Thursday, August 30, 2018

कबहूँ बैंक के बाबू देते दिलासा।

नरोत्तम दास की प्रसिद्ध कविता 'सुदामा चरित्र' की लयताल पर आधारित है-
सीस पगा न झगा तन में,
प्रभु जाने को आहि बसे केहि ग्रामा।

लाइन लगी कि लगी न लगी,
कि, नोट बदलने की है नहि आशा।
लोग लगे वो लगे कहने-
चहुँओर है छायी घोर निराशा।
नोटबंद से ग़रीब-किसान का'
घाटा हुआ है अच्छा-ख़ासा।
पुलिश बजाती थी लठ्ठ कि,
कबहूँ बैंक के बाबू देते दिलासा।
'मन की बात' रेडियो से कहकर,
'चौकीदार' ने सबको फाँसा।
मीठे-मीठे बोल बोल अब,
वित्त मंत्री जी देते हैं झांसा।
भक्त मंडली श्राप देति 'शिशु'
जैसे देते थे ऋषि दुरवासा।
काला धन है आया नहीं,
कुल बीत गए कितने चौमासा।

Friday, August 24, 2018

इस हद तक गिर सकते लोग ऐसा सोचा नहीं कभी था।

इस हद तक गिर सकते लोग,
ऐसा सोचा नहीं कभी था!

देशप्रेम की भाषा गढ़कर,
आ जाते हैं घर पर चढ़कर,
सब झूठी खबरों को पढ़कर।
मार-पिटाई काम से बढ़कर,
ऐसा पहले नहीं कभी था...
हमने सोचा नहीं कभी था।

गाय हमारी माता कहकर,
भावनाओं में आते बहकर,
भीड़भाड़ में रह-रह रहकर,
मारो, मारो, मारो कहकर,
ऐसा देखा नहीं कभी था।
सोचा ऐसा नहीं कभी था।

इस हद तक गिर सकते लोग
ऐसा सोचा नहीं कभी था।

पूछते सवाल हैं।।

बाढ़ में,
सुखाढ़ में
मदद की दरकार थी,
तब सो रही सरकार थी,
लोग जो बेहाल हैं।
पूछते सवाल हैं।।

Tuesday, August 14, 2018

हौसला-अफजाई में पड़ा रहता है जाने क्यों?

न ही आता उसे कुछ भी, न ही कुछ काम करता है।
देखता हूँ उसे जब भी पड़ा आराम करता है।।

हकीकत को 'शिशु' समझें, मजे में हैं सभी चमचे!
पकाता है जो खाने को उसे बदनाम करता है।।

हौसला-अफजाई में पड़ा रहता है जाने क्यों?
गप्पबाजों के संग बैठा सुब्ह से शाम करता है।

तसल्ली दे रहा तुमको, तुम्हारा भी भला होगा!
कहीं मंदिर, कहीं मस्जिद फ़क़त ये काम करता है।

Monday, July 9, 2018

ख्वाबों पर बंदिश लगा जीना हराम करते हैं

ख्वाबों पर बंदिश लगा जीना हराम करते हैं,
अब ऐसे शख़्स को ही लोग सलाम करते हैं।

जो देते हैं फ़िरक़ा परस्ती को अंजाम 'शिशु',
ऐसे लोगों को हम दूर से ही राम राम करते हैं।

उनको ही वेतन कम मिलता है कार्यालय में,
जो व्यक्ति वास्तव में अधिक काम करते हैं।

जिन माँ-बाप ने मेहनत से पढ़ाया है बच्चों को,
उनके बच्चे ही असल में उनका नाम करते हैं।

मँहगाई है बोलकर सत्ता में आये थे जो कभी,
अब आये दिन चीजों के महंगे दाम करते हैं।।

चार सहेलियाँ

पहली सखी बोली सुनो जी सखियों तुम,
मेरे पति मुझको प्रणाम करते हैं!
दूसरी ने पहले से कहा बड़ी जोर से,
मेरे पति सारे घर का काम करते हैं!
तीसरी ने चौथी को फ़िर आँख से इशारा किया,
मुफ़्त में ये दोनों बदनाम करती हैं.
मैंने इनकी देख ली पिटाई एक दिन सखी,
अब तक दोनों राम-राम करती हैं...

Saturday, June 9, 2018

तन्हा इतना कि उदास गलियों में, मैं भटकता ही रहा।

तन्हा इतना कि उदास गलियों में, मैं भटकता ही रहा।
वो शख़्स बेरंग मौसम की तरह था, खटकता ही रहा।

मैं  बहुत  बेकरार था समा जाने  को  उनके  पहलू में,
और वो खुदगर्ज इतना, अपने बाजू झटकता ही रहा।

एक  अरसा  बीत  गया, उनका  नाम लेते लेते  मुझे,
देखिये! लबों पर आज भी वो नाम अटकता ही रहा।

उसकी आवाज़ केलिए ऐसे ही सफर नहीं किया था!
वो बोलता शहद जैसा था, जुबां से टपकता ही रहा।

हमने  गाँव  से ज़्यादा  शहर में  काटे  हैं  दिन  'शिशु'
कमबख्त शहर है कि मेरी आंखों में खटकता ही रहा।

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