Wednesday, July 15, 2009

कल तीस का हो जाऊंगा

कल तीस का हो जाऊंगा
इन तीस सालों में
अब मै हिसाब लगता हूँ
तो पाता हूँ
कि एक पैर से
अपाहिज होने के अलावा
कुछ भी तो ऐसा नहीं घटा
जिस पर हानि समझ कर रोऊँ,

हां यह कहना कि
मैंने पाया भी कुछ कम नहीं,
तो क्या इस पर
बखान करके खुश होऊं

सोचता हूँ क्या शादी, नौकरी, रुतबा
केवल दिखावे के लिए है
या
यही जीने का मकसद है मेरा,
बहुत दिमाग लगाया
पर आज तक नहीं समझ पाया

हाँ समाज से गरीबी कैसे दूर होगी?
क्या अंतर है शहरी गरीबी
और
गाँव की गरीबी में
यह डेवलपमेंट सेक्टर में
रहकर जरूर सीख पाया

लेकिन
क्या फर्क पड़ता है
यह सब जान लेने से,
गाँव से ज्यादा शहर में गरीब हैं
यह मान लेने से,
की शहरों में गरीबी का ग्राफ बढ़ा है

मेरी नज़र में तो जी बस गरीब तो गरीब हैं,
फिर क्या फर्क पड़ता है
कि
वे शहर में रहें या गाँव में
हमें क्या हक कि हम उन्हें
धर्मं-जाति और मज़हब
की तरह बाँट दें
सच तो यह है
कि
वो एक हिस्सा हैं
हमारे समाज का

हम तो केवल
रोजी-रोटी के लिए
उन गरीबों के लिए काम करते हैं
वर्ना
किसे फिक्र है
और
किसे पड़ी है कि
वो गरीबी दूर करे

बीते कई सालों से
इसी सेक्टर में काम करते-करते
और
यह देखते-देखते कि
कौन गरीबों का मशीहा है
थक गया हूँ
और यह सोचकर कि
क्या होगा आगे के सालों में
सोचकर पक गया हूँ

अब किसकी फिक्र करू
किसकी नही
ये कौन बताएगा
मुझे पक्का यकीन है की
जो भी बताएगा
अपने बारे में ही बताएगा

Tuesday, July 14, 2009

अंतर बस इतना सा है!

हमें शांति भाईचारा से प्यार है
उन्हें इस पर एतराज है

हमें गीत, संगीत से लगाव है
उन्हें इससे अलगाव है

हमें अहिंसा, सत्य पर विश्वास है
उन्हें इस पर नहीं आस है

हमें अँधेरे, अत्याचार से इनकार है
वो मारामारी पर तैयार हैं.

हम हमेशा बातचीत के लिए तैयार हैं
वो करने लगते तकरार हैं.

हमें तो बस यही अंतर नज़र आता है
वर्ना रिश्ता निभाने में हमारा क्या जाता है.

Thursday, July 9, 2009

गाँव देहात में भी समलैंगिगता पर छिड़ी बहस

हाल की ताज़ातरीन खबरों से गांव देहात में जिस खबर ने ज्यादा प्रभाव छोड़ा है वह है धारा 377 (समलैंगिकता को कानूनी ठहराने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले) का समाप्त होना। अवगत करा दें कि दिल्ली हाई कोर्ट ने बीते सप्ताह एक याचिका निपटाते हुए कहा था कि वयस्कों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बने तो वह गैरकानूनी नहीं होगा। इस तरह अदालत ने समलैंगिकता को अपराध मानने से इनकार कर दिया था।

गावों में जहां आज भी रिश्तों की बुनियाद टिकी हुई है, इस प्रकार के रिश्तों को मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। वंहा पान की गुमटी से लेकर गली चैराहों पर बस इसी खबर पर गहमागहम बहस जारी है। गांव देहात में रहने वाले हर वर्ग की अपनी-अपनी प्रतिक्रियाये दिल्ली हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले पर अलग अलग हैं।

युवावर्ग खबरों को जहां चटकारे लेकर दिलचस्प तरीके से मनगढंत कहानियां से गढ़ रहे हैं वहीं बुजुर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग इस पर गंभीरता से विचार-विमर्ष कर रहे हैं। युवा वर्ग मसाले लगाकर दोस्तों के बीच खबर फैला रहे हैं कि ‘‘अब पुरूष-पुरूष के साथ और महिल-महिला के साथ शादी विवाह के रिश्ते होंगे, लेकिन यह मत पूछना कि इन रिश्तो के बाद मां कौन होगा और बाप कौन बनेगा।’’

एक बड़े बुजुर्ग ने यहां तक कहा कि ‘मुझे तो बस यही चिंता है कि कहीं इस बहकावे में हमारे लड़के और लड़कियां न आ जायं।’ गांव के ही एक सज्जन जो अभी पुलिस विभाग में दरोगा हैं, ने कहा-अच्छा हुआ कि धारा 377 खत्म हुई, आजकल थाने में समलैंगिकता के केस कुछ ज्यादा ही बढ़ रहे थे, पुलिस के पास इसके अलावा भी बहुत काम हैं।’’

गांव के एक भोले-भाले और बड़बोले नाई ने कहा-इससे एक बात तो तय है कि जनसंख्या पर लगाम जरूर लगेगी तथा अब लड़के लड़की पर छींटाकसी न करके लड़के लड़के पर और लड़की लड़की पर नज़र गड़ायेंगें। गांव के चरवाहे ने कुछ इस प्रकार से अपना मत प्रकट किया-ऐसे ही सब कुछ चलता रहा तो इस धरती से मानव जाति समाप्त हो जायेगी।

गांव की दादी अम्मा तो रीति-रिवाजों पर बात करने लगीं-यदि लड़का किसी की बहू बनकर आयेगा तो वह पैर में बिच्छू और मांग में सिंदूर लगायेगा कि नहीं।’’

पंडित और विद्वान व्यक्ति समलैंगिकता को अप्राकृतिक, मानवीय व्यवहार के खिलाफ व भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर खिन्न हैं! उनका कहना है कि इस फैसले से कई तरह की सामाजिक व कानूनी दिक्कतें पैदा होंगी। मैरेज एक्ट के अमल में भी दिक्कत आएगी।

बात चाहें जो भी हो यह खबर जरूर बहस में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करती है।

जीते जी मूर्ति लगाने से दुश्मन तो लोग बहुत होंगे

जीते जी मूर्ति लगाने से
दुश्मन तो लोग बहुत होंगे
पर मूर्ति अगर लग जाती है
फायदे भी क्या कुछ कम होंगे

जीते जी मूर्ति लगी मेरी
तो खुद को देख अभी लूंगा
कुछ कमी नज़र आती यदि है
खुद अभी सुधरवा मैं दूंगा

हां मूर्ति लगी यदि जीते जी
तो पता अभी लग जायेगा
असली ग्रेनाईट लगने से
असली का बिल ही आयेगा

यदि पांच साल तक टूट गयी
गांरंटी है लग जायेगी
यदि बाद में कहीं टूट जाती
मुश्किल ही है लग पायेगी

है एक फायद बड़ा एक
यदि मूर्ति अभी लगवायेंगे
जनता जो वोट मुझे देती
मूर्ति को शीष नवायेगें

इसलिए आज ही जयपुर में
मूर्ति का आर्डर देता हूं
लाओ तुम बजट बनाकर के
‘शिशु’ पास अभी कर देता हूं।

अजब-गजब का हाल

शादी लड़के से ही होगी,
लड़का लड़का ही लायेगा।
लड़की दूल्हा बनकर के अब,
लड़की के घर ही आयेगा।

सौतन भी लड़का ही होगा,
जोगन भी लड़का ही होगा।
लड़की-लड़की संग भागेगी,
मज़नू-लैला अब न होगा।

अब दोस्त दोस्त संग चलने से,
निश्चित यारों कतरायेगें।
लड़की-लड़की यदि साथ चली,
हां अर्थ बदल तो जायेंगे।

मां-बाप आजकल सोच रहे,
क्या लड़का लड़की लायेगा?
या लड़की मेरी भाग किसी,
लड़की का साथ निभायेगा!

हो रहा अजब का गजब हाल,
वैज्ञानिक युग जो है ठहरा,
इस युग में सब कुछ जायज है,
पहले नाजायज था पहरा?

सच बात कहें तो ‘शिशु’ बुरा
दुनिया भर का बन जाएगा
क्या फर्क पड़ेगा इससे कुछ
वो तो बस लिखता जायेगा।

Wednesday, July 8, 2009

शहरी गरीब को दो कोटा उनकी अब बारी आयी है...

जाति-पांति अब है नहीं, हाँ केवल दलित कहाते
कोटे के अन्दर देखो अब निर्धन ब्राम्हण भी आते

बात एक सीधे सी है है तर्क भी सीधासाधा
आधा जो दलित कहाते हैं बाकी ब्राम्हण का है आधा

बाकी कोई बचा नहीं इससे, हाँ कुछ लोग हाय-तोबा करते
वो भी बन जायेंगे दलित कुछ नेता वादा हैं करते

कोटे की सब माया भाई, कोटे से बाहर हो ना कोई
कोटे पर गोटे फिट बैठें यह सोच रहे हैं सब कोई

हो गए बरस नौ-आठ-सात महिला कोटे में ना आयी
तैंतीस या पैंतीस जो भी हो उसकी बारी है ना आयी

इस बार सुना है कोटे में सस्ता अनाज मिल पायेगा
पीले कारट वाला जो है 'कोटे' का लाभ उठाएगा

कोटा-कोटा था शोर मचा हो गया इलेक्शन भी कोटा
जो दल पहले था जितना लम्बा इस बार हुआ उतना छोटा

इसलिए आज से 'शिशु' ने भी कोटे पर बात उठाई है
शहरी गरीब को दो कोटा उनकी अब बारी आयी है

Friday, July 3, 2009

ममता जी तुम ही कुछ ममता दिखादो

रेल में है रेलपेल बड़ी भीड़ भारी है
एक-एक डिब्बे में अनगिनित सवारी हैं

बीस डिब्बा वाली ट्रेन एक-आध जनरल का
उस पर से आधा समझो सेना के कर्नल का

बैठे वाले खड़े नही जब तक हो पाएंगे
खड़े वाले जब तक न उतर कहीं जायेंगे

बाथरूम जाना भी एक तरह जंग है
कठिन काम समझो यदि जोरू भी संग है

बच्चे-बुजुर्गों पर बड़ी दया आती है
बाथरूम तक जाने की नौबत ही नही आती है

लालू को लिखा था डिब्बा बढ़ाने को
चला दिया गरीब रथ मजाक उडाने को

ममता जी तुम ही कुछ ममता दिखादो
एक और डिब्बा बस ट्रेन में बढ़ा दो

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