Thursday, May 19, 2011

बिन बुलाये मेहमान पधारे, घर में ना था पानी

बिन बुलाये मेहमान पधारे, घर में ना था पानी 
बीबी रूठ गयी फिर मुझसे, बोली कड़वी बानी. 
ओ गंवार! ये गाँव नहीं है कुछ तो ख्याल किया होता
मेहमानों से पहले मूरख, पानी मंगा लिया होता
तभी दोस्तों! आधी रात एक बिसलरी लाया...
१२ बजे रात के बाद तब फिर खाना है खाया... 
इसीलिये आ रही नीद अब ऑफिस में झपकी आती
दिल्ली में मेहमान नवाजी 'शिशु' को सच में ना भाती. 

1 comment:

DR. ANWER JAMAL said...

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?

Nice post.

कहानी पूरी फिल्मी है।

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