Wednesday, March 21, 2018

...सिंहासन तुमसे हाले थे।

अजर रहो तुम अमर रहो!
पर ध्यान पुरानी बात रहे।
भूले से भूल न हो कोई,
मुश्किल चाहें हालात रहें।।
तुम ख़ास बहुत पर आम बने,
दिल्ली के बिगड़े काम बने!
रावण का अब जामा पहना,
तुम इतने क्यों बदनाम बने?
तुम पोल खोलने वाले थे,
सब लोग तुम्हारे खाले* थे।
तुम इतने थे निर्भीक कभी,
सिंहासन तुमसे हाले थे।
अब भूल चूक लेनी देनी,
माफ़ी में दिन हो बिता रहे।
कबसे अपनों को हार गए,
ख़ुद को ही ख़ुद से जिता रहे।
*नीचे

Monday, March 19, 2018

प्रेम की भाषा।

बहुत पहले की बात है। हमारे गाँव की रेलवे स्टेशन के पास बने सरकारी क्वार्टर में शोहरिया गांव से आए एक व्यक्ति रहते थे। शरीर से हट्टे-कट्टे, बहुत ही अच्छा डीलडौल (पर्सनलिटी), मधुर स्वभाव, बहुत ही हँसमुख और मिलनसार इतने कि कोई भी उनसे बात करने को उत्सुक रहता था। नाम याद नहीं, लेकिन लोग उन्हें ठाकुर कहकर बुलाते थे, ठाकुर इसलिये वो जाति से (क्षत्रिय) थे। पता नहीं, कहीं से वो एक मेहरुआ (औरत) ले आये। जिसे प्यार से वो राधा कहते थे। राधा को हिंदी नहीं आती थी, और ठाकुर को उनकी मेहरुआ की भाषा। लेकिन दोनों में गहरा प्यार था। राधा ठाकुर के लिये रोटी बनाती और मेहनत मजदूरी में उनका हाथ बटाती। स्वभाव से सीधी हिंदी (प्रमुखता: गांव की भाषा) न बोल पाने के कारण बदमाश निवासी उसको पागल समझते थे। ठाकुर का कोई विशेष कार्य नहीं था। कहीं भी मजदूरी कर लेते। लोगों से कहते सुना गया था कि उनके पास काफी संपदा थी, जिसके उनके परिवार के चालबाज लोगों द्वारा हड़प लिया गया था।

ख़ैर होते करते-होते करते (कुछ दिनों के बाद) दोनों के यहाँ एक बालक ने जन्म लिया। बालक देखने में काफ़ी स्वस्थ और सुंदर दिखता था। लोगों को ताज़्जुब होता कि इनके यहां इतना सुंदर बच्चा कैसे पैदा हो सकता है। ठाकुर बच्चे को कंधे पर बिठाकर गांव में घुमाते। ठाकुर का अब राधा से प्यार धीरे-धीरे खत्म हो रहा था। गांव में उस समय तक जन्मदिन मनाने का चलन आ चुका था, इसलिए एक दिन गांव में लोगों ने मजाक-मजाक में उनसे पूछ लिया "इसका जन्मदिन कब मनाओगे". ठाकुर बोलते हम इसका जन्मदिन भादौं में मनाएंगे। लोग पूछते पैदा कब हुआ था, वो मासूमियत से जवाब देते पैदा कभी भी हुआ हो लेकिन इससे क्या फ़र्क पड़ता है।

एक दिन राधा उन दोनों को छोड़कर कहीं चली गयी। ठाकुर बहुत रोये। बच्चा भी रोने लगा, वो बेचारा इसलिए रो रहा था कि ठाकुर रो रहे थे। उसके लिए पैदा होने के बाद से ही वही माँ थे और वही बाप भी। राधा के बिना अब ठाकुर का गांव में मन नहीं लगता था। वो सड़क पर चलते चलते कुछ भी बड़बड़ाते, जैसा कि राधा के समय करते थे। लोग कहते कि ठाकुर पागल हो गए हैं। उस दिन के बाद से लेकर आजतक मैंने ठाकुर को नहीं देखा। सोचता हूँ कि बच्चा कैसा होगा? राधा कहाँ गई होगी और क्या ठाकुर अभी भी बच्चे के साथ होंगें। मेरी दुआ है वो सब जहां भी हों सलामत रहें।

दो भाई।

दो भाई

किसी गाँव में दो भाई रहते थे। गाँव में उनको कोई असली नाम से नहीं जनता था। ज़्यादातर लोग बड़े भाई को बड़े बाबा और छोटे भाई को छोटे बाबा कहते थे। बाबा इसलिए कि, उन दोनों भाइयों की उम्र गांव में बाबा की उम्र जैसे दिखने वाले बुजुर्ग व्यक्तियों से भी ज़्यादा थी। अधेड़ से अधेड़ और बुजुर्ग उम्र का व्यक्ति भी उनको बाबा कहता था।

दोनों भाई एक बहुत बड़े लेकिन कच्चे मकान में एक ही साथ रहते थे। वे कभी अलग-अलग खाना बनाते और कभी एक साथ। बड़े भाई छोटे भाई की तुलना में काफ़ी सीधे, सरल और मृदुभाषी थे। ऐसा कहा जाता था कि दोनों भाई अविवाहित थे। हालांकि उन्हें जवान अवस्था में कम ही लोगों ने देखा था इसलिए लोग अंदाजा लगाकर कहते थे कि बड़े भाई छोटे से काफी ज्यादा खूबसूरत रहे होंगे। अगर गोरा रंग सुंदरता का पर्याय है तो यकीन मानिए इस पैमाने के अनुसार दोनों भाई खूबसूरत ही रहे होंगे, दोनों भाइयों की उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था। दोनों के बाल सनई की तरह बिल्कुल सफ़ेद थे, इसलिए उन दोनों की उम्र के बीच में फासला करना मुश्किल था।

उनके पास आजीविका के लिए काफ़ी खेती थी। इसके अलावा बाग़ और तालाब भी थे। उनको ये सब विरासत में मिला था। हालाँकि गांव के किसी निवासी ने उनको खेती करते नहीं देखा था। वो अपनी खेती बटाई करवाते थे, जिससे उनको इतना अनाज मिलता था कि खाने के अलावा रोजमर्रा के ख़र्च का भी जुगाड़ हो जाता था।

उन दोनों भाइयों के पहनावे में कोई ख़ास अंतर नहीं था। छोटे भाई धोती और आधी बाँह का कुर्ता पहनते थे और बड़े भाई भी धोती के ऊपर आधी बांह का कुर्ता पहनते थे। दोनों की लंबाई में इतना बड़ा फर्क था कि छोटे भाई बड़े भाई के कंधे तक पहुंचते थे।, लेकिन व्यवहार और भाषा से छोटे भाई बड़े से दो हाँथ ऊपर थे। उनके मुँह खोलते ही गाली निकलती थी।

छोटे भाई बटाई खेत करने वालों को नाम से नहीं बल्कि जातिगत उपनाम से बुलाते थे। उन्हें देखते ही लोग खेतों में अंधाधुंध काम करने लगते और उनसे भय खाते और वापस जाते ही बटिहिया उनका मजाक उड़ाते। जबकि बड़े भाई मदुभाषी और लोगों को नाम से बुलाते थे तथा अनाज के बंटवारे के समय अपने हिस्से के अनाज से भी कुछ हिस्सा बटाई करने वालों को दे देते थे। दोनों भाइयों का अभी तक बंटवारा नहीं हुआ था।

दोनों बुजुर्गों का एक दूसरे के अलावा और कोई न था। बड़े भाई का ज्यादातर समय घर पर ही बीतता जबकि छोटे भाई लाठी टिकाकर गांव में बटाईदारों के घरों का चक्कर लगाकर अपने समय को काटते। उन दोनों भाइयों को किसी ने न कभी हंसते और न ही कभी रोते देखा।

उनके कुटुंब के बुजुर्ग पड़ोसी उनके घर खेत पर कब्जा करने का दिवासपन्न देखते। ताकि उनके खेत बाग़ अपने खेत बाग़ कह सकें, लेकिन वे बुजुर्ग पड़ोसी एक एक कर उम्र अधिक होने के कारण मर रहे थे। उन्हें बचपन से बुजुर्ग देखने वाले लोग भी सफ़ेदी की दहलीज पर कदम रख चुके थे।

दोनों भाई अब इस दुनियां में नहीं हैं, और यकीन से कहा जा सकता है कि नई पौध में से उन्हें कोई भी नहीं जनता। वो आज हमारी कहानी के माध्यम से फिर से जिंदा हो गए हैं।

डिस्क्लेमर: यह कहानी काल्पनिक है इसका किसी जिंदा और मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं।

Thursday, March 8, 2018

कपोलें

पतझड़ बीत गया है लेकिन, बड़ी उदासी छायी है।
कोयल ने भी राग न छेड़ा,  ख़ामोशी घिर आई है।

लगते हैं वीराने जंगल,  नदी बिना  जल  धारा है।
चरागाह सूने  दिखते हैं,  लगता  गया  उजाड़ा है।

दूर-दूर तक पथिक न कोई, कहीं दिखाई देता अब।
पुरवा-पछुवा सब बेज़ान,  ख़बर न कोई लेता अब।

बहुत हो गया इंतज़ार अब,  ढलने  वाली  बेला है।
जैसे प्रियसी का जीवन,  प्रिय के बिना अकेला है।

उसी रूप में आ जाओ अब कवि ने तुम्हें पुकारा है।
नीरसता को त्याग के देखो, जीवन कितना प्यारा है।

#बसंत #शिशु

Sunday, February 25, 2018

अलविदा देवदूत

बसंत ऋतु का आगमन हो चुका था। इस बार होली फरवरी के आख़िरी सप्ताह में आकर चली गयी थी। पता नहीं क्यों लेकिन लोगों में इस बार होली का कोई ख़ास उत्साह था। हालांकि जंगल टेसू के फूलों से लदे थे और चरवाहे ख़ुश थे कि, इस बार बौंर काफ़ी आया है। जामुन के पेड़ों में नई कपोलें आ चुकी थीं और महुए के पेड़ों से फूल गिरने का इंतज़ार हो रहा था। किसान फ़सल को लेकर काफ़ी उत्साहित थे। वे गेहूं के खेत से कूंड़ में बोई गई सरसों निकाल रहे थे। 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षा अपने चरम पर थी। इस समय गांव में चहल पहल का माहौल था। भले ही भारत के अधिकतर गांव दरिद्रता में रहे हों, बावजूद उसके गांवों में खुशियां शहरों की अपेक्षा हमेशा अधिक ही रही हैं। ऐसा ही एक गांव कुरसठ है। जहाँ से होकर ट्रेन गुज़रती जो अपने आप में एक गौरव है। कुरसठ गाँव का इस लोकतांत्रिक देश में कोई छोटा महत्व नहीं है। भले ही यहाँ कोई बड़ा अधिकारी और कोई बड़ा नेता न पैदा हुआ हो, लेकिन इसकी अपनी स्वयं की कहानी है। इसे न तो किसी ने उजाड़ा और न ही किसी ने बसाया। इस गांव की कहानी परियों की कहानी के समान है। यहाँ कई ऐसे लोग हुए जिन्होंने भूतों से दो दो हाथ किये और उसके साथ बैठकर चिलम पी। कहानी अब शुरू होती है।

तो जैसा कि नियमित था, रोज की तरह उस दिन भी ट्रेन को सीतापुर से बालामऊ होते कुरसठ के रास्ते कानपुर जाना था। ड्राइवर ने अपने सिर पर कपड़ा बांध रखा था और इंजन पर सवार होने से पहले उन्होंने हमेशा की तरह उसे सलाम किया। गार्ड साहब ने काला कोट पहन रखा था, तथा हरी और लाल झंडी को सहेज रहे थे। उनकी सीटी उनके गले की शोभा बढ़ा रही थी, जो उन दिनों गौरव की बात हुआ करती थी। इन दोनों की इस रूट पर यह आखिरी ड्यूटी थी। वे इस पूरे इलाके से ऐसे परिचित हो गए थे जैसे जिस भी गांव से ट्रेन गुजरती हो उसके निवासी हों। लोग भी उन्हें अपने बीच का मानते थे। उन दोनों को पता होता था कि किस व्यक्ति को जरूरी कार्य से जाना है और उसकी ट्रेन छूटने से उसे कितना कष्ट होगा, वे फौरन ब्रेक लागते और ट्रेन छूटे व्यक्ति को बिठाकर चल देते। इंजन एक बड़ी सीटी ...कु कू... कू लगता और ट्रेन फिर अपने रफ़्तार से चल पड़ती। धध्धे पैसा चल कलकत्ता... धध्धे पैसा चल कलकत्ता...बाबू जी की धेका..दो (ये कुछ दोहे थे जो बच्चे ट्रेन के गुज़रते ही सुर और लय ताल में ज़ोर लगाकर गाया करते थे)।

ट्रेन में बैठने वालों का ट्रेन के हर हिस्से से, इंजन ड्राइवर और यहां तक कि डिब्बे में लगी उस सीट से आत्मीय लगाव था। सफ़र करने वाले व्यक्ति डिब्बे की हर गतिविधि से परिचित होते थे। इतना प्रगाढ़ संबंध जैसे कि यह ट्रेन ही उनके लिए मोक्ष का एक मात्र साधन हो। और बात भी सही थी, उन दिनों क्या गरीब क्या अमीर सबके लिए एक यही तो एक मात्र साधन था।

उन दिनों ट्रेन अमीरी और ग़रीबी के भेद को नहीं समझती थी, उसे हर व्यक्ति से बराबर का लगाव था। उसके लिए तो हर व्यक्ति उसके लिए मेहमान था जिसे सुरक्षित उसके गंतव्य पर पहुंचाना उसका कर्तव्य था। इसमें बैठने के बाद कोई जातिगत भेदभाव नहीं। कोई चमार पासी नहीं कोई पंडित ठाकुर नहीं। हां कई बार लिहाज़ के हिसाब से पिछड़ी जाति के लोग अवस्थी, मिश्रा, और पंडितों को सीट दे देते थे। महिलाओं के लिए सम्मान के तौर पर लोग सीट सुपुर्द कर देते थे फिर चाहे महिला किसी के घर परिवार की हो, पर्दा प्रथा का यही एकमात्र अपना फायदा था।

भाप के इंजन की धक-धक गांव से विदा हो रही लड़कियों की धक धक को बढ़ा देता था। और सीटी की आवाज़ से शहर कमाने जा रहे व्यक्ति को आगाज़ करता यदि हो सके तो अभी भी समय है रुकना है तो कुछ दिन और रुको और यदि संभव हो तो यहीं कमाओ खाओ। बाहर पढ़ने वालों के लिए यह सीटी उनके कर्तव्य का बोध कराती थी कि मां बाप की गाढ़ी कमाई को पढ़ाई में ही खर्च करना, जरा सा ध्यान चूका तो समझो दुर्घटना हुई। उनदिनों इंजन की सीटी लोगों के लिए समय बताने वाला सूचक था। लोग घड़ी से अधिक इंजन पर भरोसा करते थे। यदि ट्रेन देर से आती तो लोग किसी अनहोनी का अंदाजा लगाते थे और उसकी सलामती की दुआ करते।

आज भाप का इंजन ख़ामोश था। ड्राइवर में वह जोश नहीं था, वह इंजन में हल्की सीटी लगाकर उसे याद दिलाता, देखिये, यही कुरसठ है जिसने हमें कितने ही बार दूध मठ्ठा और गन्ने का रस दिया। तुमको उतना ही सम्मान दिया जितना अपने पूर्वजों और देवताओं को देते हैं और तुम्हारी हर तीज़ और त्यौहार वैसी ही पूजा की जैसे कि बरम्बाबा की करते हैं, तुम्हारे साथ होली खेली। हां तुम भी तो उनके दुख और सुख में शरीक हुए। देख लो आज फिर कल से हमारा और तुम्हारा नाम गुमनामी में कहीं खो जाएगा। हम रेलवे के किसी रजिस्टर में तो दर्ज होगें लेकिन हमें कोई याद करने वाला नहीं होगा। इंजन ने एक धीमी सी पतली सीटी बजाई जैसे कि उसे इतना कष्ट हुआ हो जैसे विदाई के समय लड़की बाप से विदा होते हुए नहीं रोती लेकिन हलक से एक हल्की सी हिचकी देकर चुप हो जाती। उसे पता है कि उसके रोने से उसके पिता पर क्या बीतेगी? लेकिन आज इंजन को क्या पता कि उसकी विदाई का इस गांव में किसी को कुछ नहीं पता। यहाँ तो सभी अनजान थे, उन्हें पता होता तो वो इसके लिए घरों से निकलकर उसको निहारते और जैसे दुल्हन की विदाई के समय लोग तब तक देखते रहते जब तक कि वह आंखों से ओझल न हो जाये।

भाप के इंजन की विदाई की जानकारी केवल कुछ ही व्यक्तियों को थी। लोगों की नज़र में वह दिन वैसे ही आया जैसे कि अन्य दिनों में होता, सवारी करने वाले अनजान थे। लेकिन भाप का इंजन आज जुदा हो रहा था। उसे तो हमारी कहानी में आना था। भाप के इंजन आपको अवगत हो कि आप हमारे दिलों में आज भी जिंदा है, आपकी सांवली सलोनी सूरत वैसे ही मेरे दिल दिमाग में है जैसे कि हमारा गांव। देवदूत! हमारी अलविदा अब स्वीकार करें।

Saturday, February 17, 2018

कहानी पूरी फिल्मी है।


क़रीब कोई बीस साल पहले की बात है। एक देश में एक परिवार पापड़ बनाकर बेचता था। उनके दिन बहुत गरीबी में बीत रहे थे। फ़िर उन्हें उनके पड़ोसी ने बताया कि, आप बैंक से लोन ले लीजिए। बैंक गरीबों को रोजगार के लिए लोन देता है, जिसे धीरे धीरे करके चुकाया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने एक बैंक से लोन लिया। इसके बावजूद भी उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ बल्कि और भी कमज़ोर होती गयी।

उनकी इस स्थित का कारण दो लोग थे-एक वो बैंक जो लोन वापस लेने के लिए उन पर अत्याचार कर रहा था (जबकि उस समय अन्य कम्पनी वाले लोग लोन वापस नहीं कर रहे थे) और दूसरा उस देश का कंपनी क़ानून जो छोटे-छोटे उद्योंगों को पनपने नहीं दे रहा था। कुछ वर्षों बाद वह परिवार घोर ग़रीबी से तंग आकर विदेश में जाकर बस गया। उनका एक होनहार पुत्र, जिसने चाणक्य की तरह क़सम खाई कि, वह उस देश से और वहाँ के बैंकों से अपने परिवार का बदला लेकर रहेगा।

इसी दौरान उस देश में एक नेता का उदय हुआ, जिनने देश की ग़रीब जनता को सपना दिखाया कि वह कारोबार को आसान बना देगें (हालांकि उद्योग का गरीबों से कोई ताल्लुक़ नहीं था) फिर भी लोगों ने ख़ूब तालियां बजाई। जीतने के बाद उन्होंने एलान किया कि, अब कोई भी व्यापारी (यहां व्यापारी का मतलब बड़े उद्योगपति से था) बिना किसी गारंटी के कितना भी लोन ले सकता है, लेकिन इसके लिए शर्त ये थी वह अपने व्यापार में लिखेगा कि यह वस्तु उसी देश में तैयार की गई है (हालांकि वह वस्तु उसके पड़ोसी दुश्मन देश से बनकर आती और आते ही उस पर रबर लग जाती कि, यह वस्तु यहीं बनी है) जरूर लिखेगा। विपक्ष ने आरोपों में कहा कि, उनने देश की सत्ता को कंपनियों की गोदी में रख दिया है और सच्चाई थी भी कि अब उस देश में हर चीज़ बाज़ार थी। और इधर उस देश की गोदी मीडिया उनके गुणगान में व्यस्त थी।

इसके बाद वही हुआ, जैसा कि, उन व्यापारी व्यक्ति ने प्रण लिया था कि, वह उस देश और वहां की बैंकिंग को बर्बाद कर देगें, तो, उनने एक नामी गिरामी बैंक को चूना लगाकर उस देश से रफ़ूचक्कर हो गये। यह सब तब हुआ जबकि उस देश के ख्याति प्राप्त नेता ने चुनाव से पहले कहा था कि कोई भी भ्रष्टाचारी हो उसे सख्त से सख्त सजा मिलेगी (हालांकि, महान नेता ने यह कभी नहीं कहा था की, भ्रष्टाचारी को भागने नहीं दिया जाएगा)।

जहाँ आजकल, उस देश के बैंक भागे हुए व्यक्ति के बचे-खुचे समान की नीलामी में व्यस्त है, वहीं ख्याति प्राप्त महान नेता लोगों को रोज़गार के लिए खाने पीने की वस्तुवें बेंचने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।

डिस्क्लेमर: इस कहानी का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है।
#शिशु

Thursday, February 8, 2018

रंग बहुत ही चोखा है, लेकिन खाया धोखा है।

रंग बहुत ही चोखा है, लेकिन खाया धोखा है। तुम भी कर सकते हो प्यार, तुमको किसने रोका है! जिसको आंधी समझा तूने, वो एक हवा का झोंका है। ये जो पेड़ लिपिस्टिक के, इसने पानी सोका है। जिसको समझा है दुकान, वो लकड़ी का खोखा है। जिसने चाहा है तब लूटा, मिला जिसे जब मौका है।

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आंदोलन

यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...