उसदिन से हलचल है मन में,
देखा जबसे है उपवन में-
पुष्प से बढ़कर काँटे हैं,
दुःख तो मिलकल बाँटे हैं,
पुष्प गुच्छ तो रगड़-रगड़ कर,
मिट्टी में मिल जाते सड़कर।
काँटे काँटों को लेकिन
धैर्य बंधाते रहते हैं,
सुख हों या तकलीफें हों,
दोनों मिलकल सहते हैं!
Wednesday, January 23, 2019
काँटा
Sunday, January 13, 2019
गाँजा
सन 1997-98 की बात है तब पुलिस थाना ठीक बस अड्डे के पास हुआ करता था। कस्बा पुराना है। लेकिन राजनीतिक उपेक्षा की वजह से उतना विकास नहीं हुआ जितना उस पर उसका हक़ है। वहां से रेलवे स्टेशन करीब 1 किलोमीटर के फासले पर है। स्टेशन और थाना दोनों में एक समानता थी- जमीन। दोनों के पास मतलब से ज्यादा जमीन थी, लेकिन, वह सरकारी उदासीनता की वजह से वीरान पड़ी थी। इसी वीराने पर गाँजा पैर पसारे था। असल में कुछ जमीन छोड़कर बाकी पर गाँजे का निवास था या ये कहें कि गाँजा ही दोनों जगहों का वारिस था।
कस्बे के आसपास छोटे गांवों का जमावड़ा था, ज्यादातर गावों के नाम के आगे 'पुरवा' लगा था, जैसे गयादीन पुरवा, नंदन पुरवा। जिसे बड़े गांव वाले पुरई-पाले कहकर उपहास उड़ाते थे। ख़ैर गांव से कस्बे की बाजार में खरीदारी करने आते लोग जाते समय स्टेशन के पास जरूर ठिठकते, साइकिल पेड़ के सहारे टिकाते और खाली थैले में गाँजा भरकर ले जाते। बाज़ार आते समय इसकी प्लॉनिंग पहले ही हो जाती। एक थैला केवल गाँजा के लिए होता था। कोई रोक टोक नहीं, जितना चाहो जैसे चाहो खोंट लो। गाँजे की मुस्कराहट उस समय देखते ही बनती। हालांकि ट्रेन से उतरने वालों की गाँजे पर नज़र न पड़ती। गाँजा मुसाफिरों से अपने को उपेक्षित समझता। वो कहते हैं कि हीरे की परख जौहरी को होती है इसलिये पैदल-राहगीरों, साइकिल, टांगे, बैलगाड़ी वालों को इसकी परख थी। उस समय तक मोटर साइकिल का उतना चलन नहीं था। कोई कोई ही मोटरसाइकिल से चलता था, लेकिन वो भी उसका रस लिए बिना नहीं मानता।
अब थाने की तरफ चलते हैं। उस समय गाँजा रखना, पीना अपराध नहीं था, लेकिन पुलिश की नज़र में उगाना जरूर अपराध था, इसलिए लोग अपनी निजी जमीन पर उसे नहीं बोते थे। उन दिनों सार्वजनिक जमीन पर कब्जा करने का दौर नहीं था। लोग उसका उपयोग जरूर करते लेकिन कब्जा नहीं जमाते। इसलिए सार्वजनिक जमीन गाँजा उगाने के लिए उपयोग में लाई जाती थी। लोग कहते थे थाने के गाँजे की अलग ही बात है। जिसने एक बार उस गाँजे की चिलम लगा ली उसके लिए पूरा दिन गर्व की बात होती थी। उससे बढ़कर भोले का प्रसाद कोई और हो ही नही सकता। लेकिन वहाँ से गाँजा तोड़कर कैसे लाएं यह बिल्ली के गले में घण्टी बांधने के समान था। सयाने लोगों का काम थाने का चौकीदार कर देता था, लेकिन गरीब और कुम्हार, चमार, पासी, धोबी धानुक आदि जातियों को चौकीदार भाव नहीं देता था, हालांकि वह भी उनमें से एक था। कुछ पियक्कड़ थाने का गाँजा पीने की खातिर छोटे मोटे अपराध तक कर डालते थे, ऐसा कहा जाता था, इस बात में कितनी सच्चाई है कहना मुश्किल है।
जबसे गाँजा लाना ले जाना अपराध की श्रेणी में आया है तबसे सार्वजनिक जगहों का गाँजा सूखकर काँटा हो गया है। कई सालों बाद स्टेशन जाना हुआ देखा कि वहाँ का गाँजा अपनी अंतिम सांस गिन रहा है। थाने में गाँजा तो हरगिज होगा ही नहीं क्योंकि अब पुलिस किसी बेगुनाह को पकड़ते ही सबसे पहले गाँजा और तमंचा दिखाकर ही जेल भेजती है। वहां का सारा गाँजा अब जेल में बंद है।
Saturday, January 12, 2019
विदाई गीत।
अब तनिक भी मन यहाँ लगता नहीं है,
लग रहा निर्वाण का क्षण आ गया है।
ज़िन्दगी भर कष्ट के बोझे उठाए,
ख्वाब तक में सुख कभी देखा नहीं है।
ज्योतिषी ने बहुत पहले ही कहा था,
हाथ में सुख की कोई रेखा नहीं है।।
आंसुओं की धार झर-झर बह रही है,
चक्षुओं में लग रहा कण आ गया है।
अब तनिक भी मन यहाँ लगता नहीं है,
लग रहा निर्वाण का क्षण आ गया है।
छल, कपट, फ़रेब का साया रहा हरदम,
इसलिए फ़रेब पर भी बोल देता हूँ।
जिन सयानों को 'गुरु' समझा कभी था,
आज उनकी पोल भी मैं खोल देता हूँ!!
कुछ नहीं कहना, हमेशा खुश रहें वे,
याद मुझको स्वंय का प्रण आ गया है।
अब तनिक भी मन यहाँ लगता नहीं है,
लग रहा निर्वाण का क्षण आ गया है।
प्यार से जिनसे निभाना चाहता था-
हर मुसीबत वे हमें ही बांट देते थे।
डोर संबंधों की पकड़े मैं रहा ताउम्र,
था भरोसा जिनपे वे ही काट देते थे।।
आख़िरी है छंद, यह अंतिम विदाई,
भूल जाता हूँ! स्मरण आ गया है।
अब तनिक भी मन यहाँ लगता नहीं है,
लग रहा निर्वाण का क्षण आ गया है।
Sunday, November 4, 2018
त्यौहारों को मजहब में तुम, बाँट रहे हो भाई क्यूँ?
कम-से-कम शब्दों में, बात समझने वाले,
मुझसे बकवादी तुम, छाँट रहे हो भाई क्यूँ?
नफ़रत, हिंसा, मारपीट फैलाने वाले कौन?
मेरे प्रश्नों पर मुझको तुम, डांट रहे हो भाई क्यूँ?
जिनसे खुशियाँ मिलती हैं उन पर सबका हक,
त्यौहारों को मजहब में तुम, बाँट रहे हो भाई क्यूँ?
नेतानगरी खूब समझता, मुझको मत समझाओ!
उल्लू जन मानस का तुम, काट रहे हो भाई क्यूँ?
Monday, October 29, 2018
खुशी की कश्तियाँ मुझको अरे दे दो कोई लाकर।
बरसने की जरूरत थी, गरजने क्यों लगे आकर,
कोई आओ बताओ बादलों को बात ये जाकर।
मुसीबत में दुःखों के हर तरफ तूफ़ान दिखते हैं,
खुशी की कश्तियाँ मुझको अरे दे दो कोई लाकर।
वो पहने घूमता कुर्ता, दिलाया हमने उसको था,
हमारी नेकनियती की उसे कर दो खबर जाकर।
उसे करना था अच्छे काम उसको छोड़कर देखो,
लूटता अब खजाना है, गरीबों पर ज़ुलम ढाकर।
शहर केवल अमीरों का, गरीबों के लिए मुश्किल,
गुजारा कर रहे हमलोग, केवल रोटियाँ खाकर।।
Wednesday, October 24, 2018
रार, तक'रार और प्यार है पति-पत्नी की देन।
हालात देश के ऐसे हैं, 'शिशुपाल' देख कर दंग।।
हालात देश के ऐसे हैं, 'शिशुपाल' देख कर दंग।।
लगता है सरकार देश की ओढ़ रजाई सोई है।।
राजा बोल रहा जनता से मेरी कोई खता नहीं!!
मैं रैली में गया वहाँ था, कोई ख़बर न लेता है।।
दिल्ली की जनता को प्रतिदिन देता रहता झाँसे है।
धाँसे: पहने
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