Friday, May 16, 2008

मैंने इसे कई बार पढ़ा है

इज्जत की बहुत सी नज़्में हैं
घूंघट,थप्पड़,गंदुम
इज्जत के ताबूत में कैद की मेंखें ठोंकी गयी हैं,
घर से लेकर फुटपाथ तक हमारा नहीं
इज्जत हमारे गुजारे की बात है
इज्जत के नेजे से हमें दागा जाता है
इज्जत की कनी हमारी जबान से शुरू होती है
कोई रात हमारा नमक चख ले
तो एक जिंदगी हमें बेजायका रोटी कहा जाता है
ये कैसा बाजार है!
कि रंगसाज ही फीका पड़ा है
खला की हथेली पे पतंगें मर रही हैं
मैं कैद में बच्चे जनती हूँ
जायज औलाद के लिए
जमीन खिलंदरी होनी चाहिए
तुम डर में बच्चे जनती हो,
इसीलिए आज तुम्हारी कोई नस्ल नहीं
तुम जिस्म के एक बंद से पुकारी जाती हो
तुम्हारी हैसियत में तो चाल रख दी गयी है
एक खूबसूरत चाल!
झूठी मुस्कराहट तुम्हारे लबों पर तराश दी गयी है
तुम सदियों से नहीं रोयीं।
क्या माँ ऐसी होती है।
तुम्हारे बच्चे फीके क्यों पड़े हैं?
तुम किस कुनबे की माँ हो।

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