Friday, January 27, 2012


१ 
कब तक तेरी राह तकूँ मैं 
कब तक चाहूँ तुझको! 
जनम-जनम का रिश्ता कहकर
तो ठगती है मुझको !! 
२ 
नयी चाल चल रहा चुनाव
बोला - देना वोट जरूरी!
सोच समझ कर देना वोट
ये तेरी मजबूरी!!
३
देश महान बना नेता से,
नेता जी ही चोर!
पांच साल तक नज़र न आये, 
अभी मचाते शोर !!
४
'शिशु' आंख से मोती टपके, 
पलके भीग गयीं मेरी!
कितने दिन हो गए मिलन को 
अब तो मत कर तू देरी!!
५
कल, मिली पार्क में पहली वाली 
कहता था जिसको दिलवाली!
आह एक दिल से है निकली,
बोला दिल ने धत साली!!

Tuesday, November 8, 2011

अन्ना ना तेरे हैं, ना मेरे हैं, अन्ना को अब सब घेरे हैं...

ना तेरे हैं, ना मेरे हैं,
अन्ना को अब सब घेरे हैं...

इधर मीडिया बोल रही है 
अन्ना सच्चे गांधीवादी. 
उधर मीडिया बोल रही है 
अन्ना ही असली बरबादी

भ्रष्टाचार मिटेगा पूरा-  
सच! अन्ना टीम बोलती है.
उधर मीडिया अन्ना टीम का
सच! सच में भेद खोलती है.

'शशि शेखर'* 'शिशु' बोल रहे हैं 
अन्ना हुए सियासी हैं.
कांग्रेसी के दिग्गी-दिग्गज 
बोले अन्ना बासी हैं. 

अन्ना की अनचाही टीम 
अन्दर-अन्दर टूट रही.
जिसको नहीं मिला पद-पदवी 
वो अन्ना से रूठ रही.

भ्रष्टाचार ख़तम होगा क्या? 
क्या राम रज्य आ जाएगा?
या यह भ्रष्ट व्यस्था ही 'शिशु' 
अन्ना को खाजेगा
सोचा आज सवेरे है 
ना तेरे हैं, ना मेरे हैं,
अन्ना को अब सब घेरे हैं...

*हिन्दुस्तान के सम्पादकीय लेख में दिनाक ६ नवम्बर को छपे शशि शेखर के लेख से ...अच्छा हो अन्ना सियासी लोगों की भाषा छोड़ नयी पीढी को सदाचार और संस्कार के आन्दोलनों को आगे बढ़ाएं..  

Thursday, June 30, 2011

वाह! क्या है खूबसूरत! बादलों का ये नजारा.


वाह! क्या है खूबसूरत? 
बादलों का ये नजारा. 
कर रही थी झील आकर
पास में मेरे इशारा.

झील जो इस पार से 
और जो उस पार से 
जीतती है दिल हमारा 
अपने गहरे प्यार से

फूल स्वागत कर रहे हैं 
खिलखिलाते जोर से 
और बारिश खींचती है  
ध्यान अपने शोर से 

हैं वृक्ष ऊँचे ओक के 
जो दे रहे आशीष हैं 
झील के नजदीक ही  
देखो खड़े प्रभु ईश हैं. 

है भाप बनती दीखती 
जो ध्यान बरबस खींचती 
वो भाप ही फिर गरजकर 
है प्रकृति उपवन सींचती 

है धूप पल में छाँव भी 
है सर्द सा एहसास भी 
है दूर लेकिन लग रहा
ये है हमारे पास ही  

गीत और संगीत, गायक  
और रचनाकार भी 
गा रहे हैं गीत पंक्षी
है बांस की झंकार भी 

है कौन जो ये प्राकृतिक 
है चित्रकारी कर रहा 
या कल्पना आकर में 
फिर रंग सारे भर रहा 

है बादलों के बीच बैठा 
छुप, 'छुपा-रुस्तम' कहें 
'शिशु'  निरंकारी या उसे 
'शिव' 'सुन्दरम' 'सत्यम' कहें

Saturday, June 18, 2011

शादी हुयी बन गयी पत्नी, पति-पत्नी का दर्जा पाया, पर सुहागरात से पहले....

शादी हुयी बन गयी पत्नी
पति-पत्नी का दर्जा पाया
पर सुहागरात से पहले 
पत्नी ने पति को समझाया- 
शादी हुयी बहुत पहले ही
मैं हूँ एक सुहागिन नारी
भईया तुम बन जाओ मेरे 
मैं पहले वाले की प्यारी
सुनकर पति मगन हो बोला-
बहन कहानी में है ट्विस्ट
खबर हुयी ये ख़ास मीडिया 
वाले करते इसको मिस्स्ड 
रस्मे जैसे पहले हमने 
दोनों साथ निभाई थी 
एक रस्म दो और अदा कर 
राखी आज मंगाई थी
प्रणय सूत्र के बंधन से 
है रक्षाबधन अच्छा 
बहन आपने बचा लिया 
है प्यार आपका सच्चा
है प्यार आपका सच्चा

Thursday, June 16, 2011

बीडी के संग चाय ... है दैया हाय....


बीडी के संग चाय
... है दैया हाय....
बाबा बोले मुझसे आज-- 
गर्मी में पीना पन्ना... 
नहीं मिले तो गन्ना...
भ्रष्टाचार विरोधी हो जा  
बाबा के संग या संग अन्ना
या बन जा सरकारी बाबू
धनवानों संग धन्ना...
जीवन-मरण समझ ले मूरख
जीवन है ये झन्ना....
बाबा जी की बातें यारों 
शिशु को नहीं हैं भाय 
बीडी के संग चाय
... है दैया हाय....

Friday, May 20, 2011

शराब चाहे कच्ची हो या पक्की इसके नुक्सान तो हैं और वो भी जानलेवा.


ऐसा कहा जाता है कि गावों में कच्ची शराब का धंधा कुटीर उद्योग के रूप में चलता है, कच्ची शराब की भट्ठियां धधकने का कारण बढ़ती बेरोजगारी और कम लागत में अधिक लाभ कमाना है! बेरोजगारी से जूझ रहे जिलों में तो कच्ची शराब का कारोबार अब कुटीर उद्योग का रूप अख्तियार कर चुका है और पेट की आग बुझाने के लिए लोग गाव-गाव में कच्ची शराब की भट्टिया धधका रहे। ग्रामीण अंचलों में कुछ लोगों का ये धंधा इतना ज्यादा फल फूल रहा है कि वे इसे रोजगार का जरिया बना बैठे हैं.  इस धंधे के फलने और फूलने कारण कम खर्च में अच्छा नशा होना है जिससे ग्रामीणों में कच्ची शराब के प्रति लगाव भी बढ़ रहा है। 
कुछ लोग कच्ची शराब का व्यवसाय इसलिए भी करते हैं कि इसमें लेबलिंग और ब्रांडिंग के खर्चे नहीं उठाने पढ़ते, विज्ञापन और मीडिया का काम अखबार खुद-ब-खुद आहे-बगही खबर छाप कर करता रहता है. ज्यादातर ग्रामीण आबादी नदियों के किनारे बसे होते हैं जिससे उन्हें शराब की भट्ठियां स्थापित करने में ज्यादा खर्च भी नहीं उठाना पड़ता. 
आर्थिक जानकारों का मानना है कि जहां कच्ची शराब का धंधा चल रहा होता है वे इलाके आर्थिक रूप से पिछड़े होते हैं. पुलिस और सरकारों की माने तो कच्ची शराब के चलते अपराधों में भी अप्रत्याशित रूप से वृद्धि होती है. 
लेकिन गाँव-देहात वासियों का कहना इस मंहगाई में वे ब्रांडेड शराब नहीं खरीद सकते, और शराब के बिना - शादी, मुंडन, लगन आदि काम अधूरे माने जाते हैं. यहाँ तक कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की मांग है कि सरकार को महीने में कम से कम एक बार सस्ते अनाज की तरह एक इंग्लिश शराब की बोतल भी देनी चाहिए. 

कच्ची शराब पर आये दिन अखबार अपने - अपने आंकड़े छापते रहते हैं-
  • यूपी में सामान्य दिनों में इसकी खपत करीब दो लाख लीटर रोजाना, होली में चार लाख लीटर तक पहुंच जाती है 
  • कच्ची शराब की बिक्री बढ़ने का एक बड़ा कारण अंग्रेजी और सरकारी ठेके की शराब से इसका दाम कम होना है 
  • विधानसभा में हाल ही में सरकार ने भी माना था कि जहरीली शराब पीने से पिछले साल 87 लोगों की मौत हुई थी
  • उत्तर प्रदेश राज्य के अपर पुलिस महानिदेशक(कानून-व्यवस्था) बृजलाल  ने कहा कि अधिकारियों से कहा गया है कि अगर जिले में कच्ची शराब का सेवन करने से एक भी मौत होती है तो उसके लिए थाना प्रभारी से लेकर पुलिस अधीक्षक तक की जवाबदेही होगी।

इतना तो तय है कि शराब चाहे कच्ची हो या पक्की इसके नुक्सान तो हैं और वो भी जानलेवा. 

बिन बुलाये मेहमान पधारे, घर में ना था पानी

बिन बुलाये मेहमान पधारे, घर में ना था पानी 
बीबी रूठ गयी फिर मुझसे, बोली कड़वी बानी. 
ओ गंवार! ये गाँव नहीं है कुछ तो ख्याल किया होता
मेहमानों से पहले मूरख, पानी मंगा लिया होता
तभी दोस्तों! आधी रात एक बिसलरी लाया...
१२ बजे रात के बाद तब फिर खाना है खाया... 
इसीलिये आ रही नीद अब ऑफिस में झपकी आती
दिल्ली में मेहमान नवाजी 'शिशु' को सच में ना भाती. 

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