Thursday, June 10, 2010

जूझ रहा इस तरह जल बिना जैसे हूँ मैं मीन

जूझ रहा इस तरह जल बिना जैसे हूँ मैं मीन,
बिना नहाये ऑफिस जाता ऑफिस भी जलहीन.

नित्यक्रिया को सुगम बनाने एक बिसलरी लाया,
दिन भर पीता पेप्सी-कोला प्यास बुझा ना पाया.

घर में खाना बनता न अब, होटल में ही खाता,
१२ बजे रात में जगता फिर भी पानी ना आता.

कपडे धोबी से धुलवाता लेता वो है दूने दाम,
पानी की कीमत अब जानी पानी का अब नाम.

काश! दोस्तों, इन्टरनेट से पानी घर में आता,
पानी की उन बौछारों से सब जग पानी हो जाता.

3 comments:

संजय भास्कर said...

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

वाह शिशु भाई क्या बात है... घायल कर रहे हो

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गुलाबी कोंपलें
The Vinay Prajapati

Jandunia said...

सुंदर पोस्ट