Tuesday, November 18, 2008

कभी घी घणा, कभी गुड़ चना कभी वो भी मना

अभी ज्यादा समय नहीं हुआ। बात तब की है जब हम बच्चे थे। उस समय हमारे गांव में बर्फ बेंचने वाला (शहरी भाषा में इसे आइस्क्रीम कहते हैं) आया करता था। उसका एक तकिया कलाम था या कहे उसकी एक मार्केटिंग की भाषा थी - अठन्नी का मजा चवन्नी में। यानी पचास पैसे वाला बर्फ केवल पच्चीस पैसे में और मजा पचास पैसे वाला। आज इस बढ़ती हुए मंहगाई को देखकर उसकी याद बरबस ताजा हो जाती है।

इस वर्ष जो मंहगाई आयी है वो पुराने समय में आने वाली महामारी की तरह की है। चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है। हर जगह बस हो या ट्रेन,आफिस हो या घर बस महंगाई ही चर्चा का विषय है। इसी पर बहस छिड़ी हुई है। हर कोई यह जानना चाहता है कि चीजों के दाम बढ़ेंगे या घटेंगे। कम पढ़े लिखे लोग तो इसी से हैरान हैं कि आखिर सारा पैसा गया हो गया कंहा?

इस बार की मंहगाई में चीजों के दाम इतने बढ़ गये हैं कि धनी वर्ग भी परेशान दिखाई दे रहा है। गरीब तो पहले से ही त्रस्त हैं उनके लिए तो पहले ही रोजी-रोटी का जुगाड़ जुटाना मुश्किल था। अब तो और भी मुश्किल है। कहा जाय तो उनके लिए यह मंहगायी केवल खाने-पीने और रोजमर्रा की वस्तुओं तक ही सीमिति है। कार खरीदना या घर बनवाना तो उसके लिए पहले की तरह सपना ही है। इस बार देखा गया है कि इस मंहगाई से धनी वर्ग को कुछ ज्यादा ही मुश्किल हो रही है। इन दिनों उसे अपने विलासिता के संसाधनों की कटौती जो करनी पड़ रही है। उसे अपने कार की ईएमआई की चिन्ता के अलावा पीजा या बर्गर न खा पाने की चिंता भी है। उसने हवाई यात्राओं में कटौती की है। क्लबों और होटलों में खाना छोड़कर घर की बाई का बनाया खाना खाना शुरू किया है। ताकि इस बढ़ती हुई मंहगाई को हंसते-हंसते झेल सकें।

इस बढ़ती हुई मंहगाई को इस बार अमीर देश भी झेल नहीं सके। उनकी हालत तो हम जेसै देश (विकास विकासशील देश) की तुलना और भी खस्ता हाल हुई है। इन अमीर देश के कितने ही धनवान दीवालियापन के शिकार हो गये हैं। बड़े-बड़े उद्योग धंधे चौपट हो गये हैं। उनके शेयर बाजार ठेर हो गये हैं। जिसका नतीजा यह हुआ कि कितने ही लोग बेरोजगार हो गये। कहा जाय तो उनकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गयी।

हाय मंहगाई! हाय मंहगाई का शोर चारों ओर सुनाई दे रहा है। ज्यादातर लोग मान रहे हैं कि इस बढ़ती हुई मंहगाई का मूल कारण शेयर बाजार हैं। कारण जो भी हों इस बढ़ती हुई मंहगाई ने क्या गरीब वर्ग क्या अमीर सभी को प्रभावित किया है। कहें तो आम आदमी से लेकर धनी वर्ग सभी परेशान हैं। सभी की थाली का खाना पहले की तुलना में उतना स्वादिस्ट नहीं रहा जितना कि इस बढ़ती मंहगाई से पहले था। बड़े बुजुर्ग सही ही कह गये हैं-कभी गुड़ चना, कभी घी घना कभी वो भी मना।

2 comments:

Shuaib said...

जब मैं दुबई मे था, एकसाथ सौ दिर्हम (तकरीबन 1,500 रूपय) की आइसक्रीम खाजाता। आज यहां भारत मे जब दुकानदार कहता है ये आइसक्रीम पचास रूपय की है और ये 90 रूपये की। मुझे हैरानी होती है कि यार कितना महंगा बेचते हैं।

mehek said...

sahi kaha mahangai ko uchai par hi chadhte dekha hai kabhi niche giri hi nahi achha lekh