Tuesday, August 16, 2016

मिलते हैं भीड़ में, और खो जाते हैं।

मिलते हैं भीड़ में,
और खो जाते हैं।
इनमें कुछ ख़ास,
अपने से हो जाते हैं।।
पता ही नहीं क्यों,
हम याद करते हैं।
वो अनजान हैं,
बताने से डरते हैं।
सपनों में खो जाते हैं।
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
कई बार ऐसा होता है
वो आते ही मुड़ते हैं
बिना बात किये ही
एक दुसरे से जुड़ते हैं
फिर अपने आप में खो जाते हैं
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
कहीं धुप में छाता लिए,
कभी बारिश में भीगते हुए।
और चले जा रहे हैं मस्ती में
यूँ ही रीझते हुए।
दिल में खिंचे चले आते हैं
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
एक हल्की सी आहट,
उनकी वो मुस्कराहट,
ये बंदिशों की रेखा,
'शिशु' पलटकर नहीं देखा।
चलो अब सो जाते हैं।
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।

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