धन्ना सेठ पधारे दिल्ली धन-दौलत के चक्कर में,
पूँजी सभी लगाई उसने महंगी जो है शक्कर में।
उधर खरीदी सदर मार्केट इधर बेंच दी फुटकर,
बेटे-बाप सभी धंधे में लगे हुए हैं डटकर।
पिता हमारे बतलाते हैं उनका नमक का धंधा था,
पैसा उससे बहुत बनाया जबकि नमक तब मंदा था।
बीस साल हो गए गाँव से जब वो आए दिल्ली,
सभी गाँव वालों ने उनकी तब उडाई थी खिल्ली।
धन्ना सेठ गाँव में अब हैं सबसे पैसे वाले,
गाँव में महल खड़ा हैं उनका जंहा जड़े हैं ताले।
दिल्ली में भी कोठी उनकी अच्छे दो हैं बंगले,
पर धन्ना के नज़रों में धन्ना अब भी कंगले।
जो भी गाँव से आता, पहले धन्ना के घर जाता,
खाने-पीने-रहने की सारी सुविधा पा जाता।
धन्ना के घर वाले सारे गरमी में घर जाते,
सारे गाँव को उसदिन वो महंगी दावत करवाते।
'शिशु' कहें सब लोग काश धन्ना काका से होते,
दौलत वाले होकर भी वो नही घमंडी होते।
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मनोरंजक कविता...वाह...
नीरज
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