Monday, May 4, 2020

घंटा


आज एक पुरानी याद आ गई। हमारे समय प्राइमरी पाठशाला कुरसठ बुजुर्ग में पढ़ने वाले हर बच्चे की ये इच्छा होती थी कि स्कूल बंद होने की घंटी वे बजाएं। हर बच्चा समय से पहले तैयार रहता था, लेकिन समस्या ये थी कि तब घड़ी किसी-किसी अध्यापक के पास होती थी। आदरणीय मुरारीलाल दीक्षित जी हमारे प्रधानाचार्य थे। उनके हाथ में पीतल की एक घड़ी बंधी रहती थी। सफ़ेद ढीला कुर्ता पायजामा, ऐनक और वह पीतल की घड़ी उनके व्यक्तित्व की शोभा बढ़ाती थी। उनके अलावा उस स्कूल में कुल पाँच अन्य अद्यापक भी थे, श्री सोबरन लाल जी, श्री अहिबरन जी, श्री पांडेय जी, श्री राठौर जी (जलिहापुर वाले) और श्री मूलचंद जी।

हमारी क्लास चबूतरे के नीचे नीम के पेड़ के नीचे लगती थी और पाँचवी कक्षा के बच्चों को विद्यालय के पक्के कमरे में बिठाया जाता था। वह घण्टी भी इसी कक्षा की शोभा बढाती थी। इसलिए उसे बजाने के ज़्यादा मौके पाँचवी कक्षा के बच्चों को ही मिलता था। लेकिन सर्दी के दिनों में उनकी क्लास भी चबूतरे पर लगती तब अन्य क्लास के बच्चों को भी मौका मिल जाता। 

हमारी कक्षा के बच्चों ने घड़ी से मिलान करके दीवाल की परछाईं को एक निशान से सेट कर लिया था फिर क्या जैसे ही परछाई वहां आती उससे पहले ही बच्चे वहां जमा हो जाते और छीनाझपटी करके घंटी बजा देते। एक दिन घंटा समय से पहले ही बज गया। जैसे ही घंटी बजी सभी बच्चे धमाचौकड़ी मचाते हुए भाग खड़े हुए। बाद में पता चला कि दिन छोटे बड़े के चक्कर में परछाई ने अपना समय बदल दिया था...

आज हमारे मुहल्ले के एक शरारती लड़के ने भी यही कारस्तानी कर दी और साढ़े चार बजे ही थाली पीट दी, फिर क्या सभी लोग उसके सुर में सुन मिलाने लगे, किसी ने भी घड़ी देखने की जहमत न उठाई जबकि अब सबके घर में घड़ी, मोबाइल है तब।

अभी अभी ख़बर पढ़ी है कि, कई जगह कुछ देशभक्तों ने घण्टा बजाने की प्रशंसा में रैली निकाली है, सब गुड़ गोबर कर दिया। क्या कहें, हिंदुस्तान का आदमी घंटा नहीं सुधारने वाला मोदी जी कितनी ही घंटी बजवा लें!

#कोरोना #को_रोना
...जैसा कि, मैं पहले लिख चुका, जब मैं दिल्ली कमाने आया तो चिल्ला गाँव मेरा पहला ठिकाना बना। इस गाँव का कीचड़ देखकर ऐसा लगता था जैसे कि बांसा गांव, जिला हरदोई में आ गया हूँ। क्योंकि कीचड़ के मामले में बांसा पहले और कुरसठ दूसरे नाम पर था। हालांकि कुरसठ आज साफ़ सफाई और सड़क के मामले में अव्वल है, लेकिन बांसा में अभी और भी सुधार की गुंजाइश है...तो चिल्ला गाँव की गंदगी देखकर मन होता था कि वापस मेरठ लौट जाऊँ...

मेरा ऑफिस समाचार अपार्टमेंट के पास शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में फर्स्ट फ्लोर पर था। घर से ऑफिस जाते समय मैं हमेशा पार्क वाली राह लेता था, जहाँ उस रिहाइशी कॉलोनी में रहने वाले पत्रकार, अभिनेता आदि पसीना बहाते नज़र आते। हाफ पैंट और टी-शर्ट में पालतू कुत्ते के साथ दौड़ लगाते लोगों को देखता तो बड़ा कौतूहल होता। तब फिजिकल फिटनेस के बारे में इतना ज्ञान न था। कभी कभी जवान लडकियां बिना दुपट्टे के जब दौड़ लगाती दिखतीं तो शर्म के मारे बुरा हाल हो जाता लेकिन अगले दिन उन्हें देखने की उत्सुकता जाग्रत हो जाती। हालांकि पैसे वाले लोग उस दूरी को तय करने के लिए रिक्शा करते थे बावजूद मैं शॉर्टकट लेकर आफिस जाता। समय का पाबंद होने की वजह से मैं आफिस वाली जगह पहले ही पहुँच जाता और वहाँ आसपास की दुकान पर काम करते हुए लड़कों, एटीएम में ड्यूटी करते हुए गार्ड आदि को देखता, यकीन मानिए उनके कार्य में बड़ी ईमानदारी दिखती। किराने की दुकान में काम करने वाले गाँव से आए हुए लड़के जीतोड़ मेहनत करते। कोई झाड़ू लगाता, कोई सामान की सफाई करता, काम की लगन या कहें कि मालिक का डर वे हमेशा काम में तल्लीन दिखते। एटीएम के गार्ड मुस्तैदी से दरवाजे पर खड़े रहते, जैसे ही कोई पैसे निकालने आता वे उसे सलूट मारते और चेहरे पर मुस्कराहट की चाशनी बिखेर देते। एटीएम मशीन में घुसने वाला उसे इग्नोर करता हुआ अंदर जाता और ढेर सारे नए नए नोट से साथ बाहर आता। तब एटीएम में नए नोट ही लगाए जाते थे। मेरे पास एटीएम न होने का मलाल दिखाई पड़ता। 

इतना सब देखने के बावजूद भी समय से पहले ही आफिस पहुंच जाता। काम से फुर्सत न मिलती। हिंदी टाइपिंग, आर्टिकल, धारावाहिक, फ़िल्म की स्क्रिप्ट, किताबें, लेटर, अखबार की कंपोज़िंग, विज्ञापनों की डिज़ाइन, कवर पेज़ की डिजाइन आदि का ढेर लगा रहता। अंग्रेजी में हाथ कमजोर होने के कारण भी अंग्रेजी में अखबार निकालने वाले गुप्ता जी मेरा खूब सर खाते। अख़बार में आर्टिकल छपवाने वाले लोग आते, कोई स्कैनिंग करवाता, कोई विदेश में अपने लड़के को मेल लिखवाता। आफिस में कभी कभी जवान लड़के लड़कियां आकर सर्फिंग करते और याहू चैट में चूमाचाटी वाले मैसेज भेजते। पूरे दिन काम रहता और सांस लेने की फुर्सत न मिलती। जब हमारे दादा-दादी की उम्र के बुजुर्ग को फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते सुनता दाँतों तले उंगली दबा लेता। ये इलाका काफी संपन्न और पढ़े लिखे लोगों का था। 

शाम को जब मैं आफिस से निकलता मार्किट में रहीस लड़के लड़कियां कोक, पेप्सी बर्गर आदि खा पी रहे होते। वे विदेश की तरह कमर में हाथ डाले या एक दूसरे का हाथ पकड़कर मार्किट के चबूतरे पर बैठे रहते। कभी कभी अंधेरे का फायदा उठाकर कुछ लोगों को चूमाचाटी करते हुए जब देखता बहुत अजीब लगता। दवा की दुकान में लोगों की भीड़भाड़ देखकर लगता जैसे यहाँ के लोग बहुत बीमार हैं...

कमरे पर जाने के लिए कभी कभी कीचड़ से बचने के लिए अलग अलग रास्ते चुनता लेकिन निराशा हाथ लगती। जैसे ही गांव में घुसता लगता दिल्ली में नहीं बल्कि गांव से भी बद्तर जगह पर रहने आ गया। चिल्ला छोड़े बरसों हो गए लेकिन वह गांव आज भी जेहन में बसा हुआ है।
उल्लुओं  ने  चमन  को  रौंद डाला  है।
चमन  चमगादड़ों  का  बोलबाला  है।।

दीप  हमनें  जलाए  रोशनी  ख़ातिर।
पटाखों से  हुआ  लेकिन  उजाला है।।

मेरी कश्ती भवँर में अब फंसेगी क्या?
नदी है नहीं! वहाँ  तो  एक  नाला है।।

दोष मुझमें  नज़र आने  लगे हैं अब।
बुराई  को स्वयं  में क्यों  खंगाला है?

#नज़र_नज़र_का_फ़ेर #शिशु

तामून, 1953-1960 के दौरान की एक दास्तान*


उस दिन गाँव में तामून (चूहों के मरने के बाद एक बीमारी, इसमें मनुष्य के गले में गाँठ बन जाती थी) से ग्रसित होकर बैजनाथ (बैजू बाबा) के परिवार में कुल पाँच मौत एक ही दिन में हुईं थीं। जिसमें उनके पिता श्री देवीदीन, चाचा लालचंद और बंसी के अलावा उनके बड़े भाई तथा एक बुजुर्ग महिला की मौत हुई थी। पूरा  गाँव सदमें में था। तब मातम और जश्न पूरा गांव मिलकर मनाता था। ये दास्तान तबकी है...

आज़ादी के बाद भारत में जश्न का माहौल था। खेतीबाड़ी अपने ढ़र्रे पर वापस आ रही थी। अंग्रेजी शासन के लगान से किसान उबरने लगे थे कि सन 1953 में आई इस त्रासदी से हज़ारों लोग मरने लगे। गांव के गांव उजड़ने लगे। हमारे गांव में भी लोगों ने अपनी अपनी झोपड़ी गांव से बाहर खेत या बाग़ में बनाई। गांव में सन्नाटा पसरा रहता था। तब पैसे वालों के घर भी कच्ची मिट्टी के होते थे। गाँव में लोग ताला कुलुप डालकर बाहर रहने लगे। वहीं किसान रहते और वहीं उनके जानवर।

कुम्हारों के आंवा (मिट्टी के बर्तन पकाने वाली भट्टी) और चाक गांव से बाहर पेड़ के नीचे स्थापित थे। लोगों में चूहों से इतना भय था कि उन्हें देखते ही बीमारी का भय हो जाता। यदि किसी के घर में कोई चूहा मृत अवस्था में मिल जाता वे भय से ग्रसित हो जाते। तब मरना और जीना नियति के हाथ में था जिसे लोग भाग्यशाली होने और श्रापित होने से परिभाषित करते थे। 

त्रासदी के करीब 10 साल बाद भी किसानों की हालत बहुत ही दयनीय रही, घोर दरिद्रता, ग़रीबी में लोगों के दिन बीते। इतना सब होने के बावजूद भी गाँव में कोई भूख से न मरा। बड़े काश्तकारों ने गरीब और बटाई खेत करने वालों की खूब मदद की। उनसे अनाज में हिस्सा न लिया। खूब अनाज दान किया गया। वैर भाव सब खत्म हो गए। इंसानियत और भाई चारे की ऐसी मिशाल आजतक न देखी गई...

*आज पिताजी से फोन पर हुई बातचीत पर आधारित।

संस्मरण: अच्छे लोग।



आज से क़रीब बीस साल पहले सन 2000 में ग्रेड्यूएशन के आखिरी साल परीक्षा देने से पहले ही मैं कमाने के उद्देश्य से मेरठ आ गया था। घर से किराए के लिए पैसे मिले थे। अनेकों महीनों अपने चचेरे भाई के घर रहा, उन बेचारों ने मुझे रहना और खाना दिया। फ़िर खुद्दारी के चलते उनका घर छोड़ दिया और निकल पड़ा अकेले चुनौतियों का सामना करने। टाइपिंग पहले ही सीख गया था, इसलिए टाइपिंग की जॉब खोजना शुरू किया लेकिन निराशा हाथ लगती। कोई कोई काम करवा लेता और पैसे न देता। सोतीगंज में एक चैम्बर में वकील का दफ़्तर था, वह बड़ा ही अय्याश था, चैम्बर बंद करके अनर्गल हरकतें करता और मैं उसके इंतजार में बाहर बैठा रहता। हालाँकि मैं वहां शाम के 6 बजे ही पहुंच जाता लेकिन वह डिक्टेशन देना 8 बजे के बाद शुरू करता जब उसकी असिस्टेंट चली जाती, इस तरह रात के 10 बज जाते। महीने का मेहनताना 300 रुपए था। सुबह पाँच बजे से ट्यूशन पढ़ता तब जाकर बड़ी मुश्किल से कमरे का 400 रुपए किराया और खाना खर्चा चल पाता। 

...फिर जिंदगी में आए राहुल भैया, राजीव और संजीव भैया! उन्होंने बहुत कुछ किया मेरे लिए, मेरा एडमिशन कंप्यूटर सेंटर में करवाया, तथा कम्प्यूटर की पढ़ाई के दौरान ही राजू भैया ने मुझे चौधरी सर्विसेस में काम पर लगवा दिया। यह एक कॉमर्शियल सेंटर था, जहाँ, फोटोकॉपी, एसटीडी आईएसडी, इलेक्ट्रॉनिक टायपिंग, कंप्यूटर पर डिजाइनिंग होती थी। दुकान काफी छोटी थी लेकिन दुकानदार का दिल बहुत बड़ा। चौधरी साहब उसके मालिक थे, वे यूको बैंक से रिटायरमेंट जनरल मैनेजर थे। उनके पूर्वज हमारे जिले से ही थे और मेरठ के खतौली जिले में आकर बस गए थे। उनका गांव मल्लावां के क़रीब नहर के किनारे वाला गांव था ऐसा उन्हें याद था। चैधरी सरनेम लगाते लेकिन वे हैं कुर्मी।

पहले दिन ही उन्हें मैं पसंद आ गया। मेरा काम था फ़ोटोकॉपी करना, फोन करने वालों के नंबर नोट करना, फैक्स करना, फोन औऱ बिजली का बिल जमा करना... आदि आदि और तनख्वाह 600 रुपये तय हुई। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में उन्हें जबरदस्त ज्ञान था। लोग उनसे लेटर लिखवाकर फिर टाइपिंग करवाते और फाइनल प्रिंट निकलवाने से पहले उनसे ही प्रूफ रिडिंग करवाते। 

दुकान सुबह 10 बजे खुल जाती जबकि मेरी कंप्यूटर क्लासेज 7 से 11 तक चलती। और मैं 11.30 वहां पहुंच ही जाता तथा रात के 9 बजे तक वहीं रहता।  जिस दिन कम्प्यूटर सेंटर की छुट्टी होती उस दिन मैं जल्दी ही दुकान पर पहुंच जाता तब चौधरी साहब दुकान की साफ सफाई करते हुए देखता। वे सफाई प्रिय थे और दुकान की सफ़ाई स्वयं ही करते। लेकिन उन्हें सफाई करते हुए देखना मुझे अच्छा न लगता और मैं उनका हाथ बटाता। वे मना करते लेकिन मैं जबर्दस्ती झाड़ू छीन लेता और सफाई करता तब तक वे डस्टिंग करते। फिर 10.30 बजे तक वहां काम करने वाले सभी आ जाते। खूब काम रहता, लोगों की भीड़ रहती। लेकिन कोई भी वहां से निराश न लौटता। एक छोटी सी दुकान में हम 4 लोग काम करते, मैं फोटोकॉपी देखता, चौधरी साहब हिसाब देखते, कम्प्यूटर ऑपरेटर कंप्यूटर पर कार्य करता। एलेक्ट्रोनिक टायपिंग के लिए कभी कभी इनकी छोटी बेटी जो एमबीए की पढ़ाई कर रही थीं वे भी काम करतीं। किसी भी कस्टमर को बिना चाय पिलाए न भेजते। हमारे यहां से चाय वाले की खूब कमाई होती। दोपहर में प्रतिदिन हम सोतीगंज वाले राधे की चाट खाते। वह उन्हें जनता था और मुझे भी। जैसे ही मैं वहाँ जाता आर्डर तैयार कर देता। हमारी दुकान में जिस दिन ज़्यादा काम होता हम शाम को बेगमपुल से पकौड़ी लेकर आते।

जब दोपहर में कंप्यूटर ऑपरेटर खाना खाने घर जाता तब मुझे कम्प्यूटर पर काम करने के लिए प्रोत्साहित करते। बैठकर डिजाइनिंग करवाते। एक एक टूल का उन्हें ज्ञान था मैं जो भी बनाता उसकी प्रसंसा करते। कभी कभी डाँट भी देते। धीरे धीरे मैं कम्प्यूटर पर काम करना सीख गया। और जब कम्प्यूटर ऑपरेटर काम छोड़कर चला गया तब वो जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। 

मैंने वहाँ बहुत कुछ सीखा, उन्होंने मेरा बैंक में खाता खुलवाया। पैसे सेव करने के तरीके समझाए और सबसे इंसान बनने में मदद की। मैं वहां करीब 2 साल काम किया। जब डिप्लोमा खत्म हुआ तब मैं ही दुकान खोलने लगा, चाभी घर से लेकर आता, साफ़ सफाई करता। जनरेटर में डीजल आदि चेक करता। पेपर के स्टॉक का हिसाब लगाता। लेखा जोखा रखता। हिसाब किताब चेक करता। जनरेटर के लिए डीज़ल लाता। पेपर मार्किट से पेपर और स्टेशनरी लाता। अब मैं वहाँ का वर्कर न होकर उस दुकान का हिस्सा था। जब वे आराम करने के लिए घर चले जाते सारा काम मैं देखता। इतवार को छुट्टी रहती लेकिन घर के काम करने के बाद दोपहर से दुकान खोल देता उस दिन के वे एक्स्ट्रा पैसे देते। हिसाब किताब के बहुत पक्के। महीने के पहले ही तनख्वाह दे देते।

फिर जब मेरी जॉब दिल्ली में लगी वहाँ से जॉब छोड़ने का मन न करता। तीन चार दिन बिना बताए ही गुजर गए रोज सोचता आज शाम को बताऊँगा लेकिन हिम्मत न होती। आख़िर एक दिन शाम को जब मैंने बताया वे दुखी हो गए। कुछ देर के लिए हम शांत हो गए। मेरी आँखों में आँसू आ गए, उनकी आंखें भी गीली हो गईं। काफी देर बाद खुश होकर उन्होनें चाय का आर्डर दिया और मेरे लिए शुभकामनाएं दीं। मेरठ में मेरा आखिरी वेतन 2500 रुपए था। दो साल में इतनी तरक़्क़ी और कहीं न हुई।

काफ़ी दिनों बाद मैं परिवार के साथ मेरठ उनसे मिलने गया। नज़र कमज़ोर हो गई है। लेकिन मुझे देखकर बांहों में भर लिया हम लोग काफ़ी देर तक वहाँ रहे। चलते समय पत्नी और बच्चे को पैसे दिए। बड़ा अपनापन लगा। ख़ूब बातें की। आने का मन न कर रहा था। मेरे जीवन में उनके जैसे अनेकों नेकदिल और जिंदादिल इंसान आए हैं। भगवान चैधरी साहब को दीर्घायु दे...💐

कारिंदा


ज़मीदारी का जमाना था। उस समय ज़मीदार के यहाँ हाँ हजूरी के लिए हरकारा या कारिंदा होता था, जो सताई जाने वाली प्रजा को ज़मीदार के इशारे पर बुलाकर लाती थी और यदि कोई काम न हुआ तो वे हुजूर के कान भरते। ऐसे ही किसी गाँव में एक ज़मीदार साहब के यहाँ एक कारिंदा था। वह मालिक की ख़ूब हाँ में हाँ मिलाता और उनकी झूठी तारीफ़ करके और अपना उल्लू सीधा करता। 

एक साल उस गाँव में अनाज और चारे का भयंकर अकाल पड़ा। लोग त्राहिमाम त्राहिमाम करने लगे। बड़े से बड़े काश्तकारों के यहाँ जानवरों के लिए चारा न रहा। लेकिन ज़मीदार को कोई फ़िक्र न थी उनके यहाँ अनाज और चारे का उचित प्रबंध था।ज़मीदार ठहरे ज़मीदार उन्हें भला क्या फ़र्क पड़ता। लेकिन कारिंदा भी हलकान था। माघ, पूस का महीना था, कारिंदा ज़मीदार के चबूतरे पर जमा करब (जानवरों के लिए एक प्रकार का चारा तथा इसी की भुट्टे से ज्वार भी निकलती है) को उठाकर प्रतिदिन ले जाता और अपने जानवरों के लिए चारे का प्रबंध करता। इस प्रकार करब दिनोंदिन कम होने लगी। एक दिन ज़मीदार की नज़र पड़ी और उन्होनें कारिंदे से आखिर पूछ ही लिया, 'ये करब कम कैसे हो रही है।'

इससे पहले मालिक आगे और कुछ कहते कारिंदे ने तपाक से उत्तर दिया, 'मालिक करब कुत्ते उठाकर ले जा रहे हैं और वही खा रहे हैं।' 

अच्छा, इन ज़मीदार महाशय ने न कभी खेत देखा और न ही खलिहान! इसलिए कारिंदें ने जो भी कहा उसे उस समय के लिए मान लिया। बात आई और गई...

एक दिन ज़मीदार साहब जब कारिंदे के साथ घूमने निकले तो देखा क्या कि, कुछ कुत्ते करब के ढेर में घुसकर सीसी खेल रहे हैं (इस खेल में 5 से 6 कुत्ते मिलकर एक दूसरे को दौड़ाते हैं, गुर्राते हैं, लेकिन एक दूसरे को काटते नहीं, केवल मौज मस्ती करते हैं)। कुत्ते करब को उठाकर धमाचौकड़ी कर रहे थे। कारिंदे ने ज़मीदार की तरफ इशारा करते हुए कहा, 'देखा मालिक कुत्ते करब खा रहे हैं।' 

मालिक ने हाँ में हाँ मिलाया, और कारिंदे को उचित इनाम दिया।

आजकल इधर सरकार में भी कुछ कारिंदें हैं, वे भी हुजूर को खुश करने के लिए हाँ हजूरी में व्यस्त हैं...😊

...कारिंदा, पार्ट-2


कारिंदा ज़मीदार का इतना अधिक भक्त था कि, कई दफ़े तो ज़मीदार साहब के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। 

हुआ ये कि, एक शाम ज़मीदार ने अपनी बैठक से ही जोर से आवाज देकर उसे पुकारा। वह भागा-भागा, गिरते-पड़ते, जैसे-तैसे बैठक में पहुँचा।

ज़मीदार ने पूछा, 'क्या कर रहे थे?' 

कारिंदा बोला, 'मालिक, मैं तो कुंवें से पानी भर रहा था'। 

'फिर इतनी जल्दी कैसे आ गया?' ज़मीदार ने पूछा। 

कारिंदें का उत्तर सुनकर ज़मीदार फूले न समाए और उसे नक़द पुरस्कार से नवाज़ा।

कारण जानकर आपको चक्कर आ जाएगा- हुआ ये कि, कारिंदा ज़मीदार को ख़ुश करने के चक्कर में उनका ही गगरा (पीतल का घड़ा) रस्सी सहित कुंवें में फेंक कर उनकी बात जो सुनने आ गया था।

...उसी तरह प्रजातांत्रिक सरकारों में भी मंत्रीजी जैसे ज़मीदार और अफ़सर जैसे कारिंदें अपना और उनका नाम रोशन करने में व्यस्त हैं।

इति कथा समाप्तम!😊

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