Wednesday, August 17, 2016

भक्त संग आपिया भी महंगाई का मारा है।

हाय महंगाई है! हाय महंगाई 'शिशु'
शोर चहुँओर सुनायी रहा भोर से।
जाति-धर्म इसका न सभी जन एक हैं,
त्राहि-माम त्राहि-माम सुनो सभी छोर से।।
बड़े बड़े लोग भी दाल-भात बोल रहे,
कितने बेहाल सभी भेद जो हैं खोल रहे।
आते-जाते पैदल ही हेल्थ की दुहाई देते।
अच्छे दिन कहाँ हो, ख़ुदा की ख़ुदाई लेते।
हैं इतने बेहाल, अब होता न गुजारा है,
भक्त संग आपिया भी महंगाई का मारा है।

'शिशु' पान के ऐसे हैं अजब अनोखे किस्से।

बिन चूने का पान चबाकर चौबे बाबा बोले।
बचा-खुचा भी ऐसे बीते जय शिवशम्भू भोले।
लौडे चक्कर लगा रहे हैं सभी पान के खोखा।
घरवालों को चकमा देकर दुकानदार को धोखा।।
चूना कम कत्था है ज्यादा, खाकर बोले कोके,
उधरा पूरा मिल जायेगा, हमका काहे हो रोके।
खाके मीठा पान, पिचकारी थूक की छोड़ी।
घुमि रहे हैं गॉव में शोहदा हंसी हँसे हैं भोंडी।।
'शिशु' पान के ऐसे हैं अजब अनोखे किस्से।
लिखते रहो दोस्तों इसमें अपने भी हिस्से।।

...असल में जिंदगी सब कुछ हमें वहीं सिखाती है।

जहाँ न दूर-दूर कोई भी परिंदा दिखता है,
वहीं बैठ कवि अपनी कविता लिखता है।
जहाँ तक नज़र जाती है पानी ही पानी है,
वहां एक लेखक लिख सकता कहानी है।
जहाँ शोर नहीं, केवल सन्नाटा ही सन्नाटा है,
असल में किसान वहीं कहीं अन्न उपजाता है।
जहाँ दुःख और तकलीफ़ बहुत नज़र आती है,
असल में जिंदगी सब कुछ हमें वहीं सिखाती है।
जहाँ, प्रेम, करुणा, दया आदि बातें होती हैं,
'शिशु' असल में दुनियां वहां जाकर रोती है।

बोलिये! क्यों मौन हो?


बोलिये! क्यों मौन हो?
है शमा जब खूबसूरत,
तब 'शिशु' बेचैन हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?
तपतपाती धूप है तो
छाँव मैं बन जाऊंगा।
आँधियाँ आएं तो क्या
दयार मैं बन जाऊंगा।।
है गुज़ारिश एक ये-
मत कहो तुम कौन हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?
हो खुशी का आशियाना,
जिंदगी में ग़म न हो।
आंशुओं के साथ मैं हूँ,
आँख अब ये नम न हो।।
हो उजाला ज़िन्दगी में
दीप में कम लौ न हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?
सात जन्मों की न कसमें,
हों न झूठी कोई रश्में।
इस तरह हो साथ अपना,
हमसफ़र सच हो ये सपना।।
ये सफऱ चलता रहे बस
साल चाहें सौ न हो।
बोलिये! क्यों मौन हो?

Sunday, July 17, 2016

देश गर्त में चला गया फिर बाद में भाड़ को झोकोगे

गंगा, गाय है उनका मुद्दा, जिनका भ्रष्टाचार था।
अब बेकाबू बोल रहे हैं, पहले शिष्टाचार था।।
महंगाई को कोस रहे थे, पीकर महंगा पानी।
हाय हाय के नारे देकर, बोले कड़वी बानी।।
अब सत्ता में आते ही, महंगाई को भूल गए।
जाने कितने ही किसान फांसी पर हैं झूल गए।।
काला धन - काला धन, जो बोले थे जोर से।
युवा जोश में जाग गया था, बहुत सवेरे भोर से।।
सोचा था काले धन में, जो पैसा मिल जायेगा।
मिलने वाले 15 लाख से एक कोट सिल जायेगा।।
अब ट्वीटर पर गाली देते, लेखक लिखने वालों को।
बोल रहे हैं देश द्रोही हैं मारों इन सब सालों को।।
'शिशु' लगा मुँह पर ताला है लिखना कैसे रोकोगे।
देश गर्त में चला गया फिर बाद में भाड़ को झोकोगे।।

अब सत्ता में करते मौज इन्हें न हिलना पड़ता है!

ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।

भ्रष्टाचार विरोधी आँधी अण्णा जी की आयी थी।
उसी विरोधी रैली ने ही कुछ की मौज बनायी थी।।
नेताओं के रहे विरोधी, उनकी हंसी उड़ाते थे।
लोकतंत्र में लोकपाल का सबको पाठ पढ़ाते थे।।
अब सत्ता में करते मौज इन्हें न हिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

आम आदमी दिल्ली वाले हरदम रोते रहते हैं।
काम न करने मोदी देते ऐसा सबसे कहते हैं।।
कहाँ कभी कहते फिरते थे लोकपाल वो लाएंगे।
भ्रष्टाचार ख़त्म होगा तब घूस न कोई खायेंगें।।
मुफ़्त की वाई-फाई खातिर उनसे मिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

ऐसे-ऐसे थे उपदेशक काला धन ही रटते थे।
टीवी की लंबी बहसों से पीछे कभी न हटते थे।।
योगा एक बहाना है बस, ये तो बनिया पक्के हैं।
आज देख के इनकी पूंजी हमसब हक्के-बक्के हैं।।
फटे पार्क में जो कपड़े थे उनको सिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

शाखा वालों ने पब्लिक को ऐसा पाठ पढ़ाया।
कांगेस के दुश्मन से फिर अपना हांथ बढ़ाया।।
कुछ ऐसा हो गया अचंभा सूरज पूरब अस्त हुआ।
भ्रष्टाचारी कांग्रेस फिर इनके आगे पस्त हुआ।
महंगाई के कीचड़ में कमल को खिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

अब महंगाई की बात करो तो रोना रोने लगते हैं।
खड़ी फसल में जोत दुबारा फसलें बोने लगते हैं।
बात वहीं की वहीं रही कुछ बदला हो बतलाओ जी।
कसम तुम्हें है सिया राम की झूठी कसम न खाओ जी।।
ऐसे वैसे मुद्दों में फिर 'शिशु' कोे पिलना पड़ता है।
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है।।

अब सत्ता में करते मौज इन्हें न हिलना पड़ता है!
मुफ़्त की वाई-फाई खातिर उनसे मिलना पड़ता है!
फटे पार्क में जो कपड़े थे उनको सिलना पड़ता है!
महंगाई के कीचड़ में कमल को खिलना पड़ता है!
ऐसे वैसे मुद्दों में फिर 'शिशु' कोे पिलना पड़ता है!
ऐसे हैं हालात देश के हमको लिखना पड़ता है!!!

Sunday, June 26, 2016

हर शख़्स कीमती, किसी का मोल न मोलो।

झूठ जो बोलें, न उनसे झूठ तुम बोलो,
हैं खोलते गर भेद, उनके भेद न खोलो।
मीठी जुबाँ से बात करता है सभी से 'शिशु',
आप भी हर बात में रस कान में घोलो।
क्या हुआ जो साथ चलते हैं नहीं अपने,
ग़ैर हैं तो क्या हुआ कुछ साथ तुम होलो।
लगे न ठेस बातोँ से, न हो कोई कभी रुसवा,
बात जब भी हो, उसे सौ बार तुम तोलो।।
बख्श इज्ज़त, कर सभी का मान और सम्मान,
हर शख़्स कीमती, किसी का मोल न मोलो।

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