Tuesday, August 11, 2009

बने फिरंगी फिर रहे गली-गली गंगू तेली

गरम-गरम चाय हम पीते ठंडा पानी,
देख विदेशी बन गए हमसब हिन्दुस्तानी

पीजा मिलता यंहा पर वेज़-नानवेज
व्रत वाला भी बेचते राधे और परवेज़

मेकप मुंह पर थोपकर पुरूष घूमते आज
महिला मेकप कम ही करती इसमे गहरा राज

रिसेशन का दौर है पूरा विश्व तबाह
हिन्दुस्तान अछूता इससे हम कहते हैं 'वाह'

हिन्दी पढ़ डिग्री ले घूमे पढ़े लिखे हैं फिरते
दसवीं पढ़ अंग्रेजी वाले लिए नौकरी फिरते

बने फिरंगी फिर रहे गली-गली गंगू तेली
अजब-गजब की दाढी-बाल अनजानी है बोली

1 comment:

विनय ‘नज़र’ said...

शिशु भाई ग़ज़ब कर दिया