Wednesday, July 10, 2019

ताज्जुब में सब विधायक, हैं मुकद्दर देखकर।


ताज्जुब में सब विधायक, हैं मुकद्दर देखकर।
स्वर्ग  में  गाँधी  परेशां, आज खद्दर देखकर।।

है कमाता, ग़म भी खाता, तब मजे में ज़िंदगी,
पाँव फैलाता 'शिशु' है, जो भी चद्दर देखकर।

बाग़  जैसे  ही  बिका,  हैरान  बिरवे  हो  गए,
शोक  में  डूबे  हैं  पक्षी  आम गद्दर  देखकर।

मौसमें बारिश है लेकिन, गर्मियों का जोर है।
छाँव में बैठा है खेतिहर  धूप भद्दर देखकर।।

भद्दर: बहुत तेज़
गद्दर: अधपका

#नज़र_नज़र_का_फ़ेर #शिशु

Saturday, July 6, 2019

शिक्षा का महत्व

एक बार मेरे बटाई खेत के पड़ोस में एक बरई ने बटाई खेत मकई के लिए लिया था। मकई क्या असल में उनको ककड़ी, तोरई, लोबिया आदि से मतलब था। इसके विपरीत मेरे पिताजी निराई के समय ही वह सब उखाड़ फेंकते, उनका तर्क था यह मकई को कमजोर कर देता है। ख़ैर, इधर का सावन आया उधर बरई के खेत में ककड़ी और खीरा ने जन्म लेना शुरू कर दिया। तब किसान और उसका परिवार घर से ज़्यादा खेत पर वक्त गुजारते थे। स्कूल से आने के बाद बस्ता लेकर हम भी खेत पर पहुँच जाते। दोपहर तक निराई करने के बाद भौंरिया डालने का कार्यक्रम चलता या कभी कभी माँ घर से सुबह ही भोजन बनाकर ले जातीं। उन दिनों खेतों के प्रति मोह रहता था। कभी भी जाओ कुछ न कुछ आपको खाने को मिल ही जायेगा। आम, इमली, कैथा, बेर, खीरा, ककड़ी, चना, मटर, होरा मसलन आप यदि खेत गए हैं तो कुछ न कुछ वहां से खाकर ही आयेंगें और नहीं तो चने का साग ही कहा लिया।

एक दिन दद्दा से सुना 'इस बरैना का दिमाग ख़राब है बताओ भला मकई में इतनी ककड़ी खीरा बो दिया है कि आप खेत के अंदर नहीं घुस सकते।" सुनकर कौतूहल जागा और खीझ के साथ मन ही मन मैंने कहा 'तुमने तो जो जमतुआ जो उगे थे उन्हें भी उखाड़ फेंका।" कम से कम उन्हें अपने बच्चों की फिक्र तो है।

एक दिन जब खेत पर कोई नहीं था पड़ोसी के खेत में जैसे ही घुसने वाला था वह आ गया और जो डांट पिलाई, नानी याद आ गई, मतलब मारते मारते ही छोड़ा। जब खेत की तरफ जाता पहले एक चक्कर उसके खेत के लगाता है कि नहीं यह देखने के लिए, लेकिन हमेशा निराशा हाथ लगती। बड़ा कर्रा रखवाला था। हमेशा खेत पर मिलता। मकई में अभी बुढ़िया के बाल भी नहीं आये कि उसने माचा भी बना लिया। हमारा तो खैर भुट्टे लगने शुरू हुए तब बना।

एक दिन मैं और मेरा भाई माचा पर बैठकर रखवाली कर रहे थे। सुआ कौआ उड़ा रहे थे। मैंने मन मजबूत करके कहा चच्चा एक ककड़ी देना। उसने साफ इंकार कर दिया बोला अपने बाप को बोलो उन्होंने क्यों नहीं बोया। मुझे कोई जवाब न सूझा। वापस आकर बैठ गया माचे पर। फिर मुझे रहीम दास का एक दोहा याद आया। मैंने वह दोहा जोर-जोर से बोलना शुरू कर दिया-
रहिमन वे नर मर गए जो कछु माँगन जाईं।
उनते पहिले वई मरे जिन मुख निकरति नाईं।

तब उसने मुझे और मेरे भाई को बुलाकर एक बड़ी ककड़ी दे दी। शिक्षा का महत्व समझ में आ गया था।

Thursday, June 27, 2019

फरेबी दुनिया मे पढ़कर गुज़र नहीं होगी

कुछ अशआर

फरेबी दुनिया मे पढ़कर गुज़र नहीं होगी
तू अपने बच्चों को ज़ाहिल बना गँवार बना

वो मेरे साथ  मे रहता , था दोस्तों  की तरह
बिछड़ के मुझसे वो ज़ालिम सितम-शआर बना

यहाँ किसी के लिए कोई कुछ नहीं करता
तू अपने आप ही अपना अलग दयार बना

बिछड़ के अपनों से कोई भी ख़ुश नहीं रहता
कोई भी बात हो , रिश्ते मे मत दरार बना

सफ़र सफ़र है, सफ़र मे बिछड़ना पड़ता है
किसी के वास्ते ख़ुद को न बेक़रार बना

सितम-शआर— हिंसक
दयार- साम्राज्य

सत्याधार 'सत्या'

Sunday, June 16, 2019

गद्दी

प्राइमरी में 5वीं के दौरान जब मैं बीमार हुआ, घर में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। एक तरफ़ मैं बीमार था दूसरी तरफ मेरी दुधारू भैंस। जानवरों को चराने के दौरान बारिश में भीगने से हम दोनों बीमार हुए थे। मैं इंसान था इसलिए घरवालों की नज़र मुझ पर जल्दी पड़ी। जब दो दिन हो गए जानवर ने चारा खाना बंद कर दिया तब पता चला कि वह भी बीमार है। और इसके बाद पिताजी की मानसिक हालात खराब हो गई, उन्हें इतना आघात लगा कि लोग बोलने लगे वे पागल हो गए हैं। पड़ोसी और ख़ानदान के लोगों को लगता था कि किसी ने कुछ खिला पिला दिया (ऐसी मान्यता थी, कि टटका-टोना करवाकर प्रसाद या खाने में कुछ खिला देना जिससे किसी को भी कुछ हो सकता है) होगा। घर में लोगों को दवाई से ज़्यादा झाड़फूंक पर विश्वास हो गया।

मेरी दवाई कौशल डॉक्टर के यहाँ से आने लगी। उनसे बेहतरीन इलाज करने वाला कोई और न था। कई बार मरीज आने भर से ठीक हो जाता था। बड़े नेकदिल, कम पैसे में इलाज करते हैं। लेकिन उन दिनों डॉक्टर कौशल के यहां कंपाउंडर बनने वालों की होड़ लगी थी, कोई अखबार फाड़कर पर्ची बनाता, कोई गंभीर हालत के मरीज को उठाता बैठाता, और कुछ एक लोग मरीज की काउंसलिंग करते। कहने का  तात्पर्य यह कि मरीज से ज्यादा अन्य लोगों का जमावड़ा लगा रहता था। सामने चौपाल थी जहाँ 8 से 10 लोग ताश की गड्डी फेंटते। गांव में कौन और किसे क्या बीमारी है सभी को पता चल जाती। पहले डॉक्टर सलाह देते, बाद में लोग। कुछ एक लोग सुई (इन्जेक्शन) लगाने का भी अभ्यास कर रहे होते, कोई नया और गरीब बीमार आता इससे पहले कि डॉक्टर साहब कहते कंपाउंडर सुई बनाकर ठोंक देता। ऐसी ही एक सुई लगाने से मेरे दाहिने हाथ में इंफेक्शन हो गया और बाँह फूल गई थी फिर ऑपरेशन करके मवाद को निकाल गया था। गाँव में जब हालात बदत्तर से बदत्तर हो गई मुझे हरदोई ले जाया गया, खैर इसकी अपनी एक अलग कहानी है..., कभी बाद में साझा करूँगा।

मेरे सभी रिश्तेदार मेरे माँ बाप पर गद्दी (ऐसा स्थान जहाँ कोई ओझा यह दावा करता कि व्यक्ति पर कोई साया है जिसे झाड़फूंक पर ठीक किया जा सकता है) पर जाने की सलाह देते। मैं बिस्तर पकड़ चुका था इसलिए गद्दी पर ले जाना मेरे घरवालों के लिए थोड़ा मुश्किल था। पता चला कि हथौरा गांव का एक व्यक्ति किसी भी गांव में जाकर गद्दी लगाता है। वह एक हट्टा-कट्टा, लंबा, जवान-बागड़ू, लंबे बाल, काला कुर्ता और कट वाली दाढ़ी रखता था, जिसे पहलवानी का भी शौक था। वह आंखों में सूरमा लगाता था। हथौरा में मेरे परिवार की एक लड़की का विवाह हुआ था इसलिए वह नई नवेली और जवान महिलाओं से जीजा कहलाना पसंद करता था। तब रामसरन चच्चा के खपरैल जहाँ पड़े थे, वहाँ पर उसने अपनी धूनी जमाई। वह मेरे लिए आया था, लेकिन मुझे दिखाया जाता इससे पहले ही वहां लोगों का जमावड़ा लग गया। कोई अपने परिवार के कलह के बारे में पूछ रहा था, किसी की दो ही साल पहले शादी हुई थी औलाद के लिए पूछ रहा था। लेकिन ज्यादातर लोग बीमारी हजारी के बारे में पूछ रहे थे, औरतों से बात करने में वह खिलखिलाकर जवाब देता। कंधे चौड़े कर देता और सीना बाहर निकाल देता। मुंह पर मुस्कराहट फैली रहती जबकि आदमी को वह डांट फटकार कर जवाब देता। जिसका नतीजा यह होता आदमी अपनी औरत से ही पूछने के लिए कहता था। जब सब चले गए मेरा नंबर आया तभी उसने कहा अब कल देखेगें। आज इतने समय तक की सवारी (किसी अच्छी आत्मा का उसके अंदर निवास) थी।

मैं 4 महीने से बिस्तर पर पड़ा था। हड्डियों का ढांचा ही बचा था। इसलिए बैठने में समर्थ न था। मुझे लिटा दिया गया। श्यामू भइया के छप्पर के नीचे खाट डाली गई। सिरहाने दवाइयों का भंडार, खाट के नीचे एक लोटा पानी, और एक लाठी, बिस्तर पर तकिए के नीचे हसिया रखी थी। लोग देखने आते और जो भी देखता वहीं एक दूसरे के कान में कानाफूसी करता कि यह बचेगा नहीं। जल्दी ही बेरिया घाट या मेहँदीघाट पर क्रियाक्रम होगा।

अगले दिन फिर गद्दी लगी। उससे पहले उसके लिए रात को खाना खिलाने वालों की होड़ लगी थी। कोई कहता हमारे घर खाना, कोई कहता हमारे घर। पूड़ी पकवान, बरा, कढ़ी-चावल, सबके सब उसे आमंत्रित करके गए, लेकिन उसे ये सब खाना रास न आ रहा था, तब हमारे परिवार में ज्यादातर लोगों ने गुरु कर रखा था इसलिए नॉनवेज का सवाल ही नहीं उठता था। ख़ैर गद्दी लगी, आज भी लोग अपने अपने प्रश्नों का गठ्ठर लेकर खड़े थे कुछ नए लोग भी आ गए। लेकिन मेरा नंबर पहला था, उसने जादू टोना चलाना शुरू किया, जब वह अपना सिर अजीब तरीके से घुमाता मुझे डर लगने लगता,, रूह कांप जाती। मेरी माँ मुझे पकड़े बैठी थीं, उसने मेरी माँ का हाथ जोर से झटक दिया और मुझसे कहा खबरदार जो हिला या गिरा, मैं डर गया डर की वजह से गिघ्घी बांध गई न रोने की आवाज आ रही न कुछ बोल पा रहा था। तब सर्वेश के बाबा चाक चालते थे उनका चाक घुमाने वाला डंडा वहीं पड़ा था, उसने झपटकर उसे उठाया, मैंने मन ही मन सोच लिया अब बचना मुश्किल है कहीं मारने न लग जाए, क्योंकि एक दिन पहले ही उसने एक जवान लड़की की मरम्मत कर दी थी चुड़ैल भगाने के चक्कर में। मेरे काटो तो खून नहीं, घबराहट में पसीना पसीना हो गया, वह खड़ा हुआ उसने चिल्लाकर कहा भाग जा इसके शरीर से नहीं तो इतने डंडे लगाऊंगा कि तुझे नानी याद आ जायेगी। मैं उठने की कोशिश करने लगा उसने मुझे डंडा पकड़ा दिया, और डर की वजह से मैं डंडा पकड़कर इधर उधर चलने लगा। 4 महीने में पहली बार मैं चला था भले ही डंडे के सहारे। हर कोई मुझे और उसे ताज्जुब से देख रहा था।

फिर मैं लड़खड़ाकर गिर गया, उसने कहा आज के लिए इतना ही। इसके बाद वह किसी अन्य गांव को चला गया, बाद में पता चला वह वहाँ से किसी औरत को लेकर रफूचक्कर हो गया था। तब से आजतक न उसके बारे में सुना और न ही जानने की इच्छा हुई। कल घर में मेरे ससुर जी खिलाने पिलाने पर ऐसा ही कुछ बता रहे थे, अपनी यादें ताजा हो गईं और इसे सोशल मीडिया पर साझा कर रहा हूँ।

Saturday, May 25, 2019

जीतने में तुम रहे असमर्थ कौरव! और भी हैं युक्तियाँ।

जीतने में तुम रहे असमर्थ कौरव!
और भी हैं युक्तियाँ।

धूर्तता, षड्यंत्र में तुम सब निपुण,
मूर्ख कैसे हैं बनाते, ये भी गुण।
दाँव भी चलने सभी आते तुम्हें,
धर्म की ओढ़ो दुशाला भक्ति की धुन-
अर्थ का भी खोजिए तब अर्थ कौरव!
भाषणों में जोड़िए कुछ सूक्तियाँ।

जीतने में तुम रहे असमर्थ कौरव!
और भी हैं युक्तियाँ।

उग्रपन भी है तुम्हारी चाल में,
जीतना तो चाहते हर हाल में।
धनुर्विद्या में निपुण सब योद्धा,
छेद लेकिन हैं तुम्हारी ढाल में।।
शस्त्र सारे हैं तुम्हारे व्यर्थ!
याद रखना ये हमारी पंक्तियाँ।

जीतने में तुम रहे असमर्थ कौरव!
और भी हैं युक्तियाँ।

Thursday, May 9, 2019

अनुत्तरित।

हर गाँव हमारा गाँव लगे!
हर शहर अजनवी जैसा क्यों?
ख़ुद आलोचनाएँ पूछें शहरी-
बतलाओ 'शिशु' है ऐसा क्यों?

क्यों गली मोहल्ले सूने हैं,
गाँवों से लोग पलायित क्यों?
खेतीबाड़ी का मोह त्याग,
शहरों के प्रति लालायित क्यों?

सब रिश्ते बदल रहे हैं क्यों,
क्यों दिल में करते लोग घाव?
अपनों में अपनापन विलुप्त,
घर में बढ़ता है क्यों दुराव?

क्यों परंपराएं बदल रहीं-
संस्कृतियों से है मोहभंग?
सभ्यता नहीं दिखती हममें,
क्यों लोग देखकर नहीं दंग?

क्यों प्रश्न बहुत ही ज़्यादा हैं,
क्यों उत्तर का है पता नहीं?
क्यों औरों में दिखतीं कमियाँ,
क्यों ख़ुद की दिखती ख़ता नहीं?

©शिशु #नज़र_नज़र_का_फ़ेर

Tuesday, May 7, 2019

बात उसकी मुहं जुबानी याद आती हैं।।

प्यार की पहली निशानी याद आती है,
आज भी वो छेड़खानी याद आती है।

मैं मना करता रहा, होठ गीले हो गए,
वो नशे की वो कहानी याद आती है।

बात पहले की बहुत पर होश ताज़ा है,
मछलियाँ सारी पुरानी याद आती हैं।

बात उसकी गाँठ में आजतक बांधे रहा,
बात उसकी मुहं जुबानी याद आती हैं।।

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आंदोलन

यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...