Friday, May 20, 2011

शराब चाहे कच्ची हो या पक्की इसके नुक्सान तो हैं और वो भी जानलेवा.


ऐसा कहा जाता है कि गावों में कच्ची शराब का धंधा कुटीर उद्योग के रूप में चलता है, कच्ची शराब की भट्ठियां धधकने का कारण बढ़ती बेरोजगारी और कम लागत में अधिक लाभ कमाना है! बेरोजगारी से जूझ रहे जिलों में तो कच्ची शराब का कारोबार अब कुटीर उद्योग का रूप अख्तियार कर चुका है और पेट की आग बुझाने के लिए लोग गाव-गाव में कच्ची शराब की भट्टिया धधका रहे। ग्रामीण अंचलों में कुछ लोगों का ये धंधा इतना ज्यादा फल फूल रहा है कि वे इसे रोजगार का जरिया बना बैठे हैं.  इस धंधे के फलने और फूलने कारण कम खर्च में अच्छा नशा होना है जिससे ग्रामीणों में कच्ची शराब के प्रति लगाव भी बढ़ रहा है। 
कुछ लोग कच्ची शराब का व्यवसाय इसलिए भी करते हैं कि इसमें लेबलिंग और ब्रांडिंग के खर्चे नहीं उठाने पढ़ते, विज्ञापन और मीडिया का काम अखबार खुद-ब-खुद आहे-बगही खबर छाप कर करता रहता है. ज्यादातर ग्रामीण आबादी नदियों के किनारे बसे होते हैं जिससे उन्हें शराब की भट्ठियां स्थापित करने में ज्यादा खर्च भी नहीं उठाना पड़ता. 
आर्थिक जानकारों का मानना है कि जहां कच्ची शराब का धंधा चल रहा होता है वे इलाके आर्थिक रूप से पिछड़े होते हैं. पुलिस और सरकारों की माने तो कच्ची शराब के चलते अपराधों में भी अप्रत्याशित रूप से वृद्धि होती है. 
लेकिन गाँव-देहात वासियों का कहना इस मंहगाई में वे ब्रांडेड शराब नहीं खरीद सकते, और शराब के बिना - शादी, मुंडन, लगन आदि काम अधूरे माने जाते हैं. यहाँ तक कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की मांग है कि सरकार को महीने में कम से कम एक बार सस्ते अनाज की तरह एक इंग्लिश शराब की बोतल भी देनी चाहिए. 

कच्ची शराब पर आये दिन अखबार अपने - अपने आंकड़े छापते रहते हैं-
  • यूपी में सामान्य दिनों में इसकी खपत करीब दो लाख लीटर रोजाना, होली में चार लाख लीटर तक पहुंच जाती है 
  • कच्ची शराब की बिक्री बढ़ने का एक बड़ा कारण अंग्रेजी और सरकारी ठेके की शराब से इसका दाम कम होना है 
  • विधानसभा में हाल ही में सरकार ने भी माना था कि जहरीली शराब पीने से पिछले साल 87 लोगों की मौत हुई थी
  • उत्तर प्रदेश राज्य के अपर पुलिस महानिदेशक(कानून-व्यवस्था) बृजलाल  ने कहा कि अधिकारियों से कहा गया है कि अगर जिले में कच्ची शराब का सेवन करने से एक भी मौत होती है तो उसके लिए थाना प्रभारी से लेकर पुलिस अधीक्षक तक की जवाबदेही होगी।

इतना तो तय है कि शराब चाहे कच्ची हो या पक्की इसके नुक्सान तो हैं और वो भी जानलेवा. 

बिन बुलाये मेहमान पधारे, घर में ना था पानी

बिन बुलाये मेहमान पधारे, घर में ना था पानी 
बीबी रूठ गयी फिर मुझसे, बोली कड़वी बानी. 
ओ गंवार! ये गाँव नहीं है कुछ तो ख्याल किया होता
मेहमानों से पहले मूरख, पानी मंगा लिया होता
तभी दोस्तों! आधी रात एक बिसलरी लाया...
१२ बजे रात के बाद तब फिर खाना है खाया... 
इसीलिये आ रही नीद अब ऑफिस में झपकी आती
दिल्ली में मेहमान नवाजी 'शिशु' को सच में ना भाती. 

Tuesday, March 15, 2011

रैली नहीं रैला है...

रैली नहीं रैला है,
बैग जो हांथ में है 
बैग नहीं थैला है
घर वाली है घर में बैठी,
दिल्ली जो साथ आयी वो मेरी लैला है...
'शिशु' इन रैली से 
संसद रोड मैला है

Monday, February 14, 2011

बाप पुलिश में डिप्टी साहब बेटा करता फेरा-फेरी....धत तेरे की!

धत तेरे की! 
पढ़ा लिखा होकर भी तू क्यों बेंच रहा झरबेरी,  
धत तेरे की! 

बाप पुलिश में डिप्टी साहब बेटा करता फेरा-फेरी, 
धत तेरे की! 

पूरे साल खूब मेहनत की, उस पर पाए धान पसेरी,
धत तेरे की! 

जब तक जिन्दा रहे ना पूछा अब मरे को दे रहे हलुआ-पूरी, 
धत तेरे की! 

हीरा के लड़के शीरा को तरसें 'शिशु' गदहे देखो खायं पंजीरी, 
धत तेरे की!

लूट मची, लुट गए खेल में भारत के करदाता...

लूट मची, लुट गए खेल में भारत के करदाता,
आँख खोल के अब तो देखो भारत की भारतमाता.

ऐसा-वैसा नहीं! गज़ब का अजब हुआ घोटाला,
लुटी तिजोरी खेल गाँव में लगा रहा पर ताला.

दूध धुला जिसको समझा था वो निकला सर्वेश,
शशि थरूर ने खाता खोला पहली बार विदेश.

सब कहते कलमाडी ही है असली भ्रष्टाचारी,
'शिशु' और भी शामिल हैं कुछ इसमें खद्दरधारी.

नौकरशाह और नेता ही अब सबके हैं भाग्यविधाता
जन गण मन अधिनायक जय हे, उनकी भारतमाता

Friday, February 4, 2011

...लखटकिया में बैठा मानुष 'शिशु' को दिखलाता है ताव.

इंग्लिश बोली वाले सारे घुस गए हाल के अन्दर,
हिन्दी भाषी अरे बिचारे! देख रहे बन बन्दर. 

सभी जगह ही इंग्लिश बोली वाले हैं अधिकारी, 
हाय! शिशु! हिन्दी भाषी ही नौकर हैं नर नारी.  

जैसे फिक्स मैच पहले से उसी तरह होते कुछ जॉब, 
जान समझ कर अप्प्लाई कर सुन ले ओ महताब. 

ह्युमन राईट्स, इक्वालिटी जो जेंडर सदा बोलते, 
वो ही सारे सामाजिक हैं भेद जो सभी खोलते.  

जब से कार आयी लखटकिया कार को देता ना कोई भाव,
पर लखटकिया में बैठा मानुष 'शिशु' को दिखलाता है ताव.

काला कोट पहनने वालों से, हे भगवान् बचाए!

काला कोट पहनने वालों से, हे भगवान् बचाए!
साथ में काम किया पर वो फूटी आँख ना भाये,
पर वो फूटी आँख ना भाये कान के होते कच्चे
दिन भर झूठ बोलते खुद, खुद को कहते पर सच्चे 
'शिशु' कहें दोस्तों उनके साथ साल एक मैंने काटा 
काला कोट पहने वालों का सच, सही आपसे बांटा

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यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...