Thursday, April 8, 2010

इसीलिये अब नहीं लिख रहा, मन में ही लिख लेता हूँ.

गीत लिखूं या लिखूं कहानी
नहीं समझ कुछ आता है,
अपना लिखा गीत मुझको तो 
बिलकुल ही ना भाता है.

कभी-कभी तो जगकर रात
लिखता और मिटाता गीत
लिखा हुआ पढ़ता कई बार
नहीं समझ में आता गीत 

कई बार लिखते-लिखते 
कुछ झुंझलाहट सी होती 
और कभी जाने-अनजाने 
कविता पलक भिगोती

कितने ही मौके आये जब- 
लगता लिखना है बेकार, 
कितने ही मौके आये जब-
लगता बेड़ा गर्क है यार

खुद से पूछा कितनी बार,
क्या होगा जो लिख डाला? 
लिखते हो तो अच्छा लिखते
ये क्या है गड़बड़ झाला?

जब पढ़ता औरों के गीत
तब लगता मैं हूँ नालायक
मेरी कविता अर्थ-अनर्थ,
उसकी कविता ही है लायक

इसीलिये अब नहीं लिख रहा,
मन में ही लिख लेता हूँ. 
'नज़र-नज़र का फेर' समझकर
खुद निंदा कर लेता हूँ.  Poems and Prayers for the Very Young (Pictureback(R))

Wednesday, April 7, 2010

जीजाजी होंगे सोहेब! क्या भारत होगा साला ?

जीजाजी होंगे सोहेब! क्या भारत होगा साला ?
कुछ दिन चुप होकर के बैठो लगा के मुंह पे ताला

पाकिस्तान में भाभी- भाभी मचा हुआ है शोर,
दावत और वलीमा दोनों हो रहे हैं चंहुओर.

कट्टरपंथी प्यार में अब अड़ा रहे हैं टांग,
अखबारी मुर्गा जो सब हैं रात में दे रहे बांग.

सोहेब! पहले से शादी-शुदा पहले से दामाद,
अबसे पहले गुम थी बीबी अभी कर रही याद.

'शिशु'-'भावाना', दे रहे अभी से उन्हें बधाई,
वाह-वाह अल्लामियां-राम जी जोड़ी खूब बनाई.

Tuesday, April 6, 2010

वंदन-अभिनन्दन है स्वागत, आप आये घर-द्वार हमारे,

वंदन-अभिनन्दन है स्वागत, आप आये घर-द्वार हमारे,
कैसे कहूं शब्द कम पड़ते, हुए धन्य हम आप पधारे,

हर्षित हो सहगान कर रहे,
अपने पर अभिमान कर रहे,
आप को अर्पित पुष्प ये सारे,
हुए धन्य हम आप पधारे...
वंदन-अभिनन्दन है स्वागत, आप आये घर-द्वार हमारे,
कैसे कहूं शब्द कम पड़ते, हुए धन्य हम आप पधारे,

धन्य भाग्य हम आपको पाकर
आप अतुल्य आप हैं सागर,
आप चन्द्रमा हम सब तारे
हुए धन्य हम आप पधारे...
वंदन-अभिनन्दन है स्वागत, आप आये घर-द्वार हमारे,
कैसे कहूं शब्द कम पड़ते, हुए धन्य हम आप पधारे,

रख्खा मान आप जो आये
जितने यहाँ सभी को भाये
आपका स्वागत करते सारे
हुए धन्य हम आप पधारे...
वंदन-अभिनन्दन है स्वागत, आप आये घर-द्वार हमारे,
कैसे कहूं शब्द कम पड़ते, हुए धन्य हम आप पधारे...

Wednesday, March 31, 2010

क्षमा करो श्रीमान... जान अज्ञानी मुझको मान...

क्षमा करो श्रीमान... जान अज्ञानी मुझको मान...
क्षमा करो श्रीमान... जान अज्ञानी मुझको मान...

सही कहा इसलिए चल दिए लेकर तीर-कमान...
क्षमा करो श्रीमान... जान अज्ञानी मुझको मान...

बड़बोलापन दिखता मुझमे कुछ ऐसा ही लो मान...
अबसे राय नहीं दूंगा मैं इतना भी लो जान...
क्षमा करो श्रीमान... जान अज्ञानी मुझको मान...

मैं हूँ तुक्ष जीव इस युग का आप हैं बहुत महान...
आप हैं इन्द्र का इन्द्रासन जी हम हैं मीन सामान...
क्षमा करो श्रीमान... जान अज्ञानी मुझको मान...

आप दूध से धुले हुए हैं हम कोयले की खान...
मैं क्या हूँ? औकात क्या मेरी? मेरी नन्ही जान...
क्षमा करो श्रीमान... जान अज्ञानी मुझको मान...

क्षमा करो श्रीमान... जान अज्ञानी मुझको मान...
क्षमा करो श्रीमान... जान अज्ञानी मुझको मान...

मेहनत-मजदूरी है पेशा वे असली श्रमशक्ति के दूत....

बरसाती-गंदी-नाली के कीड़े वो जन कहलाते हैं.
जो जीवनभर कठिन कार्य कर जीवन कठिन बिताते हैं.

मेहनत-मजदूरी है पेशा वे असली श्रमशक्ति के दूत.
कार्य कुशलता दिखती उनमे वे भारत के असली पूत.

भले नहीं हों पढ़े-लिखे पर वे रखते सामाजिक ज्ञान.
मेहनत-मजदूरी करके वे रखते हैं परिवार का ध्यान.

श्रद्धा से मस्तक झुक जाता जब भी देखूं उनका काम.
दुःख होता सुन कठिन परिश्रम का मिलता उनको कम दाम.

पढ़े-लिखों से विनती 'शिशु' की उनका भी रखो सब ध्यान,
उनके बारे में भी सोचो, उनका सभी करो सम्मान...
उनका सभी करो सम्मान...

Friday, March 26, 2010

मेल! मेल को समझो मेला घर को कर दो सेल

अब दिल्ली में भीख मांगना और बड़ा अपराध,
अपराध! यदि हुआ किसी से भी तो समझो जेल,
जेल! जेल को नहीं समझना आने वाले खेल,
खेल! खेल-खेल में होगी सड़क पे रेलमपेल
रेलमपेल! कुम्भ जैसे बिछड़ेंगे, फिर होगा तब मेल
मेल! मेल को समझो मेला घर को कर दो सेल
सेल! सेल से पैसा जो आये उससे खा पूरी-भेल

Thursday, March 25, 2010

बदमाश तेल! तू ही बिगड़ रहा आम आदमी का खेल!

बदमाश तेल!
तू ही बिगड़ रहा आम आदमी का खेल!

कोमन-वेल्थ-गेम!
और शीला दीक्षित जी सेम टू सेम!

'कबीर'-माया महा ठगिन हम जानी...
'शिशु'-माया माया की हम जानी...

रूपये की माला!
अबे कम बोल! जुबान पर लगा ताला...

हजार हजार के नोट!
बुरा मत मानो, चुनाव के समय यही दिलाएंगे वोट!

दिल्ली की मंहगाई!
मीडिया की खबर! मीडिया की कमाई!

पुलिश की भर्ती!
भगदड़ मची, कितनो की उठी अर्थी!

स्वामी जी का भंडारा!
हो गया ६०-७० का वारा-न्यारा!

बाबा इच्छाधारी!
मर्सडीज़ छोड़, जेल वाहन की कर रहे सवारी... 
 

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