Friday, March 5, 2010

अधिकार अपने छीन ले अब मांगने का वक्त ना

तू जागती जा जागती जा जागकर सोना नहीं,
तू खिलखिला हंसती रहे हों दुःख मगर रोना नहीं.
जो देश हैं महान बने अब तलक संसार में
पुरुषों बराबर काम तेरा दीखता उस धाम में
है जीतता जो समर में, रण बांकुरों की शान तू  
तू है बहादुर स्वयं भी हर देश का अभिमान तू
पर लोग तेरा आज भी अपमान करते हैं सदा,
तू सह न अब अपमान, उनको बोलदे तू सर्वदा
अधिकार अपने छीन ले अब मांगने का वक्त ना
'शिशु' भी न देता है खिलौने आप हैं यदि शक्त ना

1 comment:

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

बहुत बढ़िया, मेरे दिल की बात कह दी !

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