Friday, February 13, 2009

सड़क किनारे भीख मांगते बच्चे जो दिखते हैं सारे

सड़क किनारे भीख मांगते बच्चे जो दिखते हैं सारे
जाने कब? कैसे निकलेगे? इस दलदल से तारे

भीख मिलेगी ज्यादा क्या? इसलिए बेचारे रोते
सुबह-रात हो सभी दीखते जाने कब ये सोते

जाड़ों की भीषण रातों में सदा उघारे रहते
गर्मी अब आयेगी तब ये मैला कोट पहनते

जो बच्चे हैं भीख मांगते उनकी उम्र है कच्ची
बड़ी उम्र के किताब बेचते करते माथा-पच्ची

कुछ बच्चे तो गाड़ी भी उन कपड़ों से चमकाते
जिन्हे पहन सर्दी-गर्मी में चौराहों पर आते

दशा कहें या अति दुर्दशा उन बच्चों की होती
जिनको चलने-फिरने या फिर कमी अंग में होती

वे सड़कों के खड़े किनारे बेबश हो बेचारे
देखें कातर नजरों से, कोई उनको देख पुकारे

कुछ बच्चे जो अच्छे-खासे बने अपाहित फिरते
क्योंकि मिलेगा पैसा ज्यादा इसी ताक में रहते

जैसे ही रेड लाइट पर गाड़ियां रूकेगी सारी
कभी-कभी भीख की खातिर करते मारा-मारी

नियम बने कानून बने पहले से इतने ज्यादा
किन्तु आज तक लागू हो पाया देखो आधा

इन गरीब बच्चों के नाम, कुछ लोग जहाज में चलते
मोटी-मोटी तनख्वाहों से अपनी जेबें भरते

प्लानिंग करते, मीटिंग करते, मंहगे होटल में रूकते
उन बच्चों की फिक्र न कोई जो कष्ट अनेकों सहते

वर्कशाप अंग्रेजी में हो यह ध्यान हमेशा रखते
किन्तु न करते जरा ध्यान भी जिनकी दम पर चलते

राइट बेस अप्रोच बनाते एडवोकेसी करते
जितनी भी एनजीओ हैं सब देखा-देखी करते

'शिशु' कहें लिखने में मेरा हृदय द्रवित हो जाता
इससे ज्यादा हाल बुरा अब लिखा नही है जाता

Thursday, February 12, 2009

जो दिल में घाव करे गहरे उसको ही प्यारा कहते हैं

हंसी-हंसी में दिल को लगाया रोने वाली बातों को।
क्या बतलायें कैसे झेला उन अंधेरी रातों को।।

जबसे तूने प्यार के बदले कीमत देनी चाही है।
तबसे हमने ठान लिया तेरे आने की मनाही है।।

जो प्यार करे इस दुनिया में उसको आवारा कहते हैं।
जो दिल में घाव करे गहरे उसको ही प्यारा कहते हैं।।

मनचलों को मनमाना कहते, मनचला नहीं, तो प्यार करें।
जो प्यार करे सच्चा-सच्चा, उस पर ना वो इतबार करें।।

रोने वालों को लोग कहें, दुख इसके बहुत बड़े होंगे।
जो हंस कर कष्ट छिपाते हैं वो उनसे बहुत बड़े होंगे।

बेवफ़ा यहां पर हर कोई, ये बात अलग बतलाये ना।
है सच्चा जो बतलाये ये, जो झूठी कसमें खाये ना।

क्या 'शिशु' कभी झूठा होगा ये आज तुम्हें बतलाता है।
बतलाने से पहले यारों खुद झूठी कसमें खाता है।

अब यार रहे ना याराना, अब हीर नहीं कोई रांझा
अब प्यार भी चलता है वैसे जैसे धंधों में है साझा

Wednesday, February 11, 2009

फूल देते 'फूल लोग' ताकि प्यार याद रहे!

प्यार, तकरार, रार आदमी की देन है,
आदमी ही आदमी का बहुत बड़ा फैन है!

प्यार जब करे कोई देखता न रूप-रंग,
उम्र सीमा कोई नही, देखता ना कोई ढंग!

प्यार के इज़हार की है आदि-अंत कोई नही,
दूजी बात जाती-पांति उम्र सीमा कोई नही!

पहला प्यार भूलना है काम आसान नही
और दूजे प्यार पाना भी यार है आसान नही

प्यार का ना कोई दिन, रोज़-रोज़ प्यार रहे
फूल देते 'फूल लोग' ताकि प्यार याद रहे!

'शिशु' कहें प्यार में तकरार एक आम बात,
किंतु तकरार में यदि प्यार रहे बड़ी बात!

Friday, February 6, 2009

भारत की ऋतुएँ सब प्यारी .............

डाल-डाल पर फूल खिले हैं
कलियाँ भी मुस्काईं
भौंरे तितली गीत गा रहे
पतझड़ की ऋतु आई

बोल पपीहा रहा कहीं पर
कोयल गाती है मधुर गीत
भौरें गुंजन करते रहते
जैसे साजन-सजनी की प्रीत

सूरज की तपन बढ़ी ऐसी
कुछ-कुछ गर्मी लगती है
जाड़ा समझो हो गया ख़त्म
नयी ऋतु प्यारी ये लगाती है

इस मनमोहक ऋतु का
हर कोई करता रहता इन्तजार
सुंदरियाँ करती हैं श्रृंगार
प्रिय का पाती भरपूर प्यार

फसलें पक जायेंगी
होगा अनाज भरपूर
यह सोच रहा है एक किसान
अब पल वो नही है दूर

भारत की ऋतुएँ सब प्यारी
हर ऋतु का अपना अलग मजा
लेकिन इस बसंत ऋतु का
सबसे बढ़कर है अलग मजा

Thursday, February 5, 2009

होली के हुडदंग में उसने पीली कुछ ऐसी

होली के हुडदंग में उसने पीली कुछ ऐसी
होश गवां बाप से बेटा बोला तेरी ऐसी- तैसी

बिना पिए, कह देता हूँ इस बार नही रंग खेलूँगा
अब मै बच्चा रहा नही, इसलिए नही रंग खेलूँगा

ख़ुद विस्की पीकर खुश होते मुझे रंग की पुडिया
बेटा हूँ मै, बेटी कोई जो दिखलाते गुडिया

चल निकाल सौ सौ के नोट, दो अद्धे लाऊंगा
दे दस दस के खुल्ले नोट नमकीन भी लेता आऊंगा

होली में रंग का क्या लेना कीचड कब काम में आएगा
खालो - पीलो मौज मनालो साथ में कुछ न जाएगा

सुनकर ये बातें बेटे की बाप तुरत ही बोला
हाय! व्यर्थ जीवन में बीता, अब सच तूने बोला

जर जमीन जोरू जो है उसको जल्दी बिकवादे
अद्धे को तू मार दे गोली पूरी बोतल पिलवादे

चुम्में और अश्श्लीलता

दोस्तों एक बहुत खतरनाक मुद्दे पर लिखा रहा हूँ, लेकिन डर है कि कहीं बीबी ने पढ़ लिया तो जूते पड़ जायेंगे। बोलेगी कि निजी जीवन को सार्वजनिक करते हो। खैर जब बात उठी ही है तो कुछ लिखते हैं, लेकिन खुल कर नहीं। अभी हाल ही में डेलही हाई कोर्ट ने आदेश सुनाया कि अब पति और पत्नी खुले आम कही भी चूमाचाटी कर सकते हैं। लेकिन ध्यान यह रखना होगा कि कोई उसका गवाह न बने. डेलही जैसे भीडभाड वाले शहरों में जंहा हर आदमी काम बस काम और जल्दबाजी में रहता है ऐसे में किसको पड़ी है कि वो किसी के चूमाचाटी के लिए कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाये. सो ये बात अब तय है कि कोई भी कहीं भी चूमाचाटी कर सकता है.

अभी हॉल ही में भारत की एक अदालत ने दिल्ली में सार्वजनिक स्थान पर चुंबन के कारण अश्लीलता के आरोप झेल रहे एक दंपत्ति के ख़िलाफ़ मामले को ख़ारिज़ कर दिया है।दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि कैसे किसी युवा विवाहित दंपत्ति के प्यार जताने पर अश्लीलता का आरोप लगाया जा सकता है?

इससे पहले हमारे यंहा किसी पर अश्लीलता का आरोप तब लगाया जाता है जब इससे जनता को परेशानी हो, ऐसे अश्लील आचरण के लिए अधिकतम तीन महीने क़ैद का प्रावधान है। लेकिन इस बार डेलही की एक अदालत में जज ने फैसला सुनते हुए कहा कि अगर पुलिस की रिपोर्ट सही भी है तो भी यह बात समझ में नहीं आती कि एक युवा विवाहित जोड़े के प्रेम प्रदर्शन को कैसे अश्लीलता के दायरे में लाकर कानून की उत्पीड़क प्रक्रिया में डाला जा सकता है.

याद दिला दें कि इस विवाद का जन्म तब हुआ जब मशहूर होलिहूड अभिनेता रिचर्ड गियर ने एक समारोह में शिल्पा शेट्टी का चुंबन लेकर विवाद पैदा कर दिया था! सन 2007 में हॉलीवुड के अभिनेता रिचर्ड गियर ने दिल्ली में आयोजित एक समारोह में भारतीय अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी का सार्वजनिक रूप से चुंबन लेकर विवाद पैदा कर दिया था। इसके विरोध में अनेक प्रदर्शन भी हुए थे.

इस सबसे एक बात तो तय है कि अब इस चूमाचाटी से मनचले प्रेमी और प्रेमिकाओं को शादी के नाम पर चूमाचाटी का मौका जरूर मिल जाएगा!

Thursday, January 29, 2009

उपदेशों की बानगी

हमारे यहां एक कहावत है- ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’।

उपदेश
और उपदेशक हमारे देश की महानता को दर्शाते हैं। कहा जाता है कि हमारे देश से बढ़कर दुनिया में कहीं भी अच्छे उपदेश और उपदेशक और कहीं नहीं हैं। बात सौ आने सही है। अब उपदेश भी ऐसे-ऐसे हैं कि जरूरी नहीं कि वो हर किसी के जीवन में काम आयें। यदि इन उपदेशको को सुनें तो उन्हें समझने के लिए भी उपदेश लेने पड़ते हैं। यहां कुछ उपदेशों की बानगी देखिये-

धर्म गुरू (प्रवचन करते बाबा) कहते हैं बच्चा दुनिया के बखेड़ों में मत पड़ो। दुनिया बहुत लुटेरी है। जो कुछ कमाओ भगवान को अर्पण करो। मुझे कुछ नहीं चाहिए लेकिन आश्रम में दान-धर्म हो जाये तो आने वाली पीढ़ी को अर्धम से बचाया जा सकेगा।

पादरी साहब उपदेश देते हैं-प्रभु ईशा की सरन गहो, वो तुम्हारे पाप की गठरी को सिर उठाये सूली पर चढ़ गया था। न कुछ दान करो, न तपस्या की ज़रूरत है और न ही व्रत की आवश्यकता है, जमकर शराब पियो और प्रभु ईशा पर ईमान लाओ। बस। सब ठीक होगा।

आरएसएस और हिन्दू धर्म के आधुनिक विचारक उपदेश देते हैं-बाप-दादा की लीक पीटते जाओ। यही सम्पूर्ण वेद-शास्त्र का निचोड़ है। संस्कृति और सभ्यता को समझो। धर्म पर चलो। स्त्रियों को घर पर रहकर पति की सेवा और सत्कार में मन लगाना चाहिए। पाश्चात्य देशों ने हिंदू धर्म का बेड़ा गर्क कर दिया है। इसलिए उनका बताये रास्तों पर न चलकर प्राचीन धर्मशास्त्रों को पढ़ो और उन पर अमल करो।

यार-दोस्तों के उपदेश कुछ ऐसे होते हैं-तुम भी यार क्या हो? बस काम-काम और काम! कभी हमारे साथ चलो। खाओ-पियो बेटा। कोई अमर नहीं है। सब यहीं का यहीं रह जायेगा। फिर पीछे बोलोगे यार सारा जीवन व्यर्थ गया। इसलिए अभी से मजे करो। भाड़ में जाय दुनिया।

ऑफिस में बॉस समझाते हैं-गीता पढ़ो। उसमें लिखा है कर्म किये जा फल की इच्छा करना मनुष्य का काम नहीं। यदि कर्म करोगे तो फल तो कभी न कभी मिलेगा ही। ऑफिस के आर्थिक और प्रशासनिक और आर्थिक विशेषज्ञ समझाते हैं क्या फर्क पड़ता है तुम स्टॉफ रहो या कंस्लटेंट तनख्वाह मिलनी चाहिए और वो तुम्हे मिलेगी। छुट्टी और पीएफ का क्या करोगे वो सब को मोह-माया है बच्चा।

मां-बाप समझाते हैं-बेटा बहू से कहो कभी-कभी गांव भी आया करे। क्या यह उसका घर नहीं? हमारा भी मन करता है कि हम बेटा बहू साथ-साथ घर आयें तो अच्छा लगता है। 80 साल की बुढ़िया (दादी मां) समझाती है-बेटा अब तुम सयाने हो गये हो। घर-बार की फिक्र करो। ऐसी चाल चलो जिसमें जग-हंसाई ना हो।

घरवाली समझाती है- महीने में जो भी कमाते हो, भाई-बहन को खिलाने-पिलाने और मां-बाप को सौंप देते हो। यदि उसी धन को जमा करते रहो तो मैं सिर से पैर तक सोने के गहनों से लद जाऊँ। तुम्हें क्या पता नहीं बाप-बड़ा ना भइया, सबसे बड़ा रूपइया।

रास्ते पर चलता हुआ भिखारी समझाता है-साहब अब 1 रूपये में क्या मिलता है। कम से कम 5 रूपये मिलने चाहिए। अब आप ही बतायें आजकल 1 रूपये में क्या मिलता है।

बात यह है कि इस बारे में जितना लिखा जाये कम ही है। अब तो आपलोग भी समझ गये होंगे कि यह भी लिखकर उपदेश ही दे रहा है। इसलिए मैं उपदेश न देकर उपदेशों को सुनना पसंद करूंगा।

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यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...