।
पता ही नहीं क्यों,
हम याद करते हैं।
वो अनजान हैं,
बताने से डरते हैं।
सपनों में खो जाते हैं।
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
कई बार ऐसा होता है
वो आते ही मुड़ते हैं
बिना बात किये ही
एक दुसरे से जुड़ते हैं
फिर अपने आप में खो जाते हैं
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
कहीं धुप में छाता लिए,
कभी बारिश में भीगते हुए।
और चले जा रहे हैं मस्ती में
यूँ ही रीझते हुए।
दिल में खिंचे चले आते हैं
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
एक हल्की सी आहट,
उनकी वो मुस्कराहट,
ये बंदिशों की रेखा,
'शिशु' पलटकर नहीं देखा।
चलो अब सो जाते हैं।
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।

भक्त संग आपिया भी महंगाई का मारा है।

हाय महंगाई है! हाय महंगाई 'शिशु'
शोर चहुँओर सुनायी रहा भोर से।
जाति-धर्म इसका न सभी जन एक हैं,
त्राहि-माम त्राहि-माम सुनो सभी छोर से।।
बड़े बड़े लोग भी दाल-भात बोल रहे,
कितने बेहाल सभी भेद जो हैं खोल रहे।
आते-जाते पैदल ही हेल्थ की दुहाई देते।
अच्छे दिन कहाँ हो, ख़ुदा की ख़ुदाई लेते।
हैं इतने बेहाल, अब होता न गुजारा है,
भक्त संग आपिया भी महंगाई का मारा है।

'शिशु' पान के ऐसे हैं अजब अनोखे किस्से।

बिन चूने का पान चबाकर चौबे बाबा बोले।
बचा-खुचा भी ऐसे बीते जय शिवशम्भू भोले।
लौडे चक्कर लगा रहे हैं सभी पान के खोखा।
घरवालों को चकमा देकर दुकानदार को धोखा।।
चूना कम कत्था है ज्यादा, खाकर बोले कोके,
उधरा पूरा मिल जायेगा, हमका काहे हो रोके।
खाके मीठा पान, पिचकारी थूक की छोड़ी।
घुमि रहे हैं गॉव में शोहदा हंसी हँसे हैं भोंडी।।
'शिशु' पान के ऐसे हैं अजब अनोखे किस्से।
लिखते रहो दोस्तों इसमें अपने भी हिस्से।।

...असल में जिंदगी सब कुछ हमें वहीं सिखाती है।

जहाँ न दूर-दूर कोई भी परिंदा दिखता है,
वहीं बैठ कवि अपनी कविता लिखता है।
जहाँ तक नज़र जाती है पानी ही पानी है,
वहां एक लेखक लिख सकता कहानी है।
जहाँ शोर नहीं, केवल सन्नाटा ही सन्नाटा है,
असल में किसान वहीं कहीं अन्न उपजाता है।
जहाँ दुःख और तकलीफ़ बहुत नज़र आती है,
असल में जिंदगी सब कुछ हमें वहीं सिखाती है।
जहाँ, प्रेम, करुणा, दया आदि बातें होती हैं,
'शिशु' असल में दुनियां वहां जाकर रोती है।

बोलिये! क्यों मौन हो?


बोलिये! क्यों मौन हो?
है शमा जब खूबसूरत,
तब 'शिशु' बेचैन हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?
तपतपाती धूप है तो
छाँव मैं बन जाऊंगा।
आँधियाँ आएं तो क्या
दयार मैं बन जाऊंगा।।
है गुज़ारिश एक ये-
मत कहो तुम कौन हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?
हो खुशी का आशियाना,
जिंदगी में ग़म न हो।
आंशुओं के साथ मैं हूँ,
आँख अब ये नम न हो।।
हो उजाला ज़िन्दगी में
दीप में कम लौ न हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?
सात जन्मों की न कसमें,
हों न झूठी कोई रश्में।
इस तरह हो साथ अपना,
हमसफ़र सच हो ये सपना।।
ये सफऱ चलता रहे बस
साल चाहें सौ न हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?

Sunday, July 17, 2016

देश गर्त में चला गया फिर बाद में भाड़ को झोकोगे

गंगा, गाय है उनका मुद्दा, जिनका भ्रष्टाचार था।
अब बेकाबू बोल रहे हैं, पहले शिष्टाचार था।।
महंगाई को कोस रहे थे, पीकर महंगा पानी।
हाय हाय के नारे देकर, बोले कड़वी बानी।।
अब सत्ता में आते ही, महंगाई को भूल गए।
जाने कितने ही किसान फांसी पर हैं झूल गए।।
काला धन - काला धन, जो बोले थे जोर से।
युवा जोश में जाग गया था, बहुत सवेरे भोर से।।
सोचा था काले धन में, जो पैसा मिल जायेगा।
मिलने वाले 15 लाख से एक कोट सिल जायेगा।।
अब ट्वीटर पर गाली देते, लेखक लिखने वालों को।
बोल रहे हैं देश द्रोही हैं मारों इन सब सालों को।।
'शिशु' लगा मुँह पर ताला है लिखना कैसे रोकोगे।
देश गर्त में चला गया फिर बाद में भाड़ को झोकोगे।।

अब सत्ता में करते मौज इन्हें न हिलना पड़ता है!

ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।

भ्रष्टाचार विरोधी आँधी अण्णा जी की आयी थी।
उसी विरोधी रैली ने ही कुछ की मौज बनायी थी।।
नेताओं के रहे विरोधी, उनकी हंसी उड़ाते थे।
लोकतंत्र में लोकपाल का सबको पाठ पढ़ाते थे।।
अब सत्ता में करते मौज इन्हें न हिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

आम आदमी दिल्ली वाले हरदम रोते रहते हैं।
काम न करने मोदी देते ऐसा सबसे कहते हैं।।
कहाँ कभी कहते फिरते थे लोकपाल वो लाएंगे।
भ्रष्टाचार ख़त्म होगा तब घूस न कोई खायेंगें।।
मुफ़्त की वाई-फाई खातिर उनसे मिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

ऐसे-ऐसे थे उपदेशक काला धन ही रटते थे।
टीवी की लंबी बहसों से पीछे कभी न हटते थे।।
योगा एक बहाना है बस, ये तो बनिया पक्के हैं।
आज देख के इनकी पूंजी हमसब हक्के-बक्के हैं।।
फटे पार्क में जो कपड़े थे उनको सिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

शाखा वालों ने पब्लिक को ऐसा पाठ पढ़ाया।
कांगेस के दुश्मन से फिर अपना हांथ बढ़ाया।।
कुछ ऐसा हो गया अचंभा सूरज पूरब अस्त हुआ।
भ्रष्टाचारी कांग्रेस फिर इनके आगे पस्त हुआ।
महंगाई के कीचड़ में कमल को खिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

अब महंगाई की बात करो तो रोना रोने लगते हैं।
खड़ी फसल में जोत दुबारा फसलें बोने लगते हैं।
बात वहीं की वहीं रही कुछ बदला हो बतलाओ जी।
कसम तुम्हें है सिया राम की झूठी कसम न खाओ जी।।
ऐसे वैसे मुद्दों में फिर 'शिशु' कोे पिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

अब सत्ता में करते मौज इन्हें न हिलना पड़ता है!
मुफ़्त की वाई-फाई खातिर उनसे मिलना पड़ता है!
फटे पार्क में जो कपड़े थे उनको सिलना पड़ता है!
महंगाई के कीचड़ में कमल को खिलना पड़ता है!
ऐसे वैसे मुद्दों में फिर 'शिशु' कोे पिलना पड़ता है!
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है!!!

Saturday, June 25, 2016

हर शख़्स कीमती, किसी का मोल न मोलो।

झूठ जो बोलें, न उनसे झूठ तुम बोलो,
हैं खोलते गर भेद, उनके भेद न खोलो।
मीठी जुबाँ से बात करता है सभी से 'शिशु',
आप भी हर बात में रस कान में घोलो।
क्या हुआ जो साथ चलते हैं नहीं अपने,
ग़ैर हैं तो क्या हुआ कुछ साथ तुम होलो।
लगे न ठेस बातोँ से, न हो कोई कभी रुसवा,
बात जब भी हो, उसे सौ बार तुम तोलो।।
बख्श इज्ज़त, कर सभी का मान और सम्मान,
हर शख़्स कीमती, किसी का मोल न मोलो।

अब दिख गया हकीकत में कौन-कौन है..

हम दुःखी हैं पर राहत की बात ये है 'शिशु' 
पता चल गया अपना और पराया कौन है। 
बड़ा सुना था कहते कि सुख-दुःख में साथ हैं,
अब दिख गया हकीकत में कौन-कौन है।

सरे आम रहजनी हो गयी गाँव हमारे आज

सरे आम रहजनी हो गयी गाँव हमारे आज,
लुटा टमाटर, आलू, तेल और पाव भर प्याज,
और पाव भर प्याज, मित्रों दुख़दायी क्षण है,
जबकि, नेताजी के लिए यही चुनावी रण है,
'शिशु' कहें कुछ सालों से महंगाई ही चुनाव है,
रहजन ही बनाता चुनाव का असली तनाव है।

Friday, June 17, 2016

अरे सियासत को समझो ये सब छल है।

इतिहास की बातेँ सब किताबी बात हैं,
आज जो है हक़ीक़त में वही असल है।
घुमा-फिरा कर मत किया करो कोई बात,
बात से ही निकलता हर बात का हल है।
ये कविता, ये गीत, ये दोहे, वो तरन्नुम,
मतला ये है ये सब भी तो एक गजल है।
वो मन्दिर था ये मस्जिद है कहने दो उन्हें,
अरे सियासत को समझो ये सब छल है।
अगर मिलना है तो एक कोशिश करना 'शिशु'
बहुत सुना है ये कहते कि मिलते हम कल हैं
लिखो! जी चाहे जो लिखो पर अपना लिखो,
दूसरों के कॉपी पेस्ट को ही कहते नक़ल हैं।

Monday, June 13, 2016

‎मनकीबात‬

हमारे एक दोस्त हैं। पता नहीं! लगता है आजकल बहुत परेशान हैं या दूसरों को परेशान कर रहे हैं। ज्ञान पर ज्ञान पेले जा रहे हैं। अमूमन ज्ञान व्यक्ति दो परिस्थितियों में देता है या बहुत खुश है या बहुत दुखी। भाई की बातों से लगता है बहुत दुखी हैं और दुखी मन से अपने मन को दूसरों को ज्ञान देकर हल्का हो रहे हैं। पूछा तो बोल रहे हैं कि ‪#‎मनकीबात‬ है।
यही हाल कुछ इधर है। जबसे बीबी मायके गयी है। कुछ मेरा भी ज्ञान पेलने का मन करने लगा है। उट-पटांग शेरो शायरी लिखने लगता हूँ। शहरी भारतीयों के तरह नेताओं पर कटाक्ष कर लेता हूँ, क्यों कि मन हल्का हो जाता है। वैसे आजकल नेताओं पर कटाक्ष के लिए बैलेंस बनाना पड़ता है नहीं तो वो तुमको आप और आप को भक्त साबित कर देंगे और कटाक्ष किये गए पर ऐसा कटाक्ष करेंगे कि अपने मन को हल्का करके आपके मन को हल्का करने पर मजबूर कर देंगे।
एक दौर है आजकल, वैसे छोटे मुंह बड़ी बात होगी लेकिन कहना पड़ेगा कि आलोचना और बुराई दोनों को जबसे मिक्स कर दिया गया है तबसे परेशानियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी हैं। अब किसी की आलोचना करोगे लोग उसे बुराई समझ लेंगे। हो गया मन दुखी, अब करना पडेगा हल्का। अब आलोचना शब्द विलुप्त होता जा है वैसे ही जैसे आपने बोला कि मैं आम आदमी हूँ लोग आप को आपिये समझ लेंगे और जो जोक सुनाएंगे कि आप हंसते हंसते मर जाएँ।
अब लाइक और कमेंट करके तुम लोग भी अपने अपने मन को हल्का कर लो।

Saturday, June 11, 2016

हसरते लखनऊ, दिल में बसी दिल्ली है,

हसरते लखनऊ, दिल में बसी दिल्ली है,
हरदोई रग-रग में भीतर तक समाया है।
सुनते हैं कुरसथ तो होठ खिल जाते हैं,
नागपुर तन-मन में उतना ही भाया है।।
ताम-झाम दूर रहे 'भावना' ये रहती है,
मेहनत से काम करूँ! नाम कुछ कमाया है।
क्षमता है सीखने की ललक अभी बाकी है,
'शिशु' 'हार्दिक' उसकी की छत्र-छाया है।।

सुना है अगले साल चुनाव है!

सुना है अगले साल चुनाव है!
न दौलत न शोहरत न कोई पेंच-दांव है,
उसके पास टूटी पतवार एक छोटी नाव है...
सुना है अगले साल चुनाव है!
न जाति, न धर्म, न कोई हथकंडा है,
बंदूक, अरे उसके पास न न कोई छड़ी-डंडा है,
न ही किसी बड़े दल का कोई झंडा है,
'शिशु' सा है न कोई बनाव है।
सुना है अगले साल चुनाव है!
न खाऊंगा न खाने दूंगा की लय-ताल है,
न ही वो करता कोई हड़ताल है,
और तो और न किसी ऐरे-गैर का कोई दलाल है,
बस चुनाव लड़ने का एक ताव है।
सुना है अगले साल चुनाव है।
जीतेगा नहीं ये हर कोई बोलता है,
उसे पैसे से छोड़ो...
तराज़ू-बाँट से कोई नहीं तौलता है,
ऊपर से देखकर और खौलता है,
क्योंकि उसका नहीं कोई भाव है।
सुना है अगले साल चुनाव है।
सुना है अगले साल चुनाव है!
न दौलत न शोहरत न कोई पेंच-दांव है,
उसके पास टूटी पतवार एक छोटी नाव है...
सुना है अगले साल चुनाव है!

Friday, April 22, 2016

'शिशु' अकेले चलो डगर पर अपने कोई न संग।।

है कितना बेदर्द जमाना, लोग सभी बेगाने हैं,
कुछ अपने ऐसे हैं जैसे हनी सिंह के गाने हैं।।
हिट होते वो लोग भी ऐसे जैसे नए तराने हैं,
गद्य में योयो हनी घुसा है पद्य के नहीं ठिकाने हैं।।
मंडराते हैं आसमान में जैसे उड़ता हो कोई गिद्ध,
सबसे बड़े हितैषी बनते, अपने को करते हैं सिद्ध।।
देख हकीकत इसकी-उसकी आँखे रह गयी दंग।
'शिशु' अकेले चलो डगर पर अपने कोई न संग।।

Wednesday, January 20, 2016

हुज़ूर पाबंदियाँ लगा दीजिये!

हुज़ूर पाबंदियाँ लगा दीजिये!

हमारे लिखने पर
और उसके पढ़ने पर
बच्चों के चित्रों गढ़ने पर
हुजूम के बढ़ने पर
हुज़ूर पाबंदियाँ लगा दीजिये!

दूसरे सभी रंगो पर
खुली उमंगो पर
इसके कहने पर
उसके कुछ न कहने पर
हुज़ूर पाबंदियां लगा दीजिये!

लोगों के चुने हुए खाने पर
खुले आम गाने पर
लड़कियों के आने-जाने पर
और दोस्तों के मनाने पर
हुज़ूर पाबंदियां लगा दीजिये! 

Tuesday, October 20, 2015

गाय हमारी माता है हमको कुछ नहीं आता है

एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री ने कहा था "man is a social animal"  (मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।) जैसा कि विज्ञान भी बताता है कि इंसान मूलरूप से जानवर ही है। उसके बाद आगे एक और समाजशास्त्री ने कहा कि ‘समाज समाजिक संबंधों का जाल या ताना-बाना है’। मनुष्य के सामाजिक प्राणी बनने का एक लंम्बा इतिहास रहा है। जैसा कि हमने इतिहास में पढ़ा कि आदिकाल में मानव का जीवन कठिनाइयों का संघर्षों में बीता। अपना अस्तित्व बनाने रखने के लिए आदिमानव ने कच्चा मांस खाना। इसके काफ़ी बाद उसने भुना मांस खाना सीखा और फिर कालांतर में उसने पशुओं को पालना, खेती करना, व्यापार करना आदि आदि सीखा। 

लेकिन वास्तविक संघंर्ष मनुष्य के जीवन में तब आया जब कुछ लोगों को लगा कि वे अब सभ्य हो गये हैं और बाकियों को भी सभ्य बनाया जाय। ये सभ्य और असभ्य की परिभाषा गढ़ने वाले लोग ही मानवजाति को विघटन और टकराव के लिए आगे ले जाने लगे। यही वो लोग थे जिन्होंने कुलीनता, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, नैतिक, अनैतिक, जाति, सत्य, झूठ और दैवीय प्रभाव आदि आदि चीजों को जन्म दिया। इसके बाद धर्म के क्षेत्र में अति-वैयक्तिकरण बढ़ा और नतीजा यह हुआ कि धर्म व्यक्ति और समाज और राष्ट्र से अधिक महत्वूपर्ण हो गया। उन लोगों के लिए जिनमें धर्म की गहनता गहराई तक जम गयी, से ही नस्लीय चेतना का जन्म हुआ।

नस्लीय चेतना एवं धर्म और आस्था का अधिक प्रचार और प्रसार भारत में तब और अधिक बढ़ गया जब लुटेरे मुसलमान घुमंतुओं के आक्रमण हुए उसके बाद गोरों ने अपने फा़यदे के लिए उन्हें आपस में लड़ाना-भिड़ाना सिखाना शुरू किया। उसके बाद ही टकराव और तबाही के सिलसिले शुरू हुए।

अंग्रेज़ों की यह रणनीति इतनी का़रगर साबित हुई कि उन्होंने हर वर्ग और समुदाय के लोगों को उन्होंने आपस में लड़ाना-भिड़ाना शुरू कर दिया और इसके लिए उन्होंने धर्म रूपी हथियार को प्रयोग में लाया। फलस्वरूप व्यकि के खाने-पीने, रहने-सहने और पहनने और संस्कृति में वैमनस्य का रूप ले लिया! 

मांस खाना या न खाना व्यक्ति की अपनी इच्छाओं और स्वाद पर न निर्भर होकर धार्मिक विचारधारा में बदल गया! यहाँ एक उदाहरण द्वारा देखेंगे कि कैसे व्यक्ति अपनी इच्छा को अपने अंतिम दिनों में जान पाता है - एक व्यक्ति जो आजन्म शाकाहारी रहे। लेकिन एक गंभीर बीमारी की वजह से डाॅक्टरों ने उन्हें मांस खाने की सलाह दी, इस पर वो बिदग गये, बोले मैं मर जाउं या जिन्दा रहूं लेकिन मांस नहीं खाउंगा। लेकिन पुत्रों के पिता के प्रति लगाव के कारण उन्हें बिना बताये मांस परोसा गया, उन्होंने चाव से खाया। फिर दो तीन दिनों बाद वही भोजन खाने की इच्छा व्यक्त की, इस पर कुछ झिझकते हुए उन्हें उनके पुत्रों ने हकीकत बतायी। इस पर पहले तो काफ़ी झिझके उसके बाद खुद पर खीझते हुए बोले अब पता चला कि लोग मांस क्यों खाते हैं, पूरी जिंदगी यूं ही घास-फूस (शाकाहारी भोजन) पर ही बीत गयी। (इस कहानी में हम देखते हैं कि व्यक्ति की खाने इच्छा उसके स्वाद न ले पाने की वज़ह से जागृत हुयी!)

अब हम देखेंगे कि कैसे प्रागऐतिहासिक काल से मनुष्य मांस खाता था (ज्यादातर लोग इसके पीछे दलील देते हैं कि ऐसा इसीलिये था कि संभव हो उस समय धर्म की उत्पत्ति न हुयी हो) धर्म के जानकार लोग मानते हैं कि किसी भी धर्म या शास्त्र में यह नहीं लिखा कि मनुष्य को मांस नहीं खाना चाहिए। हां यह ज़रूर लिखा मिल जायेगा कि जीवों पर दया करो। जब जीवों पर दया करों का वास्तविक अर्थ व्यक्ति किस रूप में लेता है यह हर व्यक्ति की अपनी-अपनी विचारधार पर निर्भर करता है। कैलिफ़ोर्निया के शेक्सपियर क्लब में फ़रवरी 2, 1900 को ‘बुद्धकालीन भारत’ विषय पर बोलते हुए स्वामी विवेकानंद ने बताया था, अगर मैं आपसे यह कहूंगा कि पुरानी परम्पराओं के अनुसार वह अच्छा हिन्दू नहीं था, जो गोमांस न खाता हो, तो आपको आश्चर्य होगा। कुछ विशेष अवसरों पर उसे एक बैल की बलि देनी पड़ती थी और उसे खाना पड़ता था। (विवेकानंद, ‘द कम्पलीट वक्रस् आॅफ़ स्वामी विवेकानंद’ खंड-2, पृष्ठ-536, अद्वैत आश्रम, कोलकाता, 1997)। इसके अलावा वैदिक भारत के आधिकारिक विद्वान सी. कुन्हन राजा प्राचीन भारत में गोमांस खाने के बारे में लिखते हुए बताते हैं कि, ब्राम्हणों सहित वैदिक आर्य मछली, गोश्त और यहां तक कि गोमांस भी खाते। लेकिन दुधारू गावों को नहीं मारा जाता था। एक गाय जिसका नाम (गोघना) था उसे अतिथि के सत्कार के लिए मारा जा सकता था। (सी कुन्हन राजा, ’वैदिक कल्चर’ सुनीति कुमार घोष तथा अन्य द्वारा संपादिल पुस्तक ‘द कल्चरल हेरिटेज आॅफ़ इण्डिया’, खण्ड-3, पृष्ठ-217, रामकृष्ण मिशन, कोलकाता, 1997, ‘मनु स्मृति’ के अध्याय 5 को भी देखें।)

यहाँ लोगों को इस लेख से यह नहीं समझना चाहिए कि मांस खाना चाहिए या नहीं खाना चाहिए। लेकिन समाज को अपनी समझ विकसित करते हुए यह ज़रूर समझना चाहिए कि किसी अफ़वाह में न पड़ें। और धर्म के नाम पर लड़-झगड़कर शर्मिंदा न हों और दूसरों को भी शर्मिंदा न करें।

Monday, April 27, 2015

मानव द्वारा है ये विकसति है या प्रकोप ये प्रकृति द्वारा

मानव द्वारा है ये विकसति है या प्रकोप ये प्रकृति द्वारा,
हे मानव! इस कटु सत्य से तुम कर सकते नहीं किनारा।
आया है भूकम्प भयावह गली गाँव की सूनी है
शहरों की दुर्गति देखो पर इससे अधिक चौगुनी है
हाहाकार मचा चहुंओर, मानव तुझको घूर रहा
और प्रशासन-शासन भी आगे तेरे मज़बूर रहा
'शिशु' की मानव से अपील ये-सुधर, न अब कर देर
प्रकृति से खिलवाड़ किया तो वो ना देखे देर-सबेर।।

Thursday, November 28, 2013

देखा! सच! अजी हां!

देखा!
ज्ञान बांटने वाले-
कितने अत्याचारी हैं?
बाबा, लेखक, जज साबह भी
निकले सब व्यभिचाारी हैं।
बात पते की एक बताउं
सब-के-सब व्यापारी हैं।
ठगे गये 'शिशु' इनके हाथों
कैसी ऐ लाचारी है!

सच!
अबकी बार चुनाव मजे का
मुश्किल में सब नेता हैं।
सभी बोलते हम दिल्ली के
अबकी बार विजेता हैं।
वोटर है चालाक बहुत ही
सबके पर्चे लेता है।
अब 4 दिसम्बर पता चलेगा
किसको वोट वो देता है।

अजी हां!
कौन देखता है तुम बेंचो
मंहगा अपना माल,
प्याज के दाम घटा दो थोड़े
मंहगे करो टमाटर लाल
फंस जायेंगे सब-के-सब ही
फंको अपने तुम जाल
जनता है वेवकूफ बहुत ही
उसको होने दो बेहाल।।

Sunday, October 27, 2013

तल्ख़ जुबां कुछ तेरी ऐसी ज़हर घुला है बातों में

कितनी पी है ख़बर नहीं कुछ
फिर से कुछ पी लेता हूँ
जितनी बार याद आती तू  
मर के मै जी लेता हूँ।

हालत मेरी है ऐसी कुछ
जिसका कोई इल्म नहीं
रात-रात को कलम उठाकर
कुछ ना कुछ लिख लेता हूँ

वफ़ादार या कहें बेवफ़ा
इसमें तेरा कोई दोष नहीं
अनजाने ही बोल दिया है
वरना मै बेहोश नहीं।

तल्ख़ जुबां कुछ तेरी ऐसी
ज़हर घुला है बातों में
वरना क्या मज़ाल है किसकी
क़त्ल करें जो रातों में ....

'शिशु' आजकल बहुत अकेले
रात में है कुछ गुजर नहीं
ऐसी है कुछ दुनियादारी
इसमें मेरी बसर नहीं।।

Friday, October 25, 2013

हे प्याज देवता! आओ बाज! कितना हमें रुलाओगे?

हे प्याज देवता! आओ बाज!
कितना हमें रुलाओगे?
पहले तुमको छीला करते तब आंसू थे आते
अब तो देव देखकर तुमको ही आंसू आ जाते
कितने दाम बढ़ाओगे।
अब कितना हमें रुलाओगे?

हे प्याज देवता! आओ बाज!
अब कितना हमें रुलाओगे?

रुखी-सूखी रोटी-प्याज ही गरीब हैं खाते,
कभी-कभी तो बिना ही खाये सब-के-सब सो जाते
कब तक तुम तरसाओगे,
अब कितना हमे रुलाओगे।

हे प्याज देवता! आओ बाज!
अब कितना हमें रुलाओगे?

देव आपके चक्कर में हैं नेता चांदी काट रहे
जितने हैं बिचौलिये सारे धन आपस में बांट रहे
पर आप नहीं कुछ पाओगे।
अब कितना हमें रुलाओगे?

हे प्याज देवता! आओ बाज!
अब कितना हमें रुलाओगे?

धनिया, मिरच, टमामट, आलू अपना ताव दिखाते हैं
सभी आपके ही चक्कर में हमको देव सताते हैं
क्या ये सरकार गिराओगे?
या फिर ऐसे हमें रूलाओगे।

हे प्याज देवता! आओ बाज!
अब कितना हमें रुलाओगे?

Friday, June 21, 2013

नेता तो बस नेता है

नेता तो बस नेता है

चाहें हिन्दू चाहें मुस्लिम फिर चाहें ईसाई हो
सगे पाप को धोखा देता, चाहे उसका भाई हो
जनता तो फिर गैर-परायी उसको कुछ ना देता है
नेता तो बस नेता है।

पांच साल के बाद मिलेंगे गाँव हमारे आयेंगे
उससे पहले संसद-मंदिर में हलुआ सब खायेंगे
संसद निधि से अपनी जेब में सब धन वो भर लेता है
नेता तो बस नेता है।

खुद की मुरति पार्क लगाते खुद ही अनावरण करते
अपने चमचों को ठेका दे पैसे का जुगाड़ करते
जनता के दुख भाड़ में जाएँ, अपने दुःख हर लेता है
नेता तो बस नेता है।

Monday, April 29, 2013

जीवन की बहती धारा में संयम और विशवास नहीं,


जीवन की बहती धारा में-
संयम और विशवास नहीं,
प्यार मोहब्बत मिलना मुश्किल
अब हंसना भी कुछ ख़ास नहीं।

झूठी आशा, घोर निराशा,
अपनों से कोई आश नहीं,
उन्नति देखी इसकी-उसकी,
यह हमको बर्दाश्त नहीं.

बिल वजह की बहस हो रही
मुर्दा है यह लाश नहीं,
बदबू आती कूड़ाघर से,
कहना इसको बास नहीं।

जो भी पढ़ा-लिखा बचपन में-
वह सच्चा इतिहास नहीं,
ले-देकर लिखवाया जाता-
मंदिर-मस्जिद पास नहीं।

राजनीति की बातें करना-
'शिशु' के बस की बात नहीं,
गांधी जी का चेला बनना-
भी मेरी औकात नहीं।

Friday, March 29, 2013

भैंस बेंच कर चमरौधा में पी गए चाचा दारू...

भैंस बेंच कर चमरौधा में पी गए चाचा दारू,
फिर बाद में खेली होली।
चाची जी को पता लगा तब कड़वे बैन वो बोलीं-
बोलीं, उल्लू, गाँव में चली गयी गोली-
तुम खेलति हो होली!!
सुनकर इतना आग बबूला, बन गए चाचा चोर,
जेवर घर से चोरी हो गया घर में मच गया शॊर....
भांग का नशा निराला, अब घर का निकल गया दीवाला ...
पहले पी थी देशी दारू, अब पी गए अंगरेजी,
उसके ऊपर भांग खा गए, बोले मै हूँ क्रेजी-
घर बिक जाए, खेत हो गिरवीं, या हो जाऊं कंगाल,
हो जाए बदनाम नाम ये कुछ भी नहीं मलाल।।।
बस होली में गाल रहें ये लाल....
सही लिखते हैं जी शिशुपाल ....
हमारे गाल रहें ये लाल।।

Sunday, October 21, 2012

बाबा! चेला बन जाऊं मै या बन जाऊं नेता?

भक्त!
एवमस्त!
 
बाबा! चेला बन जाऊं मै या बन जाऊं नेता,
या बन जाऊं पोल खोलने वाला या फिर अभिनेता?
 
भक्त! आजकल बाबा हों, चाहें हों सरकार
बिना मीडिया के दोनों ही पूरे हैं बेकार
नेता की भी बिना मीडिया ना कोई पहचान
पोल खोलने वालों का भी इसके बिना न मान
 
इसीलिये है एक सलाह!
समझ इसे तू नेक सलाह!
 
चैनल खबरी खोल एक ले,
कुछ चंदा मै दूंगा कुछ देगी सरकार
कुछ देगें नेता अभिनेता
बैंक से ले ले और उधार
 
समझा!
ऐसे होगी नैया पार...
ऐसे होगी नैया पार...

Wednesday, April 4, 2012

चाह नहीं बन मुख्यमंत्री, फोटो अपनी मैं लगवाऊं.

चाह नहीं संसद की कुर्सी पिछवाड़े अपने चिपकाऊं.
चाह नहीं बन मुख्यमंत्री, फोटो अपनी ही लगवाऊं. 
चाह नहीं अन्ना की टीम जैसी दुर्गति मैं करवाऊं. 
मेरी चाह बड़ी साधारण साधारण ही मैं कहलाऊं...

चाह नहीं बढ़ जाए सैलरी चापलूस की श्रेणी पाऊं. 
चाह नहीं दूजों के काम में रोड़ा बीच में मैं अटकाऊं.
चाह नहीं है काम छोड़कर छुट्टी लेकर घर मैं जाऊं. 
मेहनत की है, मेहनत का फल मेहनत से ही मैं फिर पाऊं. 

चाह नहीं अमिताभ साथ में मैं अपनी फोटो खिंचवाऊं 
चाह नहीं ऐश्वर्या के बच्चे का नाम सुझाऊं 
चाह नहीं एनजीओ का मैं डायरेक्टर कहलाऊं 
'शिशु' की यही हार्दिक इच्छा बच्चा फिर से मैं बन जाऊं. 

Friday, January 27, 2012


१ 
कब तक तेरी राह तकूँ मैं 
कब तक चाहूँ तुझको! 
जनम-जनम का रिश्ता कहकर
तो ठगती है मुझको !! 
२ 
नयी चाल चल रहा चुनाव
बोला - देना वोट जरूरी!
सोच समझ कर देना वोट
ये तेरी मजबूरी!!
देश महान बना नेता से,
नेता जी ही चोर!
पांच साल तक नज़र न आये, 
अभी मचाते शोर !!
'शिशु' आंख से मोती टपके, 
पलके भीग गयीं मेरी!
कितने दिन हो गए मिलन को 
अब तो मत कर तू देरी!!
कल, मिली पार्क में पहली वाली 
कहता था जिसको दिलवाली!
आह एक दिल से है निकली,
बोला दिल ने धत साली!!

Tuesday, November 8, 2011

अन्ना ना तेरे हैं, ना मेरे हैं, अन्ना को अब सब घेरे हैं...

ना तेरे हैं, ना मेरे हैं,
अन्ना को अब सब घेरे हैं...

इधर मीडिया बोल रही है 
अन्ना सच्चे गांधीवादी. 
उधर मीडिया बोल रही है 
अन्ना ही असली बरबादी

भ्रष्टाचार मिटेगा पूरा-  
सच! अन्ना टीम बोलती है.
उधर मीडिया अन्ना टीम का
सच! सच में भेद खोलती है.

'शशि शेखर'* 'शिशु' बोल रहे हैं 
अन्ना हुए सियासी हैं.
कांग्रेसी के दिग्गी-दिग्गज 
बोले अन्ना बासी हैं. 

अन्ना की अनचाही टीम 
अन्दर-अन्दर टूट रही.
जिसको नहीं मिला पद-पदवी 
वो अन्ना से रूठ रही.

भ्रष्टाचार ख़तम होगा क्या? 
क्या राम रज्य आ जाएगा?
या यह भ्रष्ट व्यस्था ही 'शिशु' 
अन्ना को खाजेगा
सोचा आज सवेरे है 
ना तेरे हैं, ना मेरे हैं,
अन्ना को अब सब घेरे हैं...

*हिन्दुस्तान के सम्पादकीय लेख में दिनाक ६ नवम्बर को छपे शशि शेखर के लेख से ...अच्छा हो अन्ना सियासी लोगों की भाषा छोड़ नयी पीढी को सदाचार और संस्कार के आन्दोलनों को आगे बढ़ाएं..  

Thursday, June 30, 2011

वाह! क्या है खूबसूरत! बादलों का ये नजारा.


वाह! क्या है खूबसूरत
बादलों का ये नजारा
कर रही थी झील आकर
पास में मेरे इशारा.

झील जो इस पार से 
और जो उस पार से 
जीतती है दिल हमारा 
अपने गहरे प्यार से

फूल स्वागत कर रहे हैं 
खिलखिलाते जोर से 
और बारिश खींचती है  
ध्यान अपने शोर से 

हैं वृक्ष ऊँचे ओक के 
जो दे रहे आशीष हैं 
झील के नजदीक ही  
देखो खड़े प्रभु ईश हैं

है भाप बनती दीखती 
जो ध्यान बरबस खींचती 
वो भाप ही फिर गरजकर 
है प्रकृति उपवन सींचती 

है धूप पल में छाँव भी 
है सर्द सा एहसास भी 
है दूर लेकिन लग रहा
ये है हमारे पास ही  

गीत और संगीत, गायक  
और रचनाकार भी 
गा रहे हैं गीत पंक्षी
है बांस की झंकार भी 

है कौन जो ये प्राकृतिक 
है चित्रकारी कर रहा 
या कल्पना आकर में 
फिर रंग सारे भर रहा 

है बादलों के बीच बैठा 
छुप, 'छुपा-रुस्तम' कहें 
'शिशु'  निरंकारी या उसे 
'शिव' 'सुन्दरम' 'सत्यम' कहें

Saturday, June 18, 2011

शादी हुयी बन गयी पत्नी, पति-पत्नी का दर्जा पाया, पर सुहागरात से पहले....

शादी हुयी बन गयी पत्नी
पति-पत्नी का दर्जा पाया
पर सुहागरात से पहले 
पत्नी ने पति को समझाया- 
शादी हुयी बहुत पहले ही
मैं हूँ एक सुहागिन नारी
भईया तुम बन जाओ मेरे 
मैं पहले वाले की प्यारी
सुनकर पति मगन हो बोला-
बहन कहानी में है ट्विस्ट
खबर हुयी ये ख़ास मीडिया 
वाले करते इसको मिस्स्ड 
रस्मे जैसे पहले हमने 
दोनों साथ निभाई थी 
एक रस्म दो और अदा कर 
राखी आज मंगाई थी
प्रणय सूत्र के बंधन से 
है रक्षाबधन अच्छा 
बहन आपने बचा लिया 
है प्यार आपका सच्चा
है प्यार आपका सच्चा

Thursday, June 16, 2011

बीडी के संग चाय ... है दैया हाय....


बीडी के संग चाय
... है दैया हाय....
बाबा बोले मुझसे आज-- 
गर्मी में पीना पन्ना... 
नहीं मिले तो गन्ना...
भ्रष्टाचार विरोधी हो जा  
बाबा के संग या संग अन्ना
या बन जा सरकारी बाबू
धनवानों संग धन्ना...
जीवन-मरण समझ ले मूरख
जीवन है ये झन्ना....
बाबा जी की बातें यारों 
शिशु को नहीं हैं भाय 
बीडी के संग चाय
... है दैया हाय....

Thursday, May 19, 2011

शराब चाहे कच्ची हो या पक्की इसके नुक्सान तो हैं और वो भी जानलेवा.


ऐसा कहा जाता है कि गावों में कच्ची शराब का धंधा कुटीर उद्योग के रूप में चलता है, कच्ची शराब की भट्ठियां धधकने का कारण बढ़ती बेरोजगारी और कम लागत में अधिक लाभ कमाना है! बेरोजगारी से जूझ रहे जिलों में तो कच्ची शराब का कारोबार अब कुटीर उद्योग का रूप अख्तियार कर चुका है और पेट की आग बुझाने के लिए लोग गाव-गाव में कच्ची शराब की भट्टिया धधका रहे। ग्रामीण अंचलों में कुछ लोगों का ये धंधा इतना ज्यादा फल फूल रहा है कि वे इसे रोजगार का जरिया बना बैठे हैं.  इस धंधे के फलने और फूलने कारण कम खर्च में अच्छा नशा होना है जिससे ग्रामीणों में कच्ची शराब के प्रति लगाव भी बढ़ रहा है। 
कुछ लोग कच्ची शराब का व्यवसाय इसलिए भी करते हैं कि इसमें लेबलिंग और ब्रांडिंग के खर्चे नहीं उठाने पढ़ते, विज्ञापन और मीडिया का काम अखबार खुद-ब-खुद आहे-बगही खबर छाप कर करता रहता है. ज्यादातर ग्रामीण आबादी नदियों के किनारे बसे होते हैं जिससे उन्हें शराब की भट्ठियां स्थापित करने में ज्यादा खर्च भी नहीं उठाना पड़ता. 
आर्थिक जानकारों का मानना है कि जहां कच्ची शराब का धंधा चल रहा होता है वे इलाके आर्थिक रूप से पिछड़े होते हैं. पुलिस और सरकारों की माने तो कच्ची शराब के चलते अपराधों में भी अप्रत्याशित रूप से वृद्धि होती है. 
लेकिन गाँव-देहात वासियों का कहना इस मंहगाई में वे ब्रांडेड शराब नहीं खरीद सकते, और शराब के बिना - शादी, मुंडन, लगन आदि काम अधूरे माने जाते हैं. यहाँ तक कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की मांग है कि सरकार को महीने में कम से कम एक बार सस्ते अनाज की तरह एक इंग्लिश शराब की बोतल भी देनी चाहिए. 

कच्ची शराब पर आये दिन अखबार अपने - अपने आंकड़े छापते रहते हैं-
  • यूपी में सामान्य दिनों में इसकी खपत करीब दो लाख लीटर रोजाना, होली में चार लाख लीटर तक पहुंच जाती है 
  • कच्ची शराब की बिक्री बढ़ने का एक बड़ा कारण अंग्रेजी और सरकारी ठेके की शराब से इसका दाम कम होना है 
  • विधानसभा में हाल ही में सरकार ने भी माना था कि जहरीली शराब पीने से पिछले साल 87 लोगों की मौत हुई थी
  • उत्तर प्रदेश राज्य के अपर पुलिस महानिदेशक(कानून-व्यवस्था) बृजलाल  ने कहा कि अधिकारियों से कहा गया है कि अगर जिले में कच्ची शराब का सेवन करने से एक भी मौत होती है तो उसके लिए थाना प्रभारी से लेकर पुलिस अधीक्षक तक की जवाबदेही होगी।

इतना तो तय है कि शराब चाहे कच्ची हो या पक्की इसके नुक्सान तो हैं और वो भी जानलेवा. 

बिन बुलाये मेहमान पधारे, घर में ना था पानी

बिन बुलाये मेहमान पधारे, घर में ना था पानी 
बीबी रूठ गयी फिर मुझसे, बोली कड़वी बानी. 
ओ गंवार! ये गाँव नहीं है कुछ तो ख्याल किया होता
मेहमानों से पहले मूरख, पानी मंगा लिया होता
तभी दोस्तों! आधी रात एक बिसलरी लाया...
१२ बजे रात के बाद तब फिर खाना है खाया... 
इसीलिये आ रही नीद अब ऑफिस में झपकी आती
दिल्ली में मेहमान नवाजी 'शिशु' को सच में ना भाती. 

Tuesday, March 15, 2011

रैली नहीं रैला है...

रैली नहीं रैला है,
बैग जो हांथ में है 
बैग नहीं थैला है
घर वाली है घर में बैठी,
दिल्ली जो साथ आयी वो मेरी लैला है...
'शिशु' इन रैली से 
संसद रोड मैला है

Sunday, February 13, 2011

बाप पुलिश में डिप्टी साहब बेटा करता फेरा-फेरी....धत तेरे की!

धत तेरे की! 
पढ़ा लिखा होकर भी तू क्यों बेंच रहा झरबेरी,  
धत तेरे की! 

बाप पुलिश में डिप्टी साहब बेटा करता फेरा-फेरी, 
धत तेरे की! 

पूरे साल खूब मेहनत की, उस पर पाए धान पसेरी,
धत तेरे की! 

जब तक जिन्दा रहे ना पूछा अब मरे को दे रहे हलुआ-पूरी, 
धत तेरे की! 

हीरा के लड़के शीरा को तरसें 'शिशु' गदहे देखो खायं पंजीरी, 
धत तेरे की!

लूट मची, लुट गए खेल में भारत के करदाता...

लूट मची, लुट गए खेल में भारत के करदाता,
आँख खोल के अब तो देखो भारत की भारतमाता.

ऐसा-वैसा नहीं! गज़ब का अजब हुआ घोटाला,
लुटी तिजोरी खेल गाँव में लगा रहा पर ताला.

दूध धुला जिसको समझा था वो निकला सर्वेश,
शशि थरूर ने खाता खोला पहली बार विदेश.

सब कहते कलमाडी ही है असली भ्रष्टाचारी,
'शिशु' और भी शामिल हैं कुछ इसमें खद्दरधारी.

नौकरशाह और नेता ही अब सबके हैं भाग्यविधाता
जन गण मन अधिनायक जय हे, उनकी भारतमाता

Thursday, February 3, 2011

...लखटकिया में बैठा मानुष 'शिशु' को दिखलाता है ताव.

इंग्लिश बोली वाले सारे घुस गए हाल के अन्दर,
हिन्दी भाषी अरे बिचारे! देख रहे बन बन्दर. 

सभी जगह ही इंग्लिश बोली वाले हैं अधिकारी, 
हाय! शिशु! हिन्दी भाषी ही नौकर हैं नर नारी.  

जैसे फिक्स मैच पहले से उसी तरह होते कुछ जॉब, 
जान समझ कर अप्प्लाई कर सुन ले ओ महताब. 

ह्युमन राईट्स, इक्वालिटी जो जेंडर सदा बोलते, 
वो ही सारे सामाजिक हैं भेद जो सभी खोलते.  

जब से कार आयी लखटकिया कार को देता ना कोई भाव,
पर लखटकिया में बैठा मानुष 'शिशु' को दिखलाता है ताव.

काला कोट पहनने वालों से, हे भगवान् बचाए!

काला कोट पहनने वालों से, हे भगवान् बचाए!
साथ में काम किया पर वो फूटी आँख ना भाये,
पर वो फूटी आँख ना भाये कान के होते कच्चे
दिन भर झूठ बोलते खुद, खुद को कहते पर सच्चे 
'शिशु' कहें दोस्तों उनके साथ साल एक मैंने काटा 
काला कोट पहने वालों का सच, सही आपसे बांटा

Tuesday, February 1, 2011

प्रजापति की पिकनिक सब जमा हुए नरनारी.

बच्चों जैसी हंसी, धूप की थी वैसी किलकारी, 
प्रजापति की पिकनिक सब जमा हुए नरनारी.

आयोजक या संचालक का फिर कर्ता-धर्ता बोलूँ
समय के पक्के हैं 'हेमंत' 'शिशु' उनका जैसा होलूँ   

अबकी बार 'विनय' जी के संग पत्नी, पुत्र भी आये,
'सत्यवीर' जी याद आ गये सबके मन को भाये. 

१२ बजे 'वेद' आया 'संदीप' को फ़ोन मिलाया  
१ बजे तक रहा घूमता पर न उसे मिलपाया 

घंटे एक पार्क में उसने कितने ही चक्कर काटे
खत्म हुयी मीटिंग तब उसने, मुझसे अनुभव बांटे 

शुरू हुआ परिचय जब सारे लोग हो गए पूरे
खुलकर परिचय दिया सभी ने आधे-नहीं-अधूरे.   

नंबर वन की नेट्वोर्किंग के नंबरवन पर आये  
'एल.बी. प्रसाद जी' ने अपने अनुभव खूब सुनाये

नहीं नौकरी बदली अब तक ये दूजा है काम 
नाम के साथ बढ़ गयी पदवी और बढे हैं दाम

'चंद्रसेन जी' ने फिर अपने नाम का भेद था खोला
समय लगा बतलाने में पर सच-सच उनने बोला

जैसे जीवन नैया पार लगाने वाले केवट थे राम 
रेल चलाने वाले 'रामवीर जी' उनका अद्भुत काम 

हैं विनम्र और मृदुभाषी, नहीं रिटायर अबतक दिखते 
इनके पिताश्री भी कम ना अबतक बिन चस्मा के लिखते

लम्बे  जीवन का रहस्य खुलकर उनने बतलाया 
हम लोगों ने सुन उनको रस सत्संगी था पाया 

रामवीर के बाद 'शिवाजी' बोले फिर 'शिवराज' 
डिप्टी एसपी ओहदा उनका उनपर सबको नाज़ 

पिता विशम्भर उनके दिखते सीधे-साधे नेक 
रहो सादगी में सब लोग दे गए वो सन्देश 

गौतमबुद्ध नई यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जी आये 
जिनके उत्तम सुविचार भी सबलोगों को भाये 

सुनी-सुनायी बातों पर ना करना तुम विश्वास कभी 
बोले- जो भी करो स्वयं से रखना ना दूजो आस कभी 

फिर महानगर संचार व्यस्था के 'अवनीश' पधारे 
आई.बी.एम्. के 'सुभाष जी' आये सबके लाड़-दुलारे 

'अम्बरीश', 'कैलाश', 'मगेन्द्र', 'पंकज' भईया आये 
'वर्मा जी' के भाषण सुनकर हम सब हर्षित मुस्काये 

एमबीए का छात्र 'मुकेश' बातें बहुत पते की बोला 
प्रजापति समाज का उसने असली भेद था खोला

'नज़र नज़र के फेर' से बोलूँ वो नेता हो सकता 
नेता बन कर वो समाज का कष्ट सभी हर सकता 

हैं मौसम विभाग में लेकिन सहजयोग के ज्ञाता 
'दुर्गा' है प्रसाद से मीठे उनको सब कुछ आता 

लिखते हैं - 'डी. प्रजापति' जी, दुश्मन जिनसे डरता
हैं सेना में कैप्टन फिर भी सहज योग के अच्छे कर्ता 

लय और ताल बनाये रखना रखो अच्छा इल्म 
पहले पढोलिखो सब फिर भले देखना फिल्म 

सुन्दरता भी दिखी उधर कुछ पत्नी संग जो आये
नाम नहीं लूँगा उनका मैं चहरे जो मन भाए.

मधुर-मधुर व्यंजन, पकवान और मिठाई आई   
परिचय बाद सभी के मुहं में जो पानी थी लायी 

'अपना खाना-अपना गाना' सबके सब ही भूल गए
खाकर स्वदिक खाना यारों पेट सभी के फूल गए

सहज योग की सहजबात फिर कैप्टन जी ने समझाई 
करना माफ़ 'शिशु' को चाचा उसे समझ ना आई

विनय ने ग्रुप की क्षमता से सबको अवगत करवाया 
विनय और हेमंत धन्य हों आपका काम सभी भाया

Friday, November 19, 2010

सभ्य नागरिक वो कहलाते, जो वोट डालने कभी न जाते

खेल में भ्रष्टाचार है,
रेल में भ्रष्टाचार है,
जेल में भ्रष्टाचार है,
लेकिन किन्तु परन्तु बंधु
मुझे देश से प्यार है!

मुस्लिम बन हिन्दू को मारा,
हिन्दू बन मुस्लिम को मारा,
मंदिर-मस्जिद हमें ना प्यारा
लेकिन किन्तु परन्तु बंधु
हम लोगों में भाई-चारा!

सभ्य नागरिक वो कहलाते,
जो वोट डालने कभी न जाते,
पर राजनीति को हैं गरियाते
लेकिन किन्तु परन्तु बंधु
नेता जी को वो हैं भाते!

Monday, October 25, 2010

क्या? फिर आया है करवाचौथ!

क्या? फिर आया है करवाचौथ!
हे परमेश्वर! फिर लायेंगे ये एक सौत!

मैं हूँ एक सुहागिन नारी,
पहली अभी कवांरी,
और तीसरी की लाने की-
वो रही दुखद तैयारी,
हे भगवान् आती मुझे नहीं क्यूँ मौत? 
हे परमेश्वर! फिर लायेंगे ये एक सौत!
फिर आया है करवाचौथ!

मेरे व्रत-उपवास न उनको भाते-
जब भी घर को आते-
मुझको धकियाते-गरियाते,
उसे देख मुस्काते आते-जाते.
नहीं समझ में आता वो मेरी है सौत-
या मैं उसकी सौत.
हे परमेश्वर! फिर लायेंगे ये एक सौत!
फिर आया है करवाचौथ!

जब से लिविंग रिलेशन आया-
उन्हें मिल गयी पूरी छूट.
फर्क न उनको पड़ता कोई,
चाहे मैं जाऊं फिर रूठ,
अब जाना क्यूँ पहने फिरते-
नित नए-नए वो शूट.
मैं क्यूँ मर जाऊं-
मरे हमारी दोनों सौत.
हे परमेश्वर! फिर लायेंगे ये एक सौत!
फिर आया है करवाचौथ!

Tuesday, October 19, 2010

खेल से पहले 'आई लव यू' खेल के बाद कुबूल है


खेल हुए ख़तम पैसा हुआ हज़म- 
खेल के बाद यही सुनायी आ रहा है,
खेल मंत्रालय, कांग्रेस और तो और साथ में 
खुद कलमाडी भी तो यही गा रहा है!
कि-  
खेल से पहले 'आई लव यू' खेल के बाद कुबूल है,
पल्ला झाड के बाद में बोला भारी हुयी भूल है!
उखाड़ना चाहते हो तो उखाड़ लो, लेकिन क्या उखाड़ोगे?
इसीलिये हमने गाड़े नहीं तम्बू, बोलो अब क्या फाड़ोगे?
ज्यादा से ज्यादा कमेटी की रिपोर्ट आयेगी,
और वो भी किसी रिटायर से लिखाई जायेगी.
उसके बाद मामला अदालत में चलेगा-
हां तब फिर देखा जायेगा - 
लेकिन दोस्त तबतक इलेक्शन भी तो आ जाएगा.

Monday, September 13, 2010

दोहे -दोमुहें

लज्ज़ा, हया, शरम की बातें करना अब बेकार,
ज्य़ादा बात अगर की तूने तो पड़ जायेगी मार.

महिला सशक्तिकरण जपाकर पायेगा कुछ काम,
काम मिलेगा एनजीओ में मिलेगा अच्छा दाम.

आरक्षण की बात अगर हो हाँ-जी-हाँ-जी करना,
घर मी बीबी डांट पिलाए तो तू बिलकुल डरना.

ध्रूमपान करती हो महिला कभी ना करना विरोध,
महिला कितनी ही गुस्से में हो, तू ना करना क्रोध.

नहीं बहन जी कहना अब से मैडम जी तू बोल,
आंटी कहा किसी को तूने तो पड़ जायेगी धौल.

सुन्दर हो कहने से बच्चू अब नहीं चलेगा काम,
वाऊ सेक्सी, लूकिंग हाट ही कहना सुबहो शाम.

अंतरंग की बातें कुछ हैं 'शिशु' वो भी तुझे बताउँगा ,
पब्लिक प्लेस में नहीं, तुझे मैं आकर के समझाउंगा
 

Thursday, September 9, 2010

कहीं भिखारी के चक्कर में दूसरा ना पीसे जेल की चक्की.

सभी भिखारी आजकल करतब रहे हैं सीख,
करतब करके खेल में वे सब मांगेंगे भीख, 
वे सब मांगेंगे भीख आजकल कपड़े रहे खरीद,
नए-नए परिधानों में सज भीख की देंगे रसीद,
'शिशु' कहें दिल्ली की पुलिश है आजकल हक्की-बक्की,
कहीं भिखारी के चक्कर में दूसरा ना पीसे जेलकी चक्की.

Wednesday, September 8, 2010

अतिथि, आपको बुला रहा भारत में आओ..खेलो, देखो खेल, हमारे व्यंजन खाओ.

अतिथि, आपको बुला रहा भारत में आओ,
खेलो, देखो खेल, हमारे व्यंजन खाओ,
देखो, समझो, परम्पराएं मेरी,
आओ जल्दी करों न अब तुम देरी.
सभ्यता और संस्कृत से खुद जुड़ जाओ
सुन रखा था जैसा, वैसा ही सम्मान भी पाओ
भाई-चारा-बंधुत्व भाव मन लाये हैं
आपके आने में हम अपनी पलक बिछाए हैं
और हम भी सीखेंगे आपकी बोली-भाषा और गीत,
आप आयेंगे हमको याद भले ये पल जायेंगे बीत,
संगम होगा सभ्यता और संस्कारों का
ऊर्जा आयेगी एक-दूसरे के नए विचारों से
और भी बढ़ जायेगी मित्रता खेल के इसी बहाने से
प्यार आपस में होगा आपके आने से....
प्यार आपस में होगा आपके आने से....
प्यार आपस में होगा आपके आने से....