Thursday, June 10, 2010

"समाज सामाजिक संबंधों का जाल है"

मैकाइवर एंड पेज ने कहा था कि-
"समाज सामाजिक संबंधों का जाल है"
अब प्रश्न यह है-
क्या आजकल के टूटते रिश्तों से 
किसी को मलाल है?
आज तो हर इंसान की बिगड़ी हुयी चाल है...
कहा तो यहाँ तक जाता है कि,
परिवार में बड़े-बुजुर्गों की अब
बच्चों के सामने गलती नहीं दाल है!
और हाँ,
ऐसा हमारे देश का ही नहीं
पूरे विश्व का हाल है...
इसलिए समाज सामाजिक संबंधों का जाल है
पर खड़ा हो गया सवाल है...?

3 comments:

परमजीत सिहँ बाली said...

शिशुपाल जी,बहुत सही व बढिया सामयिक रचना है....

कहा तो यहाँ तक जाता है कि अब बड़े-बुजुर्गों की-
बच्चों के सामने गलती नहीं दाल है.
और ऐसा हमारे देश का ही नहीं-
बल्कि पूरे विश्व का हाल है!

आचार्य उदय said...

आईये सुनें ... अमृत वाणी ।

आचार्य जी

दिवाकर मणि said...

"कहा तो यहाँ तक जाता है कि अब बड़े-बुजुर्गों की-
बच्चों के सामने गलती नहीं दाल है.
और ऐसा हमारे देश का ही नहीं-
बल्कि पूरे विश्व का हाल है!"


आपकी यह रचना गागर में सागर को चरितार्थ करती है. हृदयस्पर्शी रचना हेतु आपका आभार.....

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