Friday, June 21, 2013

नेता तो बस नेता है

नेता तो बस नेता है

चाहें हिन्दू चाहें मुस्लिम फिर चाहें ईसाई हो
सगे पाप को धोखा देता, चाहे उसका भाई हो
जनता तो फिर गैर-परायी उसको कुछ ना देता है
नेता तो बस नेता है।

पांच साल के बाद मिलेंगे गाँव हमारे आयेंगे
उससे पहले संसद-मंदिर में हलुआ सब खायेंगे
संसद निधि से अपनी जेब में सब धन वो भर लेता है
नेता तो बस नेता है।

खुद की मुरति पार्क लगाते खुद ही अनावरण करते
अपने चमचों को ठेका दे पैसे का जुगाड़ करते
जनता के दुख भाड़ में जाएँ, अपने दुःख हर लेता है
नेता तो बस नेता है।

Tuesday, April 30, 2013

जीवन की बहती धारा में संयम और विशवास नहीं,


जीवन की बहती धारा में-
संयम और विशवास नहीं,
प्यार मोहब्बत मिलना मुश्किल
अब हंसना भी कुछ ख़ास नहीं।

झूठी आशा, घोर निराशा,
अपनों से कोई आश नहीं,
उन्नति देखी इसकी-उसकी,
यह हमको बर्दाश्त नहीं.

बिल वजह की बहस हो रही
मुर्दा है यह लाश नहीं,
बदबू आती कूड़ाघर से,
कहना इसको बास नहीं।

जो भी पढ़ा-लिखा बचपन में-
वह सच्चा इतिहास नहीं,
ले-देकर लिखवाया जाता-
मंदिर-मस्जिद पास नहीं।

राजनीति की बातें करना-
'शिशु' के बस की बात नहीं,
गांधी जी का चेला बनना-
भी मेरी औकात नहीं।

Friday, March 29, 2013

भैंस बेंच कर चमरौधा में पी गए चाचा दारू...

भैंस बेंच कर चमरौधा में पी गए चाचा दारू,
फिर बाद में खेली होली।
चाची जी को पता लगा तब कड़वे बैन वो बोलीं-
बोलीं, उल्लू, गाँव में चली गयी गोली-
तुम खेलति हो होली!!
सुनकर इतना आग बबूला, बन गए चाचा चोर,
जेवर घर से चोरी हो गया घर में मच गया शॊर....
भांग का नशा निराला, अब घर का निकल गया दीवाला ...
पहले पी थी देशी दारू, अब पी गए अंगरेजी,
उसके ऊपर भांग खा गए, बोले मै हूँ क्रेजी-
घर बिक जाए, खेत हो गिरवीं, या हो जाऊं कंगाल,
हो जाए बदनाम नाम ये कुछ भी नहीं मलाल।।।
बस होली में गाल रहें ये लाल....
सही लिखते हैं जी शिशुपाल ....
हमारे गाल रहें ये लाल।।

Sunday, October 21, 2012

बाबा! चेला बन जाऊं मै या बन जाऊं नेता?

भक्त!
एवमस्त!
 
बाबा! चेला बन जाऊं मै या बन जाऊं नेता,
या बन जाऊं पोल खोलने वाला या फिर अभिनेता?
 
भक्त! आजकल बाबा हों, चाहें हों सरकार
बिना मीडिया के दोनों ही पूरे हैं बेकार
नेता की भी बिना मीडिया ना कोई पहचान
पोल खोलने वालों का भी इसके बिना न मान
 
इसीलिये है एक सलाह!
समझ इसे तू नेक सलाह!
 
चैनल खबरी खोल एक ले,
कुछ चंदा मै दूंगा कुछ देगी सरकार
कुछ देगें नेता अभिनेता
बैंक से ले ले और उधार
 
समझा!
ऐसे होगी नैया पार...
ऐसे होगी नैया पार...

Wednesday, April 4, 2012

चाह नहीं बन मुख्यमंत्री, फोटो अपनी मैं लगवाऊं.

चाह नहीं संसद की कुर्सी पिछवाड़े अपने चिपकाऊं.
चाह नहीं बन मुख्यमंत्री, फोटो अपनी ही लगवाऊं. 
चाह नहीं अन्ना की टीम जैसी दुर्गति मैं करवाऊं. 
मेरी चाह बड़ी साधारण साधारण ही मैं कहलाऊं...

चाह नहीं बढ़ जाए सैलरी चापलूस की श्रेणी पाऊं. 
चाह नहीं दूजों के काम में रोड़ा बीच में मैं अटकाऊं.
चाह नहीं है काम छोड़कर छुट्टी लेकर घर मैं जाऊं. 
मेहनत की है, मेहनत का फल मेहनत से ही मैं फिर पाऊं. 

चाह नहीं अमिताभ साथ में मैं अपनी फोटो खिंचवाऊं 
चाह नहीं ऐश्वर्या के बच्चे का नाम सुझाऊं 
चाह नहीं एनजीओ का मैं डायरेक्टर कहलाऊं 
'शिशु' की यही हार्दिक इच्छा बच्चा फिर से मैं बन जाऊं. 

Friday, January 27, 2012


१ 
कब तक तेरी राह तकूँ मैं 
कब तक चाहूँ तुझको! 
जनम-जनम का रिश्ता कहकर
तो ठगती है मुझको !! 
२ 
नयी चाल चल रहा चुनाव
बोला - देना वोट जरूरी!
सोच समझ कर देना वोट
ये तेरी मजबूरी!!
३
देश महान बना नेता से,
नेता जी ही चोर!
पांच साल तक नज़र न आये, 
अभी मचाते शोर !!
४
'शिशु' आंख से मोती टपके, 
पलके भीग गयीं मेरी!
कितने दिन हो गए मिलन को 
अब तो मत कर तू देरी!!
५
कल, मिली पार्क में पहली वाली 
कहता था जिसको दिलवाली!
आह एक दिल से है निकली,
बोला दिल ने धत साली!!

Tuesday, November 8, 2011

अन्ना ना तेरे हैं, ना मेरे हैं, अन्ना को अब सब घेरे हैं...

ना तेरे हैं, ना मेरे हैं,
अन्ना को अब सब घेरे हैं...

इधर मीडिया बोल रही है 
अन्ना सच्चे गांधीवादी. 
उधर मीडिया बोल रही है 
अन्ना ही असली बरबादी

भ्रष्टाचार मिटेगा पूरा-  
सच! अन्ना टीम बोलती है.
उधर मीडिया अन्ना टीम का
सच! सच में भेद खोलती है.

'शशि शेखर'* 'शिशु' बोल रहे हैं 
अन्ना हुए सियासी हैं.
कांग्रेसी के दिग्गी-दिग्गज 
बोले अन्ना बासी हैं. 

अन्ना की अनचाही टीम 
अन्दर-अन्दर टूट रही.
जिसको नहीं मिला पद-पदवी 
वो अन्ना से रूठ रही.

भ्रष्टाचार ख़तम होगा क्या? 
क्या राम रज्य आ जाएगा?
या यह भ्रष्ट व्यस्था ही 'शिशु' 
अन्ना को खाजेगा
सोचा आज सवेरे है 
ना तेरे हैं, ना मेरे हैं,
अन्ना को अब सब घेरे हैं...

*हिन्दुस्तान के सम्पादकीय लेख में दिनाक ६ नवम्बर को छपे शशि शेखर के लेख से ...अच्छा हो अन्ना सियासी लोगों की भाषा छोड़ नयी पीढी को सदाचार और संस्कार के आन्दोलनों को आगे बढ़ाएं..  

Popular Posts

आंदोलन

यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...