Friday, January 16, 2009

जाड़ा बहुत जाड़ा बहुत लोग बोलने लगे

जाड़ा बहुत जाड़ा बहुत लोग बोलने लगे।
कैसे दूर जाड़ा हो यह भेद खोलने लगे।।
कम्बल से जाड़ा अब जाति नाहिं देखि लो।
हाफ स्वेटर छोड़के एक चद्दर लपेटि लो।।
कोट पैंट पहन के घूमें सब बाबू लोग।
चीथड़े लपेटे हुए घूमते गरीब लोग।।
कमरे में बैठ कर और हीटर आन कर।
कानों में टोपी या मफलब को बांधकर।।
बूढ्ढ़े कहते जाड़ा बहुत मौसम बहुत सर्द है।
युवा लड़की बोले यही मौसम बेदर्द है।।
कहां हम गर्मी में घूमते थे टॉप में।
अभी देखो स्वेटर और स्कार्प में।।
‘शिशु’ कहें जाड़े का मजा लूटि ले भाई
3 महीने बाद फिर यही मौसम याद आई।।

नारीवाद आ गया देखो बात बहुत है अच्छी

सास बहू के नाटक से एक बात समझ में आयी
रिश्ते बनते हैं कैसे और कैसे होती लड़ाई।
भारी-भरकम मेकप में रोना और हंसना होता,
महिला पात्र की बात करें क्या पुरूष पात्र मेकप में सोता।
इस मेकप को देख के देखो पार्लर की बन आयी।
रिश्ते बनते हैं कैसे और कैसे होती लड़ाई।


पुरूष काम पर जैसे जाते, महिला जाती पार्लर,
पैसे का जुगाड़ वो करती पकड़ पुरूष का कार्लर
ऐसा देख के मुझको भी मेरे गांव की याद सताई।
रिश्ते बनते हैं कैसे और कैसे होती लड़ाई।


गांवों में भी बन-ठन कर अब महिला करती काम,
सीता, दुर्गा हो गयीं पीछे तुलसी का लेती नाम।।
देख के बा के मेकप को एक बुढ़िया भी शरमाई।
रिश्ते बनते हैं कैसे और कैसे होती लड़ाई।


'शिशु' कहें यह देख के यारों एक बात समझ में आयी
पुरूष सभी अब पीछे हो गये महिलाओं की बनि आई
पारिवारिक ढांचा है बदला, सोच भी बदली सच्ची
नारीवाद आ गया देखो बात बहुत है अच्छी
जो भी मन में आया था वह लिखके यहां बताई।
रिश्ते बनते हैं कैसे और कैसे होती लड़ाई।

सत्य मार्ग पर चलते जो हैं, कष्ट उठाते रहते

सत्य मार्ग पर चलते जो हैं, कष्ट उठाते रहते।
भौतिकवादी इस जीवन में, धन की हानि सहते।।
लोग आज-कल के जो हैं, आधे से ज्यादा पापी।
अच्छे-अच्छे कम दिखते हैं, बहुत अधिक अपराधी।।
सत्य अहिंसा की बाते अब फिल्मों में चलती है
गांधी जी उपदेशों की दाल कहां गलती है।
मूसा-ईशा, हजरत ने था प्यार का पाठ पढ़ाया।
आज का मानव है कहता ये समझ न मेरे आया।।
गौतम ऋषि की वानी में था हत्या पाप जीव की।
अभी देखलो इस कलयुग में बोलबाल है इसकी।।
श्रीकृष्ण ने गीता में एक कर्म का पाठ पढ़ाया।
इस युग में सब कहते रहते कर्म से पहले माया।
अब धर्म पाठ को याद कराने वाले हो गयी पापी।
राजनीति में घुस गये सारे जितने थे अपराधी।।
'शिशु' कहें एक बात हमारे समझ नहीं है आती।
सुबह, शाम या रात कभी हो हरदम यही सताती।।
कैसे हो जीवन यह अच्छा कोई हमें बताये।
इस मारा-मारी, कटुता को कैसे दूर भगायें।।
सत्य अहिंसा सीखे फिर से जीवन सफल बनायें
स्वर्ग-नर्क की बात नहीं है स्वस्थ-सुखी हो जायें।।

Tuesday, January 6, 2009

'शिशु' की यही है आश न हो जाडे से दूरी

मौसम परिवर्तित हुआ जाडा बढ़ता जाए

इसी दौर में शादी के फिर कार्ड बहुत घर आए

कार्ड बहुत घर आए निमंत्रण आते रहते

आयेंगे श्रीमान, यही हम गाते रहते

मौका जब भी मिल जाता हम जाते रहते

भले पेट में जगह बचे न खाते हम रहते

जाडा यूँ चलता रहे यही दुआ भगवान्

इसी तरह हम अगले बरस बने बहुत मेहमान

बने बहुत मेहमान प्रभु जी विनती मेरी

'शिशु' की यही है आश न हो जाडे से दूरी

Monday, January 5, 2009

फिल्म ‘रब ने बना दी जोड़ी’ नज़र नज़र के फेर में अच्छी थोड़ी

मुझ जैसे नौसिखिया लिक्खाड़ और घर पर पाइरेटेट डीवीडी लाकर फिल्म देखने के बावजूद मेरी मजाल तो देखिये कि फिल्म की समीक्षा लिखने लगा। लिख इसलिए रहा कि कबीर दास जी ने लिखा है-जिन ढूंढ़ा तिन पाइयां सो मैने भी सोचा कि जिन देखा जो लिख दिया वाली बात पर लिख दिया।

अब जब लिखने ही लगा तो फिल्म का नाम भी लिखे देता हूं-‘रब ने बना दी जोड़ी’। ‘वाह क्या बात है, क्या अच्छी फिल्म है’लोगों से ऐसी तारीफ सुनकर श्रीमती जी भला क्या बिना देखे रह सकती हैं। सवाल ही नहीं उठता। उसी तरह जैसे कि ‘सास भी कभी बहू थी’ वाले धारावाहिक की तरह जब पड़ोसन देखती हैं तो मैं क्यों नहीं देख सकती, भले ही मुझे अच्छा लगे या ना लगे। इसी से तो खाली समय में चर्चा करने मौका मिलेगा। तय किया कि 1 तारीख को फिल्म जरूर देखेंगे नया साल भी इसी बहाने मना लेंगे। लेकिन ऐन टाइम पर ऑफिस ने टांग अड़ा दी, सो क्षमा याचना करके भारतीय अदालतों की तरह अगली तारीख मुकरर्र करनी पड़ी। बात आयी और गयी। लेकिन एक मित्र, जो मेरी तरह डीवीडी से फिल्म देखने के शौकीन हैं, ने एक मुझे भी थमा दी।

फिल्म में दिखाया गया है कि आधुनिकता के बावजूद कैसे आज भी भारतीय पत्नियों को अपने पति में रब यानी भगवान दिखाई देता है। बिजली बाबू सुरिन्दर साहनी (शाहरूख खान) ने तानी (नयी नायिका होने की वजह से नाम याद नहीं) से परिस्थितिवश शादी की है। नायक नायिका को पत्नी की तरह प्यार करता है लेकिन नायिका उसे स्वीकार नहीं करती जिसके लिए नायक एक मार्डन युवक बनकर नायिका का दिल जीतने के लिए उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाता रहता है। बस यही कहानी है। फिल्म में नायक का आम आदमी वाला रोल मार्डन युवक से ज्यादा सशक्त नजर आता है। वहीं इस फिल्म में भारतीय सिनेमा में महिला पात्र जहां मात्र बदन दिखाऊ सीन के लिए जानी जाती है से निकलकर बाहर आयी है। कहा जाय तो तानी का अभिनय भी जबरदस्त है। इस फिल्म में अश्लील और उत्तेजक सीन अन्य फिल्लों की तरह न के बराबर हैं इसलिए इसे पारिवारिक फिल्म मान कर चलिये। फिल्म में मुझे कुछ सीन पर शक है जैसे शाहरूख का मार्डन युवक वाला रोल। क्या मूछें और बालों के लुक को बदलने के बाद आदमी छिप सकता है? दूसरों के लिए आसन न सही लेकिन साथ रहने वाले के लिए पहचानना मुश्किल काम नहीं है। इसे नायिका फिल्म के अंत में पहचान पाती है। दूसरी बात यह कि अब डांस सीखने के लिए अब बहू-बेटियों को गैर मर्दों के साथ जोड़े बनाकर सीखना पड़ेगा। बात कुछ अटपटी लगी।

अंत में कहा जाय तो बाकी फिल्मों से यह फिल्म थोड़ी अच्छी है। फिल्म में शुरू से आखिरी तक नई पीढ़ी में परंपरा और आधुनिकता के बीच द्वंद चलता रहता है। सूमो से मुकाबला और शाहरूख का मतलब से ज्यादा भावुक होना अखरा है। विनय पाठक जो नाई की भूमिका में हैं और नायक के दोस्त हैं, ने फिल्म में कहीं-कहीं शाहरूख के अभिनय को पछाड़ा है। मैंने इसे श्री स्टार दिये हैं।

Saturday, January 3, 2009

धर्मगुरू, धार्मिकता, धार्मिक चैनल

भारत देश शुरू से ही आध्यात्म का केन्द्र रहा है। 33 करोड़ देवी-देवताओं वाले इस देश के धर्मगुरूओं ने प्राचीन काल से धर्म के प्रचार-प्रसार के अलग-अलग तरीकों से धर्म की शिक्षा देते रहे हैं। आज के बदलते परिवेश में धन बनाम धर्म की दौड़ में धार्मिक संदेश और धार्मिकता का पाठ पढ़ाने वाले बाबाओं को नये अवतार में देखा जा रहा है। मीडिया की चकाचौंध ने उनको भी फिल्मी सितारों की तरह प्रसिद्धि दिलाई है। फिल्मी नायक-नायिकाओं की तरह अबके धर्मगुरू भी लोगों के आइकन बन गये हैं। हर कोई जो इन धार्मिक चैनलों का लुप्त उठा रहा है अपने-अपने बाबाओं का फैन है।

जैसा चैनल वैसे बाबा। सुनने में यह बात भले ही अजीब लगे लेकिन है कुछ हद तक यह सत्य ही। धार्मिक चैनलों पर प्रवचन सुनाते हुए बाबा मोटी रकम मीडिया चैनलों को देते हैं। कहावत है जो दिखता है वो बिकता है वाली बात चल रही है। एक सत्य और सामने आया कि कुछ धार्मिक बाबा जनता को प्रवचन और बोलबचन के साथ ही साथ विज्ञापनों से मोटी कमाई भी कर रहे हैं।

टीवी चैनलों पर गौर करें तो अमेरिकी टीवी चैनल की एक प्रसिद्ध डिजीटल टेलीविजन सर्विसेस डायरेक्ट टीवी, इंक ने भारत के एक आध्यात्मिक चैनल को डायरेक्ट टीवी चैनल पर जगह उपलब्ध कराने की बात कही है। एक सर्वेक्षण से पता चला है कि मार्च 2005 से अप्रैल 2006 में अकेले आस्था चैनल के विज्ञापनों का 75 प्रति’ात तक इजाफा हुआ है। ज्यादातर धार्मिक चैनलों का समय प्रातः 4 से 9 तक रहता है फिर भी उनकी कमाई प्रति 10 सेकेण्ड 600 रूपये तक हो रही है।

ऐसा नही है कि इन धार्मिक चैनलों को टीपीआर की श्रेणी में नही रखा जाता। इन चैनलों को बराबर हिट रखने के लिए धार्मिक चैनलों को पापड़ बेलने पड़ते हैं। देखने में यह भी आया है कि कुछ धार्मिक बाबाओं ने कारपोरेट जगत ही तरह अपने यहां मीडिया / जनसंपर्क अधिकारी भी नियुक्त कर रखे हैं।
बात यह है कि आज के इस चकाचौंध में धर्म और धन के होड़ में पैसा बनाने के तरीके हर जगह अपनाये जा रहे हैं।

Thursday, January 1, 2009

पुरा विश्व इस वर्ष खुशियों के लिए माना जाएगा

अमन हो
आज़ादी हो सुकून हो
शाबादी हो
ये कविता एक पाकिस्तानी बच्चे की जुबान है
मुझे इस वर्ष यह सुनकर उस बच्चे पर अभिमान है !
लडाई झगडा दूर हो जाए
दुनिया खुशियों से भर जाए
अमन फिर लौट आए
अगर 'शिशु' नव वर्ष का पैगाम दें
तो थोडी हे देर में दुनिया संवार दें।
क्यूंकि बीता वर्ष आतंकवाद के लिए जाना जाएगा
मुंबई में शहीद हुए देशभक्तों के लिए पहचाना जाएगा
अपनी बात नही करते 'शिशु'
पुरा विश्व इस वर्ष खुशियों के लिए माना जायेगा

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