Friday, November 7, 2008

यानी सभ्य ऊंचे होते हैं और असभ्य नीचे .....


हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत बालकृष्ण भट्ट जी ने नीचपन की एक बहुत अच्छी परिभाषा दी है-‘‘नीचता वहीं बसती है जहां प्रत्यक्ष में ऊंचाई है।’’ बात सौ आने सही है। क्योंकि इसी नीचता से ही ऊंच-नीच शब्द की उत्पत्ति हुई है। गांवों में बाल विवाह के लिए एक दलील दी जाती थी कि लड़कियों के साथ कोई ऊँच-नीच न हो जाये इसलिए उनकी शादी जल्दी करना ठीक होगा। कहा जाता है कि नीचता के कारण आदमी मुंह दिखाने तक के लायक नहीं रह जाता।

एक सार्वभौमिक सत्य यह भी है कि जहां ऊंचाई है वहीं नीचाई है। अमीरी और गरीबी भी इसी के पर्याय हैं। मतलब अमीर ऊंचे हैं और गरीब नीचे हैं। इसलिए अमीर की नजर में गरीब नीच होते हैं। इसी प्रकार असभ्य के लिए भी नीच शब्द का प्रयोग किया जाता है। यानी सभ्य ऊंचे होते हैं और असभ्य नीचे।

आज समाज के चलन में अनुसार ऊँच-नीच का भेद ऐसा चल पड़ा है कि अब उसमें जौ मात्र भी अदल-बदल हो पाना सम्भव नहीं। कहा जाय तो नीच एक प्रकार से गाली बन गया है जैसे राज ठाकरे की नजर में बिहारी नीच हैं और महाराष्ट्रिय ऊंचे हैं। लेकिन बिहारियों और उत्तर भारतियों की नजर में राज ठाकरे नीचता का काम कर रहे हैं। इसलिए राज ठाकरे नीच हैं। खैर इसमें पड़कर समय गंवाना भी नीचता है जैसे कि आजकल इस विषय पर देश के नेता कर रहे हैं।

कहते हैं कि किसी भी गलत काम करने वाले को भी नीच कहा जाता है। होता यह है कि जिसने नीच कहा वह अपने को ऊंचा समझता है। कभी-कभी व्यक्ति नीचता की हद पार कर जाता है। तब उसे नीचपन कहते हैं। नीचपन किसी भी दूसरे योनि के प्रणियों के लिए नहीं वरन मनुष्य मात्र के लिए ही बना है। ऊंची दुकान फीके पकवान भी इसी से बना होगा।

रूपया ऊंच-नीच की भरपूर कसौटी है। जिसने भी रूपये को लात मारकर प्रतिष्ठा का आदर किया वह ऊंचा है और जो रूपये के पीछे पड़कर अपने परिवार, समाज और देश का अहित करता है वह नीच है। ऐसे ही धर्म के लिए भी बोला जाता है जो अपने धर्म का पालन करते हुए दूसरे धर्म के लोगों की भलाई करता है वह ऊंचा है और जो अपने धर्म के लाभ के लिए दूसरे धर्मों को हानि पहुंचाता है वह नीच है। ऐसा अभी हाल ही में उड़ीसा में देखने को मिला।

इसी नीचता पर गोस्वामी तुलसीदास ने कई सारी चौपाइयों का निमार्ण किया देखिये-‘‘नीच निचाई नहिं तजें जो पावे सतसंग’’ (इसका अर्थ है कि नीच मनुष्य अपनी नीचता से बाज नहीं आता चाहे कितनी ही अच्छी संगति में रहता हो)। एक जगह तुलसीदास ने यहां तक कहा कि ‘नवनि नीच के अति दुखदाई, जिमि अकुंस घनु उरग, बिलाई’’ इसका अर्थ यह है कि नीच यदि कभी आकर नम्रता प्रकट करे तो इससे बहुत डर की बात समझना चाहिए। फिर दुबारा एक जगह उन्होंने ऐसा भी कहा है कि ‘‘सठ सुधरइं सतसंगत पाई’’ (सठ यानी नीच क्योंकि मूर्ख व्यक्ति विद्वानों की नजर में नीच होते हैं) इस उपयरोक्त चौपाई का अर्थ है- नीच को नीचता त्यागने के लिए उच्च विचार वाले लोगों के साथ उठना-बैठना चाहिए।

बात सीधी सी एक है कि नीचता कैसी भी हो नीचता ही रहेगी। इसलिए हे मानुष नीचता को छोड़कर ऊंचे उठो। इसे मराठी में कहें तो कुछ ऐसा है-‘‘म्हसून हे माणसांनो नीच ला सोडून वर उठा।’’

Thursday, November 6, 2008

हम, तुम सबमे अच्छे

आप
दोमुंहा सांप
वो सब अक्ल के कच्चे
हम, तुम सबमे अच्छे
तुम सब गधे के पूत
हमीं स्वर्ग के दूत

यही इस समय चल रहा है
पता है इसलिए कि चुनाव का बिगुल बज रहा है

आरोप - प्रत्यारोप के बाण चल रहे हैं,
युध कि तरह चुनाव के ऐलान हो रहे हैं!

अदला बदली तो हमारा गहना है
यह मेरा नही उनका कहना है

पुराने सारे नारे नए में बदल गए
भाजपा के प्रत्यासी बसपा में चले गए

"तिलक तराजू और तलवार उनके मारो जूते चार" कि जगह अब
हाथी नही गणेश है ब्रम्हा विष्णु महेश है,

सौदा पटा तो भी टिकेट कटा नही पटा तो भी टिकेट कटा
हर रोज यही ख़बर है कि उसकी जगह कोई दूसरा प्रत्यासी डटा

घोषणा पत्र को चुनावी एजेंडा कहा जाता है
यही घर घर जाकर हर एक को थमाया जाता है

हरिजन के पैर कोई ब्राम्हण छु गया
राम राम कि जगह जय भीम कह गया

चलो इसी बहाने छुआ - छूत् मिट गया
अपराधी कलुआ इसी से खुश है उसे कोई दूत मिला गया

हमें क्या? हम तो जनता हैं
हमारे साथ सब कुछ यूँही चलता है

भगवान के लिए आप इन्हें ब्यूटीफुल न कहें....


इसमें किंचित संदेह नहीं कि पहले की तुलना में अब महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। पहले के समय में महिलाएं घर की चहारदीवारी से बाहर कदम नहीं रख सकती थीं। उन पर पहरा था। भारतीय कानून की धाराओं की तरह उन पर कई तरह की प्रथाएं लागू थीं। पर्दा प्रथा, सती प्रथा, दहेज प्रथा आदि इसी प्रकार की कई अन्य प्रथाएं इन महिलाओं के लिए ही बनी थीं। इतना ही नहीं उनके पहनावे भी अजीब थे। वे बिना पर्दे के पराये पुरूष के सामने नहीं लायी जाती थीं। पुरानी कहावत ‘औरतों का गहना लज्जा है’ उसी समय की है।

जैसा कि कहते हैं कि बदलाव प्रकृति का नियम है तो अब इस बदलते हुए हालातों में महिलाओं के हालात भी बदले हैं। आज महिला सशक्तिकरण का दौर है। महिलाएं अब पहले की तुलना में काफी आगे आयी हैं। शिक्षा से लेकर नौकरी-पेशे तक उनकी पहुंच है। समाज के किसी भी समारोह में उनकी अगुवाई है। अब स्त्रियांे के आर्थिक रूप से पुरूषों पर निर्भर होने की स्थिति में पिछले कुछ दशकों में भी तेजी से कमी आई है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पहले रोजगार के हर क्षेत्र में पुरूषों का वर्चस्व था, पर अब ऐसा नहीं है।

जाहिर सी बात है इतने सारे बदलावों के चलते उनके पहनावे में भी पहले की तुलना में काफी बदलाव आया है। वही महिलाएं अब सुन्दर दिखने के लिए मंहगे से मंहगे संसाधन प्रयोग में ला रही हैं। ऐसे में अब सुन्दरता की परिभाषा भी बदली है। अंग्रेजी भाषा में सुन्दर को ब्यूटीफुल या स्मार्ट कहा जाता है। पहले के समय हम सुन्दर के लिए इसी ब्यूटीफुल शब्द का प्रयोग करते थे। लेकिन अब इसी ब्यूटीफुल को सेक्सी कहा जाता है।

सुन्दरता के बदलते हुए इस स्वरूप को आज की उभरती हुई नारी को अपनाने में कतई संकोच नहीं है। यह बात नहीं है कि पुरूष इससे पीछे हैं उन्हें भी सेक्सी कहलाये जाने में कोई ऐतराज नहीं लेकिन महिलाएं इस शब्द को कुछ ज्यादा ही तवज्जो दे रही हैं। अब किसी सुन्दर महिला को ब्यूटीफुल कह देने भर से काम नहीं चलेगा। ब्यूटीफुल तो हर कोई है। कौन कहता है हम सुन्दर नहीं? लेकिन सेक्सी कोई ही कोई होता है।

अब इन सेक्सी दिखने वालों के लिए ब्यूटीफुल शब्द यदि भूले से ही इस्तेमाल हो जाए तो समझो तुम्हारी खैर नहीं। इसलिए भगवान के लिए आप इन्हें ब्यूटीफुल न कहकर सेक्सी ही कहें तो ही अच्छा रहेगा। इसी में हमारी और तुम्हारी भलाई है। बस यही मेरी आपसे विनती है।

Wednesday, November 5, 2008

गरीब की लुगाई पूरे गांव की भौजाई।

बात बिल्कुल ताजी है। ताजी इसलिए कि अखबार और मीडिया में यह खबर प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हो रही है। जी हां हम बात कर रहे हैं महाराष्ट्र में हाल की घटित घटनाओं की।

हाल ही में महाराष्ट्र के राज ठाकरे की उत्तर भारतीयों और बिहारियों पर की गयी टिप्पणियों पर गहमा-गहम बहस जारी है। चारों तरफ यही चर्चा है कि कल की मुख्य खबर क्या होगी। और हो भी क्यों न इस महीने की मुख्य खबरों में इसे तवज्जो जो दी गयी है। मुझे तो यहां तक यकीन है कि इस वर्ष के सप्ताहांत के अंतिम दिनों में इस घटना को भी अन्य प्रमुख राष्ट्रीय घटनाओं की तरह प्रमुखता दी जायेगी।

मुझे राज ठाकरे के बयान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं हैं लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि उसके भड़काऊ भाषण और बयानबाजी से बिहारियों और उत्तर भारतीयों के गरीब वर्ग की जनता को बहुत कष्ट उठाने पड़े हैं। उन्हें आर्थिक नुकसान के साथ ही उनके जान-माल को भी काफी नुकसान पहुंचा है। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि इस लूट-खसोट में मनसे के कार्यकर्ताओं के अलावा महाराष्ट्र के उपद्रवी और लुटेरे वर्ग भी संम्मिलित रहे होंगे। उपद्रवी और लुटेरों को तो इसी का इंतजार रहता है। उनकी यही रोजी-रोटी है और यही धंधा।

जैसा कि विदित है कि इन सब घटनाओं से सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और मेहनतकश जनता को हुआ है जो रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर-बार और शहर छोड़कर दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं। वे महाराष्ट्र के बड़े शहरों मुम्बई के अलावा पुना और नागपुर जैसे शहरों में काम-धंधे के लिए जाते हैं। ऐसा नहीं है कि राज ठाकरे के बयान से सेलेब्रटी और अमीर वर्ग को नुकसान नहीं हुआ है, नुकसान उनका भी हुआ है लेकिन वह नुकसान केवल बयान-बाजी तक ही रहा। कहना ठीक होगा कि यह माफीनामे तक ही रहा। इसे क्रिया और प्रतिक्रिया की तरह ले सकते हैं।

देश के इन मेहनतकश और कमाऊ जनता पर अब देश के नेता और राजनेता दोनों ही रोटियां सेकने पर मशगूल हैं। उन्हें तो एक मुद्दा मिल गया जिसका उन्हें हर चुनाव में इंतजार रहता है। वो गठबंधन की इस राजनीति को भली भांति जान गये हैं। सबको पता है कि लोकसभा चुनाव सामने है सेंक लो जितनी रोटियां सेंकनी हैं फिर कंहा ऐसा मौका मिलेगा ! यही उनके बीच चल रहा है।

ये राजनेता एक दूसरे पर छींटाकशी कस रहे हैं। उत्तर भारत के एक प्रख्यात नेता ने तो यहां तक कह दिया कि वे अब ‘निर्दलीय अभियान समिति’ बनाकर पूरे सूबे का दौरा करेंगे और अपना तथा अपनी पार्टी के विधायकों और सांसदों का इस्तीफा दे देंगें। एक दूसरे नेता ने तो राज ठाकरे पर फतवा तक जारी कर दिया। अलग-अलग तरह के नेता अलग-अलग तरह के बयान भी दे रहे हैं। कोई कह रहा है कि वह महाराष्ट्रियों के खिलाफ नहीं है उन्हें तो सिर्फ राज ठाकरे को सबक सिखाना है।

महाराष्ट्र में भी एक अलग तरह की राजनीति शुरू हो गयी है। वहां के नेता भी बयानबाजी में पीछे नहीं हैं। कुल मिलाकर पूरे देश में आजकल मराठी-गैर मराठी, हिन्दी भाषी-गैर हिन्दी भाषी पर चर्चाओं का शोर है। इसका सीधा सा मतलब है वोट की राजनीति।

यह कहना अभी से ठीक नहीं होगा कि इस सस्ती और गंदी राजनीति से किसको कितना फायदा होगा मराठी नेताओं को या बिहारी या उत्तर भारतीय नेताओं को लेकिन इतना जरूर तय है कि इसके चक्कर में गरीब जनता जरूर पिस रही है और आगे भी यही होगा। बड़े बुर्जग सही ही कह गये हैं कि ‘गरीब की लुगाई, पूरे गांव की भौजाई’।

Saturday, October 25, 2008

दीवाली का बोनस

कुछ लोग दीवाली का इन्तजार दीवाली के अगले दिन से दुबारा करने लगते हैं। कारन जो भी हों. इन कारणों पर यदि ज्यादा लिख दिया तो हमारी खैर नही. इसलिए मैं इस बिन्दु पर ज्यादा जोर नही देना चाहता.

ऐसा कहते हैं की भारत एक कृषि प्रधान देश हैं। आज जो किसानो की हालत है वह किसी से छुपी नही है. जो भी अखबार पड़ता हैं न्यूज़ देखता है उसे हो पता ही होगा की किसान कितनी संख्या में आत्महत्या करने पर मजबूर हैं. अब यदि ऐसे में कहा जाए की उनको बोनस मिलता हैं या नही. चर्चा करना बेकार है.

आपने ऐसा कम ही सुना होगा की दीवाली के बाद किसी को बोनस मिला हो. लेकिन यह सत्य है. और वह बोनस देता है किसान अपने बैलों को. उत्तर भारत में ऐसी प्रथा है की दीवाली के अगले दिन बैलों को काम पर नही लगाया जाता. उस दिन उनकी छुट्टी रहती है. किसान खुद भी उस दिन आराम करते हैं. उस दिन किसान अपने बैलों को नहलाता है उनकी पूजा करता है और उन्हें अच्छा से अच्छा पकवान भी खिलाता है. तो अब यदि किसान अपने बैलों को बोनस देता है तो किसानो को भी बोनस मिलना चाहिए ये एक अनुत्तरित प्रशन है.

महिला और विकलांगता

भारत में महिलाओं को लैंगिक रूप से कमजोर समझा जाता है। इसका सीधा सा अर्थ है महिला पुरूष के बराबर काम नहीं कर सकती। उनके पास पुरूषों जैसी आजादी और उतने सामाजिक अधिकार भी नहीं है। इसके लिए वे निरंतर संघर्ष कर रही हैं और इसमें कुछ हद उन्हें कामयाबी भी मिली है। लेकिन मैं यहां पर एक आम महिला की बात न करके विकलांग बालिकाओं और महिलाओं पर लिखने की कोशिश करूंगा।

एक सर्वे से पता चलता है कि भारत में 5 करोड़ विकलांग हैं। जिनमें तक़रीबन 2 करोड़ की संख्या विकलांग महिलाओं की है। जिस समाज में लड़कियां पैदा होना ही अपशगुन माना जाता हो यदि उसी समाज में एक विकलांग बालिका का जन्म हो तो समाज का उनके प्रति दृष्टिकोण क्या होगा इसकी कल्पना करना आसान ही होगा। जिन परिवारों में विकलांग लड़कियों का जन्म होता है उनके ज्यादातर परिवार में कुंठा और निराशा छायी रहती है। उन्हे यही चिंता रहती है कि इस लड़की का क्या होगा। उसका विवाह किस प्रकार होगा, आगे का जीवन वह कैसे काटेगी, किसके सहारे जियेगी। इसी प्रकार और भी बहुत सारे सवालों का जवाब ऐसे परिवारों के पास नहीं होता.

ऐसी विकलांग बालिकाओं की शिक्षा के प्रति परिवार का नजरिया बहुत संकीर्ण होता है। ज्यादातर परिवारों की आपस की राय यही होती है कि उसका पढ़ना-लिखना बेकार है। क्योंकि इन लड़कियों को रोजगार तो मिलने से रहा। ऐसा माना जाता है कि ये परिवार उनकी पढ़ाई की ओर ध्यान न देकर उनकी शादी की चिंता में रहते हैं वे सोचते हैं कि जितना खर्च हम इसकी पढ़ाई पर करेंगे उतना पैसा उसकी शादी में दहेज देकर उसका विवाह किया जा सकता है।

सामाजिक समारोंहों में भी इन विकलांग लड़कियों को नहीं ले जाया जाता। इस बारे में उनकी सोच होती है कि यदि उसे शादी में ले जायेंगे तो परिवार की बदनामी होगी और लड़की के साथ लोग दुव्र्यवहार करेंगे। जिसके कारण इन लड़कियों में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। वे चिड़चिड़ी हो जाती हैं, उनके व्यवहार में रूखापन आ जाता है।

आज आम महिलाएं पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। वे नौकरी-पेशा में हैं, खुद पर निर्भर हैं। यहां तक कि पुरूषों के समान वेतन पर काम कर रही हैं और अच्छें पदों पर भी हैं। वहीं एक विकलांग महिला परिवार के किसी न किसी सदस्य पर निर्भर रहती है। उसे आम जरूरत तक के सामान के लिए परिवार और रिश्तेदारों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है। विकलांग महिलाओं के बारे में आम धारणा यह बनी हुई है कि वह बाहर जाकर काम करने में असमर्थ है। उनकी दलील होती है कि दिल्ली जैसे शहरों में जहां भीड़-भाड़ वाली गलियां हैं, जरूरत से ज्यादा भरी हुई बसे हैं और गुस्सैल बस कंडक्टर हैं। ऐसी जगहों पर आम आदमी भी यात्रा करने से पहले एक बार सोचता है। इन जगहों पर इन विकलांग महिलाओं और बालिकाओं के लिए यात्रा करना कितना कठिन और खतरनाक है। इन सबके बावजूद भी विकलांग महिलाएं यदि काम के लिए निकलती हैं तो उन्हें उचित मजदूरी नहीं दी जाती। समाज इस बारे में उनके साथ भेद-भाव वाला रवैया अपनाता है।

इन विकलांग लड़कियों के परिवारों को उनकी शादी के लिए और भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। समाज की यह सोच है कि एक विकलांग महिला की शादी भी विकलांग पुरूष से होनी चाहिए ताकि वह उसकी भावनाओं की कद्र कर सके, उसकी देखभाल कर सके। यदि किसी विकलांग महिला की शादी आम पुरूष के साथ होती है तो परिवार को बहुत सारा दहेज देना पड़ता है। इसके बाद भी पति और उसके परिवार को यह आशंका बनी रहती है कि वह अपने बच्चे को संभाल पायेगी कि नहीं। इसीलिए इन विकलांग महिलाओं की शादी या तो किसी शादी-शुदा इंसान या किसी बृढ़े इंसान के के साथ कर दी जाती है।

इन सब चीजों के अलावा समाज और परिवार का नजरिया भी उनके प्रति ठीक नहीं होता। परिवार या रिश्तेदारों के ऊपर निर्भर रहने के कारण उनके साथ दुव्र्यवहार किया जाता है। ताने कसना, अपमानित करना और जलील करना तो आम बात है। यहां तक कि उनके साथ ऐसे दुव्र्यवहार किये जाते हैं जो अपराध की श्रेणी में आते हैं जैसे उपेक्षा करना, गाली-गलौच करना, शारीरिक प्रताड़ना देना आदि।

इन विकलांग महिलाओं और लड़कियों कि स्थिति में बदलाव लेन के लिए सरकार और बहुत सी स्वयंसेवी संस्थाएं काफी प्रयास कर रहे हैं। लेकिन समाज को भी एक जिम्मेदराना व्यवहार अपनाना होगा। जब तक समाज और परिवार उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए एक जिम्मेदाराना और व्यवहारिक दृष्टिकोण नहीं अपनाता तब तक यह कहना कि उनके जीवन में बदलाव आयेगा कहना कठिन है।

आज जरूरत है इन विकलांग महिलाओं की पहचान करके उनके लिए जरूरी संसाधन जुटाये जायें। उनको रोजगार और स्वरोजगार दोनों तरह का सहयोग दिया जाये। उन्हें सिलाई-कढ़ाई के अलावा आधुनिक तकनीका का ज्ञान भी दिलाया जाये। इसके अतिरिक्त बहुत से ऐसे और भी काम हैं जिन्हें बैठकर किया जा सकता है जैसे पत्रकारिता, ग्राफिक्स डिजाइंन, आफिस मैनेजमेंट, अध्यापन और सलाहकार आदि में भी उनको शिक्षित किया जाये। इसके बाद हम देखेंगे जैसे ही समाज का नजरिया बदलेगा वैसे ही उनके जीवन में बदलाव आयेगा और वह समाज का एक हिस्सा बनकर आम नागरिक की तरह जीवन यापन कर सकेंगी!

Friday, October 24, 2008

दीवाली के दीप जलें चहुं ओर रोशनी छा जाये

दीवाली के दीप जलें चहुं ओर रोशनी छा जाये
मन मांगी मुराद सबको पावन अवसर पर मिल जाये

पहले दीवाली कैसी थी इसका कुछ मैं वर्णन कर दूं
जी चाह रहा है इसी तरह मन को अपने हलका कर लूँ?

याद आ गये बचपन के दिन
छुटपन के दिन, खुशियों के दिन

कभी पटाके नहीं जलाये क्येकि मुझे डर लगता था
अभी मिठाई अभी मिलेगी हरपल ऐसा लगता था।

यार दोस्त सब मिलजुल कर हम खेल खेलते सुबहो शाम
करते थे ना कोई काम, करते थे ना कोई काम,

गुल्ली-डंडा खूब खेलते, सांझ सुबह का ख्याल नहीं
अम्मा डंडा लेकर आये, बापू की परवाह नहीं

इस प्रकार दिन कट जाते थे, जब तक खुलते स्कूल नहीं
फिर हो जाती थी तैयारी पढ़ने की क्योंकि दिसम्बर दूर नही।

अब दीवाली कहां रही इस बार दीवाला हो ही गया।
यह देश कहां से कहां गया, सेंसेक्स कहां से कहा गया।

अब खेल को गेम बोलते हैं, उसका ही सारा चक्कर है
जो जीत गया वो जीत गया जो हार गया वो कहां गया?

अब शोर-शराबा है ऐसा,
डर लगता है कैसा-कैसा

कहीं पटाके और अनार में कोई बम ना आ जाये
इस हंसती-खिलती दीवाली में मातम फिर ना छा जाये

प्रभु ऐसा उपाय कर दो,
रोशन जग पूरा कर दो

'शिशु' की यही कामना है,
दूजी नहीं ‘भावना’ है।

प्रभु फिर से तुम आ जाओ
किसी वेश में किसी वेश में,
फर्क न पड़ता किसी देश में

इस जग का उद्धार करो
जीवन नैया पार करो

सुख-शान्ति चहुं ओर बिखेरो
सपने सबके खूब उकेरो

मनोकामना पूरी हो
अधंकार से दूरी हो

और रोशनी छा जाये
चहुँदिश खुशियाँ आ जायें।

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यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...