क्या? फिर आया है करवाचौथ!
हे परमेश्वर! फिर लायेंगे ये एक सौत!
मैं हूँ एक सुहागिन नारी,
पहली अभी कवांरी,
और तीसरी की लाने की-
वो रही दुखद तैयारी,
हे भगवान् आती मुझे नहीं क्यूँ मौत?
हे परमेश्वर! फिर लायेंगे ये एक सौत!
फिर आया है करवाचौथ!
मेरे व्रत-उपवास न उनको भाते-
जब भी घर को आते-
मुझको धकियाते-गरियाते,
उसे देख मुस्काते आते-जाते.
नहीं समझ में आता वो मेरी है सौत-
या मैं उसकी सौत.
हे परमेश्वर! फिर लायेंगे ये एक सौत!
फिर आया है करवाचौथ!
जब से लिविंग रिलेशन आया-
उन्हें मिल गयी पूरी छूट.
फर्क न उनको पड़ता कोई,
चाहे मैं जाऊं फिर रूठ,
अब जाना क्यूँ पहने फिरते-
नित नए-नए वो शूट.
मैं क्यूँ मर जाऊं-
मरे हमारी दोनों सौत.
हे परमेश्वर! फिर लायेंगे ये एक सौत!
फिर आया है करवाचौथ!
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
Popular Posts
-
तुम कहते हो, तुम्हारा कोई दुश्मन नहीं है, अफसोस? मेरे दोस्त, इस शेखी में दम नहीं है जो शामिल होता है फर्ज की लड़ाई मे, जिस बहादुर लड़ते ही हैं...
-
नौकरी के नौ काम दसवां काम हाँ हजूरी फिर भी मिलती नही मजूरी पूरी मिलती नही मजूरी जीना भी तो बहुत जरूरी इसीलिये कहते हैं भइया कम करो बस यही जर...
-
I can confidently say that religion has never been an issue in our village. Over the past 10 years, however, there have been a few changes...
-
रविवार की एक घटना बात उन दिनों की है जब मैं 8वीं जमात में पढ़ता था। यह सन 1992 और 6 दिसम्बर की एक छोटी सी घटना है। मेरा विद्यालय लखनऊ शहर के...
-
इंतज़ार है पक्का शत्रु, उस पर कर न यकीन जीना शान से चाह रहे तो ख़ुद को समझ न दीन ख़ुद को समझ न दीन काम कल पर ना छोड़ो लगन से करके काम दाम फल स...
-
हमने स्कूल के दिनों में एक दोहा पढ़ा था। जो इस प्रकार था- धन यदि गया, गया नहीं कुछ भी, स्वास्थ्य गये कुछ जाता है सदाचार यदि गया मनुज का सब कु...
-
भारत में बाल संरक्षण केवल नीतियों का विषय नहीं है , बल्कि यह एक गहन सामाजिक , सांस्कृतिक और स्थानीय संदर्भों से जुड़ी चुनौती है। यद्यपि ...
-
Prof. Shamsul Islam भारतीय समाज में औरत ही एक ऐसी हस्ती है, जिसका नसीब संस्कृतियों, वर्गों और धर्मों में व्यापक अंतर और भेद होने के...
-
भाँग, धतूरा, गाँजा है, माचिस, बीड़ी-बंडल भी। चिलम, जटाएँ, डमरू है, कर में लिए कमंडल भी।। गंगाजल की चाहत में क्यूँ होते हलकान 'शिश...
-
नींद आती है बशर्ते, करार नहीं आता है। हमारी ज़िंदगी में इतवार नहीं आता है।। बेवजह की बहस बेग़म से करता क्यों है? ग़ुलाम बनकर क्यूँ हार नहीं जात...
आंदोलन
यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...
-
तुम कहते हो, तुम्हारा कोई दुश्मन नहीं है, अफसोस? मेरे दोस्त, इस शेखी में दम नहीं है जो शामिल होता है फर्ज की लड़ाई मे, जिस बहादुर लड़ते ही हैं...
-
नौकरी के नौ काम दसवां काम हाँ हजूरी फिर भी मिलती नही मजूरी पूरी मिलती नही मजूरी जीना भी तो बहुत जरूरी इसीलिये कहते हैं भइया कम करो बस यही जर...
-
I can confidently say that religion has never been an issue in our village. Over the past 10 years, however, there have been a few changes...
3 comments:
मित्र
महा बकवास .. कोरी तुकबंदी के अलावा कुछ भी नहीं | इसे कविता तो नहीं ही कह सकते |
प्रिय आलोचक मित्र!
मुझ नौशिखिया जो अपने को कविता लिखने वाला कहता है की तरफ से आपको सादर नमस्कार है!
महोदय, यदि आप जैसा आलोचक मेरी कविता पढता है और अपने विचार मेरे ब्लॉग पर पोस्ट करता है तो मेरा लिखना व्यर्थ नहीं है.
भविष्य में अच्छा लिखने की कोशिश करूंगा. ऐसे ही आप अपनी कृपा बनायें रखना. इसी आशा से एक बार आपका पुनः वंदन-अभिनन्दन है!
आपका
'शिशु'
Sorry for my bad english. Thank you so much for your good post. Your post helped me in my college assignment, If you can provide me more details please email me.
Post a Comment