Monday, June 14, 2010

जो न हँसे उसको ले लटकाओ सूली पर..

रहो सदा संतुष्ट घोर वर्षा कि धूप में,
गर्मी हो या शीत, लालिमा रखना मुख पर.
नफ़रत मुझको कमजोरी और पीतवर्ण से,
जो न हँसे उसको ले लटकाओ सूली पर..

- प्लेखानव (रूस के क्रांतिकारी कवि)

1 comment:

क्या बात है? said...

kavita bahut achchhee lagee shishu ji.

कहानी पूरी फिल्मी है।

क़रीब कोई बीस साल पहले की बात है। एक देश में एक परिवार पापड़ बनाकर बेचता था। उनके दिन बहुत गरीबी में बीत रहे थे। फ़िर उन्हें उनके पड़ोसी ने बत...