Tuesday, September 7, 2010

एक भिखारिन रोज़ सड़क पर खड़ी मांगती भीख...

एक भिखारिन रोज़ सड़क पर खड़ी मांगती भीख,
छोटी बच्ची साथ में उसके, उसको देती सीख! 

कपड़े मैले पहन अरी ओ, आंसूं आँख में डाल,
बाल बनाए बैठी है क्यूँ, बाल बना मकडी के जाल!

बाबूजी-बाबूजी कहकर रोककर के दिखलाती जा,
माता जी भूखीं हूँ कल से, बातें नयी बनाती जा!

पकड़ हांथ में बैसाखी ये, लंगड़ी भी बन जाना,
गांठ बाँध ले बात एक ये दिन भर खाना ना खाना!

'शिशु' ने उस बच्ची को एक दिन दौड़ लगाते पाया,
सोंचा ये इंसान की देन है या ईश्वर की कोई माया! 

1 comment:

संगीता पुरी said...

ऐसा ही होता है !!