Saturday, July 25, 2026

आंदोलन

यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को लेकर कुछ कहासुनी हो गई। इससे पहले हम सभी इस बात से अनजान थे कि हमारे लिए खाने का क्या प्रावधान है और क्या नहीं। लेकिन जब बच्चों ने खराब भोजन को लेकर वार्डन से शिकायत की, तो उन्होंने धमकाया और नाम काट देने तक की धमकी दी। सभी बच्चे डर गए।

उसके कुछ दिनों बाद विद्यालय में नई बेडशीट आईं। बच्चों को लगा कि ये हमारे लिए हैं, लेकिन पंद्रह दिन इंतजार करने के बाद भी वे हमें नहीं दी गईं और 15 अगस्त से लगभग एक सप्ताह पहले हमारे लिए सफेद शर्ट, पैंट और जूते आए। लेकिन वे भी हमें नहीं दिए गए।

कपड़ों का मामला धीरे-धीरे तूल पकड़ने लगा। वास्तव में उन दिनों बच्चों को खाने से ज्यादा नए कपड़े पहनने का शौक होता था। सफेद शर्ट और पैंट पहनना हमारे लिए गर्व की बात थी।

फिर एक दिन शाम को, जब स्कूल के वार्डन ट्यूशन पढ़ाने के लिए बाहर गए हुए थे, बच्चों ने स्कूल के मुख्य गेट पर ताला लगा दिया। हमारे प्रधानाचार्य महोदय उस समय छुट्टी पर थे। हमने हड़ताल कर दी।

बच्चों की हड़ताल भी बड़ी अजीब होती है—धीरे-धीरे उसमें जोश आता है। हम 2 दिन पहले शांतिपूर्वक रहे लेकिन जब कोई हमारी बात सुनने को तैयार नहीं हुआ तो हमारे कुछ साथी गर्मदल में बदल गए जिनमें श्री राम लोधी, अखिलेश वर्मा, और हनीफ थे। जबकि कुछ बच्चे हमारे जैसे गांव से थे जिन्हें शांति प्रिय रहना सिखाया गया था शांतिदल में शामिल हुए। किसी भी आंदोलन में ऐसा होता है कुछ लोग अपनी बात को कहने के लिए गर्मदल का सहारा लेते हैं, स्वतंत्रता आंदोलन में भी ऐसा ही हुआ था। लेकिन गर्मदल को ये कहकर दंड दिया जाता है कि वे आपराधिक हैं जबकि ऐसा होता तो क्या हम आज़ाद को अब तक भुला नहीं चुके होते। हमारे लिए जितने गांधी मायने रखते हैं उतने ही भगत सिंह और उनके साथी।

ख़ैर जब बात और आगे बढ़ गई तब हमें समझाने के लिए हमारे पड़ोस के एक विद्यालय की प्रधानाचार्या आईं। वह लड़कियों के एक आवासीय विद्यालय की प्रधानाचार्या थीं और उनके साथ कुछ छात्राएँ भी थीं। जब हमने उन्हें अपनी समस्याएँ बताईं, तो उन लड़कियों ने भी अपने विद्यालय में हड़ताल शुरू कर दी। क्योंकि उनके साथ तो हमसे भी अधिक ज्यादती हो रही थी। वहाँ की प्रधानाचार्या छात्राओं से घर का काम करवाती थीं—कपड़े धुलवाना, रसोई में काम करवाना आदि।

चिंगारी ऐसे ही भड़कती है। बच्चे तो बहुत सारी समस्याओं से नाराज थे लेकिन एक असली नाराजगी उन्हें ड्रेस में नज़र आने लगी और आंदोलन शुरू हो गया।

हमारा प्रदर्शन लगभग एक सप्ताह चला। अंततः समाज कल्याण विभाग के सचिव ने हम बच्चों से आकर बात की। उन्होंने हमारी बात सुनी और हमें लिखित रूप में बताया कि हमारे लिए वास्तव में कौन-कौन सी सुविधाएँ निर्धारित हैं। इसके बाद लड़कियों के आवासीय विद्यालय में अनेकों बदलाव आए, हम पड़ोसी थे अनेकों लड़कियों और लड़कों में दोस्ती हो गई। उससे पहले हम कभी बात नहीं करते थे जबकि हमारी बाउंड्री एक थी। उसके बाद कुछ लोग एक दूसरे को खत लिखने लगे और बाउंड्री की झिरियों से खतों का आदान प्रदान होने लगा। वे खत पढ़ाई और सुविधाओं के अलावा कुछ लोगों के लिए खास भी थे।

आंदोलन के बाद हमें पता चला कि हमें शाम के नाश्ते में फल भी मिलना चाहिए था। साल में एक बार नई ड्रेस और जूते मिलने चाहिए थे। हर सप्ताह साफ और धुली हुई बेडशीट मिलनी चाहिए थी। सब्जियों का मेनू भी निर्धारित था और प्रतिदिन अलग-अलग सब्जियाँ बननी चाहिए थीं। लेकिन वास्तविकता यह थी कि उससे पहले हमें अक्सर टिंडे पर ही टिका दिया जाता था।

पहले हमने कोई हिंसा नहीं की थी। हम शांतिपूर्वक अपनी बात रख रहे थे, लेकिन हम अव्यवस्था से नाराज थे, इसलिए कुछ बच्चों ने नारे लगाए, जोश दिखाया लेकिन हमने कोई नुकसान नहीं किया। उस समय धरना देना हमारे लिए एक जरूरत बन गया था। यदि हमने वह कदम नहीं उठाया होता, तो शायद कुछ भी नहीं बदलता।

इसके बाद हमारे लिए सभी व्यवस्थाएँ ठीक से होने लगीं। यकीन मानिए हमारे अध्यापकों का  का रवैया भी हमारे प्रति बदल गया, वे अच्छे से पढ़ाने लगे, समय पर आने जाने लगे। गार्ड, वार्डन, चपरासी सब मिलनसार हो गए, जबकि पहले ये सभी बच्चों को धमकाते थे तुम्हें घर भेज देंगे, नाम काट देंगे। फ्री का खाना चाहिए ऐसे कहकर अपमानित करते थे।

हालाँकि, बाद में हमारे एक बड़े बाबू ने बच्चों को बताया कि इन सुविधाओं के लिए मिलने वाले पैसे में से एक हिस्सा समाज कल्याण विभाग तक भी पहुँचता था।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वह मेरा पहला संगठित संघर्ष था। उस समय हम बच्चे थे, लेकिन हालात से हमें यह समझ आ गया था कि यदि अपने अधिकारों के लिए आवाज़ नहीं उठाई जाएगी, तो व्यवस्था अपने आप नहीं बदलेगी।

डिस्क्लेमर: इस लेख का उद्वेश्य किसी को भड़काना नहीं है ये वास्तविक घटना पर आधारित एक सच्ची कहानी है।

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