Wednesday, February 13, 2019

नशा

मेरे घर में आज टीवी नहीं है। किसी भी परिचित को बताता हूँ वो इसे झूठ समझते हैं, रिश्तेदारों को लगता है टीवी खरीद नहीं सकता और दोस्त, भाई भतीजे इसे कंजूसी की हद मानते हैं।

यकीन मानिए, कभी टीवी और वीडियो देखने का इतना चस्का था कि रात रात रात वीसीआर पर फिल्में देखीं। आसपास के गांव बकाया नहीं रखे। आज भी याद है, हमारे पड़ोसी के एक रिश्तेदार जो बांसा गाँव के थे, के घर छिदना था। बातों बातों में पता लगा कि उनके वुस दिन वीडियो भी होगा, फिर क्या था तय दिन पर मैं और मेरा चचेरा भाई पहुंच गए। अंधेरी रात में मेरी नई साइकिल, जो मुझे मेरे मामा ने दी थी को लेकर चल दिए, लूटपाट और चोरी का डर नहीं, जैसे ही मामा भांजा (एक स्थान) के पास पहुँचे जो मूसलाधार बारिश हुई पूछो मत, वहां पहले से ही गहरा नाला था ऊपर से बारिश लौटना मंजूर नहीं, वहां से गांव और बांसा की दूरी लगभग बराबर लेकिन गांव लौटना मंजूर न था, जैसे तैसे हम पहुँच तो गए लेकिन बांसा का कीचड़ उन दिनों मशहूर था। बारिश की वजह से वीडियो को रिश्तेदार की चौपाल में लगाया गया था जहां तिल रखने की जगह नहीं, फ़िल्म लगी थी शहंशाह। आधी फ़िल्म देखी कि जनरेटर जवाब दे गया। वीडियो वाले को लोगों ने मारते मारते छोड़ा, ख़ैर हम रात को ही हताश निराश गाँव आ गए, इससे पहले कि किसी को पता चलता हम सो गए।

गाँव में लोगों के घर महाभारत, रामायण और रात को फ़िल्म देखना दूसरों की तरह मेरा भी शौख था। मेरे गांव में मेरी यादाश्त के अनुसार केहर दादा के यहाँ टीवी सबसे पहले आई थी, पता नहीं लेकिन लोग कहते हैं यह उनको दहेज में मिली थी। और टीवी पर सबसे पहले मैंने सौतन फ़िल्म देखी थी और वीडियो पर नदिया के पार या संतोषी माँ दोनों में से एक, ठीक ठीक याद नहीं। केहर दादा इस मामले में दिलदार थे, टीवी को बाजार में लगा देते थे कम से कम दो सौ लोग जमा होते थे, महिलाएं अलग बैठती थीं और पुरूष अलग। वहीं पड़ोस में चौधरी बाबा का घर था, लोग मूत मूत कर बुरा हाल कर देते थे, वे बाहर ही लेटते थे, खुखराइन्द के मारे बुरा हाल होता था बेचारे बड़े ही सज्जन थे कभी किसी को कुछ नहीं कहा। गाँव में उसके बाद जिनके घर टीवी आई वे सब मास्टर थे, ज्यादातर अच्छे लोग थे सबके लिए दरवाजा खोल देते थे लेकिन मेरी याद में कुछ लोग बहुत खराब थे हमें भगा दिया करते थे, हम हताश निराश होकर उन्हें कोसते इनकी टीवी खराब हो जाए, बैटरी बीच में ही खत्म हो जाए, बंदर एंटीना तोड़ दे आदि आदि और कभी कभी ऐसा हो भी जाता था। तब मन को जो संतोष मिलता बता नहीं सकता।

इसके बाद 8वीं से लखनऊ शहर में पढ़ने चला गया, वहां होस्टल में रहता था। हॉस्टल में टीवी नहीं थी लेकिन होस्टल वार्डन के घर जरूर थी। दुबे जी वार्डन थे शायद बलिया जिला था उनका। शाम को एक घंटे सभी बच्चों को टीवी देखने देते थे। कुछ सयाने बच्चे रात को भी टीवी देख लेते उनकी दीवाल में एक होल कर दिया था, आंख लगाकर देख आते। मैं उनमें नहीं था।

मेरठ में कम्प्यूटर की पढ़ाई के दौरान मकान मालकिन के घर टीवी देखता, सब सो जाते रिमोट मैं ले लेता और रात के 12 बारह बजे तक देखता। सब कहते कितना शौकीन है रात को देर से सोता और सुबह 5 बजे जग जाता, 6 बजे ट्यूशन पढ़ाने जाता फिर कंप्यूटर क्लासेस और फिर 12 बजे लौटता, खाना बनाता, लेकिन खाता टीवी देखते देखते। लोग मुझे टीवी का कीड़ा कहते।

फिर दिल्ली आ गया, यहाँ रूम में दोस्त के पास वीसीआर वाली टीवी थी, आफिस से आकर पहले एक घण्टे टीवी देखता, उसके बाद खाना बनाने की सोचता, मैं आफिस से पहले आ जाता और दोस्त बाद में, जब तक वह आता मैं खाना बना लेता, बर्तन धोने की जिम्मेदारी उसकी होती। इसके बाद हम चार दोस्त रहने लगे, सबने आपस में पैसे मिलाकर टीवी नई खरीद ली दोस्त ने पुरानी टीवी गांव भेज दी,जिसे उनके चचेरे भाई ने औने पौने दाम में बेंच दिया।

सच कहूँ तो टीवी देखने का चस्का कम्प्यूटर पर काम करने के बाद से कम हो गया और शादी के बाद तो इसमें और भी दिलचस्पी कम हो गई।  पत्नी को भी टीवी में इंटरेस्ट नहीं था इसलिए आज हमारे घर में टीवी नहीं है। लोग कहते हैं तुम्हारा टाइम कैसे पास होता है उन्हें बताता हूँ बात करने से, हम दोनों नौकरीपेशा वाले थे घर पर आकर टीवी देखते तो बात कब करते, इसलिए टीवी से मोह छोड़ना पड़ा। अब बच्चा भी टीवी की डिमांड नहीं करता, उसे एक घंटे मोबाइल दिया जाता है जहाँ वह अपने मन के प्रोग्राम देखता है, खासकर यूट्यूब पर स्टोरी पड़ता है, कुछ गिने चुने कार्टून देखता है। मुझे आजकल मोबाइल का नशा लगा है, जिसमें सोशल मीडिया का नशा सर चढ़कर बोल रहा है, जिसे धीरे धीरे छोड़ने का मन करता है, अब व्हाट्सऐप कम ही प्रयोग करता हूँ, धीरे धीरे फेसबुक को अलविदा कहूंगा और फिर ट्वीटर को। ब्लॉग लिखना जारी रहेगा।

Wednesday, January 23, 2019

काँटा


उसदिन से हलचल है मन में,
देखा जबसे है उपवन में-
पुष्प से बढ़कर काँटे हैं,
दुःख तो मिलकल बाँटे हैं,
पुष्प गुच्छ तो रगड़-रगड़ कर,
मिट्टी में मिल जाते सड़कर।
काँटे काँटों को लेकिन
धैर्य बंधाते रहते हैं,
सुख हों या तकलीफें हों,
दोनों मिलकल सहते हैं!

Sunday, January 13, 2019

गाँजा

सन 1997-98 की बात है तब पुलिस थाना ठीक बस अड्डे के पास हुआ करता था। कस्बा पुराना है। लेकिन राजनीतिक उपेक्षा की वजह से उतना विकास नहीं हुआ जितना उस पर उसका हक़ है। वहां से रेलवे स्टेशन करीब 1 किलोमीटर के फासले पर है। स्टेशन और थाना दोनों में एक समानता थी- जमीन। दोनों के पास मतलब से ज्यादा जमीन थी, लेकिन, वह सरकारी उदासीनता की वजह से वीरान पड़ी थी। इसी वीराने पर गाँजा पैर पसारे था। असल में कुछ जमीन छोड़कर बाकी पर गाँजे का निवास था या ये कहें कि गाँजा ही दोनों जगहों का वारिस था।

कस्बे के आसपास छोटे गांवों का जमावड़ा था, ज्यादातर गावों के नाम के आगे 'पुरवा' लगा था, जैसे गयादीन पुरवा, नंदन पुरवा। जिसे बड़े गांव वाले पुरई-पाले कहकर उपहास उड़ाते थे। ख़ैर गांव से कस्बे की बाजार में खरीदारी करने आते लोग जाते समय स्टेशन के पास जरूर ठिठकते, साइकिल पेड़ के सहारे टिकाते और खाली थैले में गाँजा भरकर ले जाते। बाज़ार आते समय इसकी प्लॉनिंग पहले ही हो जाती। एक थैला केवल गाँजा के लिए होता था। कोई रोक टोक नहीं, जितना चाहो जैसे चाहो खोंट लो। गाँजे की मुस्कराहट उस समय देखते ही बनती। हालांकि ट्रेन से उतरने वालों की गाँजे पर नज़र न पड़ती। गाँजा मुसाफिरों से अपने को उपेक्षित समझता। वो कहते हैं कि हीरे की परख जौहरी को होती है इसलिये पैदल-राहगीरों, साइकिल, टांगे, बैलगाड़ी वालों को इसकी परख थी। उस समय तक मोटर साइकिल का उतना चलन नहीं था। कोई कोई ही मोटरसाइकिल से चलता था, लेकिन वो भी उसका रस लिए बिना नहीं मानता।

अब थाने की तरफ चलते हैं। उस समय गाँजा रखना, पीना अपराध नहीं था, लेकिन पुलिश की नज़र में उगाना जरूर अपराध था, इसलिए लोग अपनी निजी जमीन पर उसे नहीं बोते थे। उन दिनों सार्वजनिक जमीन पर कब्जा करने का दौर नहीं था। लोग उसका उपयोग जरूर करते लेकिन कब्जा नहीं जमाते। इसलिए सार्वजनिक जमीन गाँजा उगाने के लिए उपयोग में लाई जाती थी। लोग कहते थे थाने के गाँजे की अलग ही बात है। जिसने एक बार उस गाँजे की चिलम लगा ली उसके लिए पूरा दिन गर्व की बात होती थी। उससे बढ़कर भोले का प्रसाद कोई और हो ही नही सकता। लेकिन वहाँ से गाँजा तोड़कर कैसे लाएं यह बिल्ली के गले में घण्टी बांधने के समान था। सयाने लोगों का काम थाने का चौकीदार कर देता था, लेकिन गरीब और कुम्हार, चमार, पासी, धोबी धानुक आदि जातियों को चौकीदार भाव नहीं देता था, हालांकि वह भी उनमें से एक था। कुछ पियक्कड़ थाने का गाँजा पीने की खातिर छोटे मोटे अपराध तक कर डालते थे, ऐसा कहा जाता था, इस बात में कितनी सच्चाई है कहना मुश्किल है।

जबसे गाँजा लाना ले जाना अपराध की श्रेणी में आया है तबसे सार्वजनिक जगहों का गाँजा सूखकर काँटा हो गया है। कई सालों बाद स्टेशन जाना हुआ देखा कि वहाँ का गाँजा अपनी अंतिम सांस गिन रहा है। थाने में गाँजा तो हरगिज होगा ही नहीं क्योंकि अब पुलिस किसी बेगुनाह को पकड़ते ही सबसे पहले गाँजा और तमंचा दिखाकर ही जेल भेजती है। वहां का सारा गाँजा अब जेल में बंद है। 

Saturday, January 12, 2019

विदाई गीत।


अब तनिक भी मन यहाँ लगता नहीं है,
लग रहा निर्वाण का क्षण आ गया है।

ज़िन्दगी भर कष्ट के बोझे उठाए,
ख्वाब तक में सुख कभी देखा नहीं है।
ज्योतिषी ने बहुत पहले ही कहा था,
हाथ में सुख की कोई रेखा नहीं है।।
आंसुओं की धार झर-झर बह रही है,
चक्षुओं में लग रहा कण आ गया है।

अब तनिक भी मन यहाँ लगता नहीं है,
लग रहा निर्वाण का क्षण आ गया है।

छल, कपट, फ़रेब का साया रहा हरदम,
इसलिए फ़रेब पर भी बोल देता हूँ।
जिन सयानों को 'गुरु' समझा कभी था,
आज उनकी पोल भी मैं खोल देता हूँ!!
कुछ नहीं कहना, हमेशा खुश रहें वे,
याद मुझको स्वंय का प्रण आ गया है।

अब तनिक भी मन यहाँ लगता नहीं है,
लग रहा निर्वाण का क्षण आ गया है।

प्यार से जिनसे निभाना चाहता था-
हर मुसीबत वे हमें ही बांट देते थे।
डोर संबंधों की पकड़े मैं रहा ताउम्र,
था भरोसा जिनपे वे ही काट देते थे।।
आख़िरी है छंद, यह अंतिम विदाई,
भूल जाता हूँ! स्मरण आ गया है।

अब तनिक भी मन यहाँ लगता नहीं है,
लग रहा निर्वाण का क्षण आ गया है।

Sunday, November 4, 2018

त्यौहारों को मजहब में तुम, बाँट रहे हो भाई क्यूँ?

कम-से-कम शब्दों में, बात समझने वाले,
मुझसे बकवादी तुम, छाँट रहे हो भाई क्यूँ?

नफ़रत, हिंसा, मारपीट फैलाने वाले कौन?
मेरे प्रश्नों पर मुझको तुम, डांट रहे हो भाई क्यूँ?

जिनसे खुशियाँ मिलती हैं उन पर सबका हक,
त्यौहारों को मजहब में तुम, बाँट रहे हो भाई क्यूँ?

नेतानगरी खूब समझता, मुझको मत समझाओ!
उल्लू जन मानस का तुम, काट रहे हो भाई क्यूँ?

Monday, October 29, 2018

खुशी की कश्तियाँ मुझको अरे दे दो कोई लाकर।

बरसने की जरूरत थी, गरजने क्यों लगे आकर,
कोई आओ बताओ बादलों को बात ये जाकर।

मुसीबत में दुःखों के हर तरफ तूफ़ान दिखते हैं,
खुशी की कश्तियाँ मुझको अरे दे दो कोई लाकर।

वो पहने घूमता कुर्ता, दिलाया हमने उसको था,
हमारी नेकनियती की उसे कर दो खबर जाकर।

उसे करना था अच्छे काम उसको छोड़कर देखो,
लूटता अब खजाना है, गरीबों पर ज़ुलम ढाकर।

शहर केवल अमीरों का, गरीबों के लिए मुश्किल,
गुजारा कर रहे हमलोग, केवल रोटियाँ खाकर।।

Wednesday, October 24, 2018

रार, तक'रार और प्यार है पति-पत्नी की देन।

रार, तक'रार और प्यार है पति-पत्नी की देन।
फिर भी पत्नी पति की, पति पत्नी का फैन।!
पति ने कहा-
प्रिये मायके में तुम कुछ वक़्त गुजारो और।
मेरी चिंता मत करियो, यहाँ अमन सब ठौर।।
पत्नी ने भी पति को फिर भेज दिया संदेश!
दो घंटे में आ-जा सकती, रहती नहीं विदेश।।

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यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...