Monday, May 14, 2018

धमकाते वे लोग अब जो पहले थे नेक

धमकाते वे लोग अब जो पहले थे नेक,
बाहर से सच्चे दिखें पर अंदर से फेंक।
पर अंदर से फेंक रखें लड़ने की आशा,
मर्यादा को त्याग, बोलते कड़वी भाषा।
'शिशु' कहें वे ही झगड़े-फ़साद फैलाते,
जो आपके जैसे लोगों को हैं धमकाते।

Friday, May 11, 2018

हमारी उम्र का सवाल है तो है...

तुम्हारा ख़्याल है तो है।
हमारी उम्र का सवाल है तो है।।
'शिशु' ख़ुशी में बिताए हैं तुमने दिन,
अब बिछड़ने का मलाल है तो है।
ठहाके मारकर हम भी हंसे थे कभी,
कि, अब रो-रो के बुरा हाल है तो है।
रंग का सरोकार किसी मज़हब से नहीं,
कि, कट्टरपंथी के गाल लाल हैं तो हैं।
क्या हुआ इश्क़ में निबाह न हुआ,
किसी की मजाल दिल में है तो है।

Saturday, May 5, 2018

अन्यथा वह आपका है रास्ता पड़ा।

दुश्मनी से जब कभी भी वास्ता पड़ा,
छोड़ना तब प्यार वाला रास्ता पड़ा।

रात में जब भी कलह की रोटियां खाईं,
छोड़ना तब-तब उसे है नाश्ता पड़ा।

बेंचकर घोड़े हमेशा ले रहा था नींद जो,
देखिये अब इश्क में है जागता पड़ा।

कह रहा था, बर्फ खाने से करो परहेज,
मानता था 'शिशु' नहीं, अब खाँसता पड़ा।

प्यार की यदि बात है तशरीफ़ फरमाएं,
अन्यथा वह आपका है रास्ता पड़ा।

Friday, May 4, 2018

सबसे बड़ा हितैषी

व्यवहार कुशलता की मिशाल और वाणी में मधुरता की चाशनी में डुबोकर बात करना कोई हितैषी चाचा से सीखे, पड़ोसी ने खिसियानी हंसी हंसते हुए पड़ोसी को कोहनी मारी। हितैषी चाचा मोहल्ले के सबसे ज़्यादा चलते फ़िरते पुर्जे के व्यक्ति थे। मोहल्ले के किसी भी कार्य में उनकी दिलचस्पी वैसे ही होती जैसे उनकी पत्नी दूसरे की पत्नियों में लिया करती थीं। किसी भी औरत से अपने घर का कार्य कैसे कराया जाय, यह उनके बाएं हाथ का काम था। बोलती तो ऐसे जैसे टेसू के फूल झड़ रहे हों। और हंसते हंसते ही कब आपसे काम निकलवा लें आपको खुद पता नहीं चलेगा। किसी की मजाल की उनकी मीठी बोली के चलते उनके काम को मना कर दे। ख़ैर ये तो रही इनकी बात अब आगे सुनिये हितैषी चाचा की बात।

एक रात को उन्होंने अपने पड़ोसी 'राजू' जोकि, दूसरी जाति का व्यक्ति था को घर पर बुलाया। दूसरी का इसलिए कि उनको अपनी जाति से ज्यादा दूसरी जातियों में ज्यादा दिलचस्पी थी। इसलिये उन्होंने उस व्यक्ति को कहा कि वह अपने पड़ोसी 'राम' जो राजू की जाति का नहीं है, की जमीन पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर लेता। पहले तो राजू ने उनकी बात को मजाक में लिया क्योंकि राजू और राम में पक्की दोस्ती थी, फ़िर बार बार कहने पर और हितैषी चाचा को अपना हितैषी मानकर मुद्दे पर गंभीर हो गया और लगा चर्चा करने। बात बात में उन्होंने उसे बताया कि कैसे वह शुरुआत करेगा और फिर एक दिन कैसे जमीन पर उसका कब्जा हो जाएगा, क्योंकि गांव और मुहल्ले के सारे जमीन जायदाद के झगड़े निपटाने के कार्य हितैषी चाचा ने ले रखे थे। इसलिये निपटारे के समय ऐसा ही कोई होगा जो उनकी बात को टालेगा। हितैषी चाचा ऐसा उसे इसलिये कहने को बोल रहे थे कि वो उनको अपना सगा हितैषी समझते थे। बात आई और चली गयी। फिर एक दिन उन्होंने उसे दुबारा उकसाया कि वह जमीन पर क्यों नहीं कब्जा कर रहा है?

राजू घर आया अपनी माँ और भाई से बात की, हालांकि उनकी मां को हितैषी चाचा की बात ठीक नहीं लग रही थी, फिर भी उन्होंने बेटे का मन रखने के लिए उसकी हां में हां कर दी। अगले दिन की रात को करीब 11 बजे जब राजू का पड़ोसी राम सो गया तो राजू ने उसके घर के सामने पड़ी जमीन पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया। ईंट रात को आयीं। सीमेंट और लोहा पहले से रखा था। मिस्त्री उनका अपना रिश्तेदार था और लेबर का कार्य करने के लिए उन्होंने अपने अविवाहित भाइयों को लगा दिया।  इससे पहले कि सुबह के चार बजते, कब्जा करने भर के लिए जमीन पर निर्माण कार्य पूरा हो चुका था।

सुबह जब उनका राम जगा निर्माण कार्य देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने बिना देर किए पुलिश चौकी का रास्ता नापा। यहाँ तक कि इस बात की भनक हितैषी चाचा को भी नहीं लगी। राम के पड़ोसी राजू ने इस कार्य के लिए पुलिश को बड़ी रिश्वत दी थी। पुलिश के दो सिपाही सीधी आ धमके और राजू को पकड़ कर चौकी जाने लगे। हितैषी चाचा जैसा चाह रहे थे ठीक वैसा ही हो रहा था। पड़ोसी की माँ भागी भागी यह बताने आ धमकी। उन्होंने कहा किसी भी तरह वह उनके लड़के को पुलिश केस से बचा लें। हितैषी ने इसके लिए कुछ समय मांगा और सीधे पुलिश चौकी का रास्ता नापा।

हितैषी चाचा ने रिश्वतखोर पुलिश से बात की और सौदा तय हुआ। उन्होंने राजू की मां से 15 हज़ार रुपये मांगे, बेचारी ने जैसे तैसे रुपयों का जुगाड़ किया और हितैषी के हवाले किये। हितैषी ने राजू को छुड़ा लिया। राजू ने हितैषी चाचा के गुणगान मोहल्ले में करना शुरू ही किया था कि एक दिन राम ने राजू के पास आकर धीरे से हितैषी चाचा की पोल खोल दी।

हुआ यह था कि हितैषी चाचा ने जो पंद्रह हजार लिए थे उसमें से पुलिश को रिश्वत के तौर पर केवल पांच हज़ार दिए थे, बाकी बचे 10 हज़ार उन्होंने घर में रख लिए थे, क्योंकि रामू को ख़ुद पुलिश वाले ने बताया था कि उसे पांच हज़ार रुपये देकर राजू को छुड़वाया गया था। अब जाकर राजू को समझ आया क्यों हितैषी चाचा उसे रामू की जमीन पर कब्जा करने की सलाह दे रहे थे। ये तो रामू की भलमानसी थी कि वह राजू का दुबारा दोस्त हो गया था। हितैषी चाचा अब किसी दूसरे शिकार की तलाश में इधर उधर भटक रहे थे।

Thursday, April 26, 2018

अनकही बातें।

दर्ज किताबों में होना है, जिनका है कुछ नाम नहीं,
उनको भी होना है जिनका मुल्क में कोई काम नहीं।
बिना वजह की बहसों से, कुछ, लोगों को बांट रहे,
नक़ली बाबा, नक़ली नेता, असली चाँदी काट रहे।
ग़ुर्बत में दिन बीत रहे हैं मेहनत करने वालों के,
'शिशु' किसानों को लाले हैं आज निवालों के।
लोकसभा में लोकत्रांतिक मूल्यों का है अर्थ नहीं,
झूठ मानने वालों मानो, इसमें कोई शर्त नहीं।

Wednesday, April 25, 2018

लाज़िम है परछाईं उनके संग हो गई है...

कली और भौरों में जबसे जंग हो गई है।
तबसे गुलशन की रौनक बेरंग हो गई है।

जलकर राख हो गईं फसलें जबसे खेतों में,
बदहाली ये देख 'स्वयमं' ही दंग हो गई है।

अम्बुद, पवन और भानू में याराना को देख,
लाज़िम  है परछाईं  उनके संग हो गई है।

हथियारों की रौनक जबसे बाजारों में छाई,
तबसे  भूमंडल  में  आम  जंग हो  गई है।

सत्ता में चलता है जबसे एक व्यक्ति का सिक्का,
कोर-कमेटी  ख़ुद-सबकी-सब  भंग हो गई हैं।

Tuesday, April 24, 2018

उससे ज़्यादा दुःखी आज हर नारी लगती है...

ऐसे आते हैं ख्यालात कि रातें भारी लगती हैं,
एक नहीं, दो-चार नहीं, कुल सारी लगती हैं।

सबका बोझ उठाये क्यों हैं घूम रहे भगवान!
पंडित जी बोले ये उनकी जिम्मेदारी लगती है।

शोषित, पीड़ित और कमेरों की हालत बेकार,
उससे ज़्यादा दुःखी आज हर नारी लगती है।

हाक़िम बदले और बदल गए हुक्म चलाने वाले,
मगर गरीबों से तो लूट आज भी जारी लगती है।

हिन्दुस्तान के टुकड़े होने को सदियाँ हैं बीत रहीं,
हिन्दू-मुस्लिम में पर जंग आज भी जारी लगती है।

जाति-व्यवस्था और धर्म पर जब भी करता चोट,
पोंगापंथी, धर्म के ठेकेठारों को ये गारी लगती है।

जब भी भाई-भाई में होते हैं कुछ झगड़े फ़साद,
सबसे ज़्यादा दुःखी घरों में तब महतारी लगती हैं।

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