रैली नहीं रैला है,
बैग जो हांथ में है
बैग नहीं थैला है
घर वाली है घर में बैठी,
दिल्ली जो साथ आयी वो मेरी लैला है...
'शिशु' इन रैली से
संसद रोड मैला है
यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...
No comments:
Post a Comment