Wednesday, May 24, 2017

गाँव को क़स्बा बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

मील का पत्थर, किनारे पर गड़ा हूँ मैं।
आप गुजरें इस सहारे पर खड़ा हूँ मैं।।

भीड़ है भारी लेकिन हैं बस्तियां सुनसान,
गाँव को क़स्बा बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

प्यार में उसने मुझे क्या देवता बोला,
ख़ुद ही ख़ुद का बुत बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

घर के लोगों में मची है लूट चारों ओर,
इन झमेलों में न जाने क्यों पड़ा हूँ मैं।

युद्ध को भड़का रहे हैं धर्म के रक्षक,
शांति के पैग़ाम के अंदर सड़ा हूँ मैं।।

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