Monday, September 25, 2017

कुरसठ के चुनाव

कुछ दिन बाद हमारे गांव में नगर पंचायत के चुनाव आने वाले हैं। अंदाजन 40 से पचास लोग चैयरमेन के लिए अपना दावा पेश करेंगे। जिनमें से लगभग 30 लोग एक ही समुदाय से होंगें, और इनमें से लगभग सभी व्यक्ति मोदी जी के पक्के भक्त हैं। हर कोई चाहेगा कि उसके पम्पलेट में मोदी जी का फोटो छपे। कुछ लोगों ने तो अभी से ही बड़े बड़े होडिंग लगा दिए हैं बाकायदा फ़ोटो के साथ। कुछ लौंडे भी मैदान में हैं। उन्होंने ने तो योगी कुर्ता भी पहनना शुरू कर दिया है। दूर से ही प्रणाम करते हैं। इनमें से अधिकतर लौंडों को मैं नाम और शक्ल दोनों से नहीं जानता। लेकिन ज़्यादातर लौंडे मुझे मेरी चाल से पहचानते हैं।

इस बार के चुनाव में भाई भतीजावाद चले ऐसा कम ही है क्योंकि जीतने वाले अधिकतर उम्मीद एक ही समुदाय से होंगे, ऐसा पान की दुकान पर सुना। खैर कोई भी जीते, लेकिन आँकड़ेबाजों की मानें तो यह चुनाव इस बार सिर फुटव्वल तक जाएगा।

कसक देखिये की, हमारे लोग (कुम्हार) आज तक मेम्बर तक का चुनाव नहीं जीते पाए। कई बार खड़े हुए मुंह की खानी पड़ी। ऐसा नही की हमारे वोट नहीं, लेकिन, वो कहते हैं न कि, राजनीति बड़ी कुत्ती चीज है इसलिए हमलोग आधे एक मुहल्ले में कर दिये जाते हैं और आधे दूसरे में।

अब हम ही वो वोटर हैं जो जीत और हार के आंकड़े बिगाड़ सकते हैं इसलिए हम पर सभी ने अभी से डोरे डालना शुरू कर दिया है।

इस बार वोट डालने जरूर जाऊंगा ताकि लाइव देख सकूं। हमारे लिए तो वो क्रिकेट मैच जैसा है। चाय के साथ पकौड़े खाऊंगा और चटकारे लेकर खबरों पर ठठ्ठा लगाऊंगा।

चुनाव के बाद एक लंबा लेख लिखूँगा, रिसर्च पर अभी से कार्य चल रहा है। इसलिए रिसर्च वालिंटियर की आवश्यकता है।

Saturday, September 2, 2017

ख़तम पहले जाति-पांत करें।

अज़नबी ही सही कोई बात करें,
ये सफ़र तय साथ-साथ करें।

दुश्मनी भूल कर दोस्ती से कहो,
नफ़रतों से दो-चार हाँथ करें।

राह में कांटे कंकड़ बहुत हैं यहाँ,
चलो मेहनत दिन और रात करें।

धर्म की बात भी यदि ज़रूरी यहाँ
तो ख़तम पहले जाति-पांत करें।

फ़ोन करते 'शिशु' हैं बराबर, मगर,
वक़्त निकाल चलो मुलाक़ात करें।

Wednesday, August 23, 2017

ज़िन्दगी का नहीं कोई आधार है...

ज़िन्दगी का नहीं कोई आधार है,
गप्पबाज़ी यहाँ अब धुआँधार है।...

झूठ बोलूं न क्यों अब ज़रूरत है ये,
सत्य का आजकल फ़ीका बाज़ार है।

जो गरजते थे कल वो बरसने लगे।
बादलों का लगा देखो अम्बार है।।

शाम से इस शहर में रह भीगता,
सर छुपाने का कोई न आसार है।

मेरे हमदर्द कबसे हैं रूठे 'शिशु',
डाकबाबू न लाया कोई तार है।।

Wednesday, May 24, 2017

रस्म और रिवाज

रस्म एक टोटका है जबकि,
रिवाज में अंधविश्वास की बू आती है।
और धर्म इन दोनों की रक्षक,
वो इन्हें एक साथ आगे बढ़ाती है।।

रस्म और रिवाज़ का विरोध
कोई क्यों नहीं करता है?
क्योंकि व्यक्ति 'आस्था' और
'धर्म' से बहुत डरता है।।

ढोंगी-पाखण्डी इन रस्मों और
रिवाजों के रखवाले हैं।
आस्तिक इनके गुलाम और
'नास्तिक' प्रश्न करने वाले हैं।।

कुछ भी।

रात के सफ़र में आप अकेले नहीं हैं 'शिशु',
चाँद-तारे, हवाओं का कारवां भी साथ है।

उसके प्यार का नशा इस क़दर चढ़ा
'शिशु' अब पीने की नौबत नहीं आती।
इस कदर सँभला हूँ बिगड़कर कि,
मुझमें कोईं सोहबत नज़र नहीं आती।

सोहबत:- वह बात (विशेषतः बुरी बात) जो बुरी संगत के कारण सीखी गयी हो।

शहादत को यूँही कभी भुलाया न जाएगा,
गुनाहगार को कटघरे में लाया ही जाएगा।।
बक्से नहीं जाएंगे जो साँप आस्तीनों में हैं,
उनको पहले ही शूली पर चढ़ाया जाएगा।।

कितनी पी है ख़बर नहीं कुछ,
फिर से कुछ पी लेता हूँ।
रो-रो जीवन कब तक काटूँ,
अब हंस कर जी लेता हूँ।।

गाँव को क़स्बा बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

मील का पत्थर, किनारे पर गड़ा हूँ मैं।
आप गुजरें इस सहारे पर खड़ा हूँ मैं।।

भीड़ है भारी लेकिन हैं बस्तियां सुनसान,
गाँव को क़स्बा बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

प्यार में उसने मुझे क्या देवता बोला,
ख़ुद ही ख़ुद का बुत बनाने पर अड़ा हूँ मैं।

घर के लोगों में मची है लूट चारों ओर,
इन झमेलों में न जाने क्यों पड़ा हूँ मैं।

युद्ध को भड़का रहे हैं धर्म के रक्षक,
शांति के पैग़ाम के अंदर सड़ा हूँ मैं।।

गाँव का होकर गाँव की नहीं!

गाँव का होकर,  गाँव की नहीं,
किसी बिरवे की छाँव की नहीं,
धूल  और  नंगे  पाँव  की नहीं,
नदी,  तालाब,  नाव  की नहीं!
फ़िर किसकी बात लिखूँ 'शिशु'!!

बकरी,  भैंस,  गइया  की नहीं,
चरवाहे  भैया कन्हैया की नहीं,
स्वरचित  गीत  गवैया की नहीं,
छंद,  चौपाई,  सवैया की नहीं!
फ़िर किसकी बात लिखूँ 'शिशु'!!

मुसीबत  के  मारे इंसान की नहीं,
खेत, खलिहान, किसान की नहीं,
लोन, तेल, आटा-पिसान की नहीं,
अपनों के चोट के निशान की नहीं!
फ़िर किसकी बात लिखूँ 'शिशु'!!

छप्पर, बिस्तर , खाट  की  नहीं,
दरवाजे  पर टंगे, टाट  की  नहीं,
अपनों  से मिली डाँट  की  नहीं,
गाँव  के  मेला,  हाट  की  नहीं !
फ़िर किसकी बात लिखूँ 'शिशु'!!

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