Monday, June 15, 2009

चार दिनों से घंटी वाली मीटिंग में था भाई

चार दिनों से घंटी वाली मीटिंग में था भाई
इसीलिये मन की बातें ना ब्लॉग में हैं कह पाई

घंटी से होती शुरुआत घंटी बजी तो होती रात
घंटी बजते खाना होता घंटी बज जाती तो बात

घंटी वो भी देशी ना थी इसीलिये बैठना जरूरी
कुछ तो अपने मन से बोले कुछ लोगों की थी मजबूरी

घंटी घंटों के हिसाब से अपना काम कराती
जैसे ही कुछ देर करी तो घंटी थी बज जाती

घंटी बोली कार्यालय को रखो व्यवस्थित हर दम
हर मैनुअल को स्वयं बनाओ करो सुचारू हर दम

इस घंटी वाली मीटिंग में कुछ बड़बोले आते
बात सही थी पता ना उनको पर बोले ही जाते

'शिशु' का मकसद था बस इतना आपको यह बतलाऊं
रहा कंहा इतने दिन तक मै सच - सच बात बताऊँ

1 comment:

Vinay said...

वाह-वाह जी वाह!

Popular Posts

आंदोलन

यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...