Wednesday, August 23, 2017

ज़िन्दगी का नहीं कोई आधार है...

ज़िन्दगी का नहीं कोई आधार है,
गप्पबाज़ी यहाँ अब धुआँधार है।...

झूठ बोलूं न क्यों अब ज़रूरत है ये,
सत्य का आजकल फ़ीका बाज़ार है।

जो गरजते थे कल वो बरसने लगे।
बादलों का लगा देखो अम्बार है।।

शाम से इस शहर में रह भीगता,
सर छुपाने का कोई न आसार है।

मेरे हमदर्द कबसे हैं रूठे 'शिशु',
डाकबाबू न लाया कोई तार है।।

Wednesday, May 24, 2017

रस्म और रिवाज

रस्म एक टोटका है जबकि,
रिवाज में अंधविश्वास की बू आती है।
और धर्म इन दोनों की रक्षक,
वो इन्हें एक साथ आगे बढ़ाती है।।

रस्म और रिवाज़ का विरोध
कोई क्यों नहीं करता है?
क्योंकि व्यक्ति 'आस्था' और
'धर्म' से बहुत डरता है।।

ढोंगी-पाखण्डी इन रस्मों और
रिवाजों के रखवाले हैं।
आस्तिक इनके गुलाम और
'नास्तिक' प्रश्न करने वाले हैं।।

कुछ भी।

रात के सफ़र में आप अकेले नहीं हैं 'शिशु',
चाँद-तारे, हवाओं का कारवां भी साथ है।

उसके प्यार का नशा इस क़दर चढ़ा
'शिशु' अब पीने की नौबत नहीं आती।
इस कदर सँभला हूँ बिगड़कर कि,
मुझमें कोईं सोहबत नज़र नहीं आती।

सोहबत:- वह बात (विशेषतः बुरी बात) जो बुरी संगत के कारण सीखी गयी हो।

शहादत को यूँही कभी भुलाया न जाएगा,
गुनाहगार को कटघरे में लाया ही जाएगा।।
बक्से नहीं जाएंगे जो साँप आस्तीनों में हैं,
उनको पहले ही शूली पर चढ़ाया जाएगा।।

कितनी पी है ख़बर नहीं कुछ,
फिर से कुछ पी लेता हूँ।
रो-रो जीवन कब तक काटूँ,
अब हंस कर जी लेता हूँ।।

गाँव को क़स्बा बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

मील का पत्थर, किनारे पर गड़ा हूँ मैं।
आप गुजरें इस सहारे पर खड़ा हूँ मैं।।

भीड़ है भारी लेकिन हैं बस्तियां सुनसान,
गाँव को क़स्बा बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

प्यार में उसने मुझे क्या देवता बोला,
ख़ुद ही ख़ुद का बुत बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

घर के लोगों में मची है लूट चारों ओर,
इन झमेलों में न जाने क्यों पड़ा हूँ मैं।

युद्ध को भड़का रहे हैं धर्म के रक्षक,
शांति के पैग़ाम के अंदर सड़ा हूँ मैं।।

गाँव का होकर गाँव की नहीं!

गाँव का होकर,  गाँव की नहीं,
किसी बिरवे की छाँव की नहीं,
धूल  और  नंगे  पाँव  की नहीं,
नदी,  तालाब,  नाव  की नहीं!
फ़िर किसकी बात लिखूँ 'शिशु'!!

बकरी,  भैंस,  गइया  की नहीं,
चरवाहे  भैया कन्हैया की नहीं,
स्वरचित  गीत  गवैया की नहीं,
छंद,  चौपाई,  सवैया की नहीं!
फ़िर किसकी बात लिखूँ 'शिशु'!!

मुसीबत  के  मारे इंसान की नहीं,
खेत, खलिहान, किसान की नहीं,
लोन, तेल, आटा-पिसान की नहीं,
अपनों के चोट के निशान की नहीं!
फ़िर किसकी बात लिखूँ 'शिशु'!!

छप्पर, बिस्तर , खाट  की  नहीं,
दरवाजे  पर टंगे, टाट  की  नहीं,
अपनों  से मिली डाँट  की  नहीं,
गाँव  के  मेला,  हाट  की  नहीं !
फ़िर किसकी बात लिखूँ 'शिशु'!!

Wednesday, April 5, 2017

अग्नि की अब परीक्षा ज़रूरत नहीं

राम का जन्म दिन हो मुबारक़ सभी,
कर्म का फ़ल मिलेगा अभी के अभी।
हो पुनर्जन्म का कोई झंझट नहीं,
पूर्ण कारज करो जी अभी के अभी।।

अग्नि की अब परीक्षा ज़रूरत नहीं,
कौन कहता है तुम ख़ूबसूरत नहीं।
राम की झूठी कसमें न खाया करो,
राम दिल में बसे कोई मूरत नहीं।

भाई कैसे मिले राम जैसा कहीं-
जब लखन न मिले उनके जैसा कहीं।
बात रिश्तों की बनती-बिगड़ती गयी
बाप मिल जाएंगे, मिलता पैसा नहीं।।

धारणा बन गयी पैसे का है समय,
अब गरीबों का बिल्कुल नहीं ये समय।
आ गया अब समय आप जैसों का है,
मेरे जैसों का बिल्कुल नहीं ये समय।।

Wednesday, February 15, 2017

असली न लोग रंग किसको लगाऊं मै.....

रंग भी न असली है ढंग भी न असली है,
असली न लोग रंग किसको लगाऊं मै!
रंग किसको लगाऊं मै!

प्यार है दिखावा ही प्रेमिका न अपनी है,
अपनी न भाभी कोई सारी ही मैडम हैं !
रंग किसको लगाऊं मै!

भीड़-भाड़ इतनी है मेला हाट जितनी है,
कौन कौन अपनों है कुछ न समझ आवे है!
रंग किसको लगाऊं मै!

इंग्लिश ही मिलती है देशी का नाम नहीं,
'और हम जैसे लोंगन का यंहा कोई काम नहीं !
रंग किसको लगाऊं मै!

'शिशु' कहें पीने पिलाने का दौर यंहा कन्हा,
जितना मज़ा गाँव में है उतना और कन्हा
रंग किसको लगाऊं मै!

Popular Posts

आंदोलन

यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...