Saturday, January 8, 2022

नींद आती है बशर्ते...



नींद आती है बशर्ते, करार नहीं आता है।
हमारी ज़िंदगी में इतवार नहीं आता है।।

बेवजह की बहस बेग़म से करता क्यों है?
ग़ुलाम बनकर क्यूँ हार नहीं जाता है!

ध्यान रखना शाही रोगों से ए-दोस्त मेरे!
खाँसी चली जाती है, बुखार नहीं जाता है।

उससे मिलकर अच्छा भी लगता है बुरा भी,
क्यूँकि, महीनों हफ़्तों  ख़ुमार नहीं जाता है।

दरम्यान-ए-दिल्ली में एक से बढ़कर एक हैं,
बुजदिन नज़र आता है पर खुद्दार नहीं आता है।

जिधर हाँकोगे, उधर चल देगी रियाया हुजूर,
गधा चला देगा लेकिन, कुम्हार नहीं जाता है।

#नज़र_नज़र_का_फ़ेर #शिशु 

Wednesday, January 27, 2021

अफ़सोस!

आज आनंद विहार बस अड्डे के बाहर कुछ गढ़वाली एक सुर में जोर से बोले, 'अब साले किसानों को खदेड़ खदेड़ कर यहाँ से भगाना चाहिए'। मैं उन्हें असहाय दुःखी मन से सुनता रहा। बड़े शहरों में छोटे छोटे गांवों के लोग खेतीबाड़ी न होने के कारण पलायन करते हैं, और छोटी, कम वेतन की नौकरियों से अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। इनमें से कुछ लोग जो बटाई खेती करने वाले घरों के बच्चे यदि थोड़ी बहुत उन्नति कर लेते हैं तो अपने को बड़ा तुर्रमखां समझने लगते हैं, वे शराब, कबाब में पैसा उड़ाने लगते हैं या झूठी शेखी बघारने के चक्कर में गांव में दिखावा करते हैं, ये लोग जब खेतिहर, मजदूरों की वाज़िब मांगों पे हंसी ठिठोली करते हैं तो उनपे तरस आता है...जबकि गाँव में उनके वालिद, बड़े बुजुर्ग जो कि बटाई खेत करने वाले हैं सोचते हैं जैसे तैसे ज़िंदगी कट जायेगी, लेकिन बड़े काश्तकार असल में समस्या से रूबरू हैं...लेकिन ज़्यादातर बड़े काश्तकारों के बच्चे सरकारी नौकरियों में हैं, या शहरों में नौकरी की तैयारी करते हैं और कभी न कभी उन्हें मेहनत से या पैसे ले देकर नौकरी मिल ही जाती है, इसलिए उन बच्चों को घंटा फर्क नहीं पड़ता खेतिहर की दुर्दशा पे...

...वर्तमान में दिल्ली में शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन में बड़े काश्तकार के साथ छोटे, मझोले काश्तकार भी शामिल हैं। लेकिन, सोशल मीडिया पे फेक एकाउंटधारी, न्यूज़ चैनल में सरकारी चमचे, रिहायशी इलाकों, जिनपे भारी भरकम लोन चढ़ा है, के निवासी, मेट्रो ट्रेन में युवा वर्ग जो इंजीनियरिंग आदि, बड़ी कंपनियों में बेगार करने वाले, पार्क में चूमचाटी करने वाले आवारा आदि से सुनते हुए पाया कि, असल किसान तो खेत में हैं, यहां तो विपक्षी राजनीतिक दलों के लोग हैं...पे हंसी आती है।

...खैर! लेकिन गणतंत्र दिवस पे उपद्रव में असल बाप के किसान शांति पूर्ण से अपना आंदोलन चलाने का प्रयास कर रहे थे, जबकि, इसमें कुछ घुसपैठिए, धोखेबाज, शरारती, फरेबियों ने इसमें शामिल होकर पूरी किसान जमात को कलंकित कर दिया है औऱ शांतिपूर्वक चल रहे आंदोलन को पब्लिक के सामने मजाक औऱ गुस्से में बदल दिया है। सरकार, पुलिस, प्रशासन से गुजारिश है ऐसे उपद्रवियों को सख़्त से सख़्त सजा दे औऱ बेकसूर किसानों और शांतिपूर्वक आंदोलन करने वालों को परेशान न करे। 

मुझे बेहद दुःख और तकलीफ़ होती है जब किसानों की बुराई सुनता हूँ, क्योंकि हम खेतिहर पहले हैं प्राइवेट नौकरी वाले बाद में। मैनें खेतिहर की मजबूरियों को देखा है, महसूस किया है। हमारे माँ बाप ने बड़े बड़े खेतों को बटाई जोत करके, दिन रात मेहनत की और हमें पढ़ाया लिखाया इसलिए जब खेतीबाड़ी, किसानों की बात जब आती है, भावुक हो जाता हूँ...। आज सभी किसानों को जब न्यूज़ एंकर, फिल्मी दुनिया के नचनिए बुरा बोलते हैं दुःख में सराबोर हो जाता हूँ! क्या करूँ!!!😢

Wednesday, November 4, 2020

हमारे और तुम्हारे मोहल्ले में इतना सा ही अंतर है...

हमारे और तुम्हारे मोहल्ले में इतना सा ही अंतर है...

तुम्हारे मोहल्ले में  कबाड़ी बहुत हैं।
हमारे मोहल्ले में  जुगाड़ी  बहुत हैं।।

हमारे मोहल्ले में सबको ख़बर है-
तुम्हारे मोहल्ले में अनाड़ी बहुत हैं।

दुकानदार हमारे मोहल्ले का कहता-
तुम्हारे मोहल्ले पे उधारी बहुत है।।

ताश की गड्डी हमारे मोहल्ले की है।
तुम्हारे मोहल्ले में जुआरी बहुत हैं।।

तुम्हारे मोहल्ले में  बंदर-बंदरिया हैं।
हमारे  मोहल्ले में  मदारी  बहुत हैं।।

हमारे  मोहल्ले  में  चिंता  न फ़िक्र।
तुम्हारे मोहल्ले में दुनियादारी बहुत है।

हमारा मोहल्ला अब शोहदों से मुक्त।
तुम्हारे मोहल्ले में 'पटवारी' बहुत हैं।😊

#नज़र_नज़र_का_फ़ेर #शिशु

Tuesday, November 3, 2020

अब मेरी सुधि में तुम पथ पर दीप जलाये मत रखना ।।

अब मेरी सुधि में तुम पथ पर 
दीप जलाये मत रखना ।।

मैं सागर में खोयी नौका,
कब जाने किस छोर लगूँ ।
और तुम्हारा कुसुमित जीवन,
खिलकर फिर मुरझा जायेगा ।
माना, मन से मन के विनिमय
में, कुछ मोल नहीं चलता है ।
फिर तुम सा, मुझ जैसे को
पाकर भी क्या कुछ पायेगा ।।

यक्ष-प्रश्न जीवन के जितने 
सुलझा पाओ, सुलझा देना ।
पर इन प्रश्नों मे ही जीवन, 
तुम उलझाए मत रखना ।।

जिसके आगे भोर न होगी,
ऐसी कोई रात नहीं है ।
कौन घाव ऐसा जीवन का,
समय न जिसको भर पाया है ।।
जीवन खुशियों का मेला ही
नहीं, अपितु दुख भी सहने हैं ।
सबको मनचाहा मिल जाये,
यह संभव हो कब पाया है ।।

अपने हिस्से के सारे सुख,
जितने चुन पाओ चुन लेना ।
लेकिन मन में गिरह लगाकर,
दर्द पराये मत रखना ।।

-चन्द्रेश शेखर

Saturday, October 31, 2020

नज़्म

थक  गया  हूँ  मैं  पता कर, पता कर।
'अक़्ल  गई  चरने'  हमको सताकर।।

तेरे मुहल्ले में यदि सीसीटीवी लगे हैं,
तो  मेरे  मुहल्ले में आकर  ख़ता कर!

हल्की-सी-आहट से काँप जाता हूँ मैं,
दरवाज़ा-खटखटाना दोस्त बताकर!

आती  हैं  हिचकियाँ, कुछ रहम कर,
इतना  भी  न  मिरा  नाम  रटा  कर।

जाले  हटा  दिए हैं  सियासत के मैनें,
मेरी पोस्ट पढ़ो तुम 'चश्मा हटा कर'!

#नज़र_नज़र_का_फ़ेर #शिशु

Tuesday, September 22, 2020

हलकान!


जुमले -  वादे  -  झूठों  से।
प्रजातंत्र - की - लूटों   से।।
काँटों  से  बचना  आसान,
मुश्किल लेकिन -ठूठों  से।।

छुट्टा साँड़ समझ में आता,
गाय छुटी क्यों - खूँटों  से?
हाल  बराबर  लेता  रहता,
खेतिहर अपने- रूठों  से।

निर्दयता,  बर्बरता  की  बू-
आती  क्यों  है  बूटों  से ?
एसपी साहब भी हलकान!
नए - नए - रंग - रूटों  से...

#शिशु #नज़र_नज़र_का_फ़ेर

Wednesday, August 12, 2020

बेमतलब करते हो याद!दिनभर आती आहट है।

अंदर अबतक राहत है!
बाहर  पर  घबराहट है।

बेमतलब करते हो याद!
दिनभर आती आहट है।

मेरे मरने पर इतना दुःख!
दीये  जले,  सजावट  है।

सच में, दुःख के आँसू थे!
छोड़ो  अजी  बनावट  है।

यारों तक ने जश्न  मनाया,
इस हदतक कडुआहट है!

#नज़र_नज़र_का_फ़ेर #शिशु #राहतइन्दौरी

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