Sunday, April 7, 2019

चले आओ, निकालो प्रभात फेरी तुम।


चले आओ, निकालो प्रभात फेरी तुम।
बेख़ौफ़ डालिए वोट, न लगाओ देरी तुम।।

हमारे वोट से जो बैठ गए हो कुर्सी पर।
गुज़ारिश है न उड़ाओ मजाक मेरी तुम।।

तुम्हें रिश्वत से मिली है नौकरी 'ए दोस्त'।
अब हक़ है- 'ख़ूब करो फेराफेरी तुम'।।

तुम सियासतदां हो मियाँ, बात मानेंगे लोग।
सुब्ह को सुब्ह नहीं, कहो रात अंधेरी तुम।।

रास्ते में काँटे डालने का गर शौक़ है तुम्हें।
क्यों उगा रहे हो आम? उगाओ बेरी तुम।।

Sunday, March 31, 2019

सफ़रनामा, भाग-2

मेरा पालन पोषण घोर गरीबी और अभाव में हुआ। मेरे माता-पिता छोटे काश्तकार होने के कारण इतनी कमाई नहीं कर सकते थे कि मैं ग्रेजुएशन की पढ़ाई किसी अच्छी यूनिवर्सिटीज में कर पाता। मेरा चयन लखनऊ विश्विद्यालय में बीए में हो गया था, लेकिन परिवार के ख़र्च न उठा पाने की वजह से मैंने अपना एडमिशन कानपुर विश्विद्यालय के एक बदनाम डिग्री कॉलेज में करवा लिया था। जो नकल के विख्यात था और जहाँ कम फीस थी। वहाँ रिगुलर क्लासेस करने की जरूरत नहीं थी। इसलिए मैं कमाने के उद्देश्य से मेरठ आ गया था।

दिल्ली जाने से पहले मैं मेरठ की पुरानी प्रेमपुरी की जिस गली में मैं रहता था, वहाँ ज़्यादातर लोग चाट मसाले का ठेला लगते थे। हालाँकि कुछ एक लड़के शराबी थे लेकिन उनके बुजुर्ग बड़े मेहनती थे। महिलाएँ पुरुषों से ज्यादा मेहनतीं थीं। वे घर का काम करने के बाद पूरे दिन गोल गप्पे बनाती थीं। हमारी गली गोल गप्पे वाली गली के नाम से मशहूर थी। मेरा कमरा पहली मंजिल पर था, जहाँ मकान मालकिन के लड़के ने कबूतरों के लिए एक दड़बा भी बना रखा था। यह काफी पुराना घर था और अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था। मेरी मकान मालकिन बहुत भली औरत थीं। मैं शारीरिक रूप से अक्षम था, इसलिए मुझ पर सब दया भाव दिखाते। किरायेदार होने के बावजूद भी मुझे वहाँ अपनापन लगता। जब घर की याद सताती तो आंटी से बात कर लेता। मेरे पड़ोसी जब कभी कुछ अच्छा बनाते तो मुझे खाने के लिएअवश्य देते। मुझे उस गली के सभी निवासी बहुत स्नेह देते। मैं उनके छोटे बच्चों को शाम को फ्री ट्यूशन पढ़ाता था। लोगों की आमदनी कम थी। लेकिन दिल बहुत बड़े थे। मैं कमरे में ताला नहीं लगाता था, कारण, एक तो मेरे पास कुछ कीमती सामान न था और दूसरे मुझे वहाँ रहने वालों पर पूर्ण भरोसा था।

मुझे सुबह जल्दी कम्प्यूटर क्लासेस के लिए जाना होता था। चार बजे उठकर अपनी पढ़ाई करता, रोटी बनाता, सब्जी कम ही बनाता था क्योंकि कोई न कोई मुझे दे ही देता। उस घर में कुल मिलाकर 12 लोग रहते थे। घर चार मंजिला था। मुझे प्रतिदिन की चाय वहाँ रहने वाली एक किराये पर रहने वाली आंटी देती थीं। उनके दो बच्चे थे, जो उम्र में बहुत छोटे थे, आंटी अंकल की मृत्यु के बाद पीडब्ल्यूडी में नौकरी करतीं थीं। बड़ी सीधी, मधुर बोलने वाली। वो पंडित थीं लेकिन जाति पाँति में विश्वास नहीं करती थीं।

मैं आने जाने के लिए साइकिल प्रयोग में लाता था। यह साइकिल एक चोर ने मुझे बेंच दी थी जिस पर उसने नीले और लाल रंग से पुलिश लिख दिया था ताकि कोई शक न कर सके। साइकिल बेंचने से पहले उसने मुझे बता दिया था कि यह साइकिल चोरी की है। मुझे चोर की ईमानदारी और उसकी होशियारी बहुत अच्छी लगी थी। बाद में उसने मुझे पैसे वापस कर दिए थे और हम दोस्त बन गए थे। चोर ने मेरे कहने के बाद चोरी छोड़कर साइकिल मिस्त्री की नौकरी कर ली थी। कुछ दिन बाद उसकी एक एक्सीडेंट में मौत हो गई। ऐसे ही अनेकों अच्चे बुरे लोगों से मेरा वास्ता पड़ा।

मेरी कप्यूटर सेंटर कचहरी रोड मोहनपुरी में था। वहाँ से 10 बजे छुट्टी होती। उसके बाद बेगमपुल के पास एक फोटोकॉपी और पीसीओ की दुकान में काम करता था, वहाँ एक कंप्यूटर भी था, जिस पर डीटीपी का काम किया जाता था, शादी कार्ड भी डिजाइन किए जाते थे। मुझे कम्प्यूटर की दुकान पर राजू भइया ने लगवाया था, उनका मेरी जिंदगी बदलने में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। वहाँ मुझे 600 रुपये तनख्वाह मिलती थी। कमरे का किराया 300 था, खाना ख़र्चा करने के बाद भी मैं कुछ पैसे बचा लेता था, जिन्हें जोड़कर मैं अपने गरीब माँ बाप को भेज देता था।

मेरा काम था दुकान खोलना, साफ सफाई, डस्टिंग करना, और जनरेटर के लिए तेल लाना, (उन दिनों मेरठ में बिजली बहुत जाती थी), फिर मैं पानी का जग भरकर रखता और दुकान पर आने वालों के लिए चाय लाता। सुबह से ही फोटोकॉपी वालों की लाइन लग जाती। मेरा मुख्य काम था पीसीओ पर फ़ोन करने वालों को फ़ोन उपलब्ध करना उनका नंबर नोट करना और हिसाब किताब रखना, इसके अलावा फोटोकॉपी सेट बनाना, बाद में फोटोकॉपी करने वाली लड़की नौकरी जब छोड़ गई तब यह काम भी मुझ पर आ गया। कभी कभी फोटोकॉपी मशीन पर दो दो घंटे खड़े रहना पड़ता था। एक पैर से कमजोर होने के बावजूद भी आराम न करता। दुकान के मालिक बहुत अच्छे इंसान थे, वह बैंक से रिटायर बैंक मैनेजर थे। फिर एक दिन अचानक कम्प्यूटर वाला लड़का नौकरी छोड़कर चला गया तब मुझे कम्प्यूटर पर काम करने का मौका मिला। वहाँ मैंने 2 साल काम किया और जब मैं दिल्ली आया तब मेरी सैलरी 2,500 रुपये थी। तब तक मेरा कम्प्यूटर का डिप्लोमा पूरा हो चुका था।

क्रमशः.... अगले भाग में राजू भैया के बारे में।

Friday, March 29, 2019

सफ़रनामा, भाग-1

सफ़रनामा, भाग-1

जब मैं दिल्ली आया था, मयूर विहार फेस वन के पास चिल्ला गाँव मेरा ठिकाना था। गाँव देखकर कहना मुश्किल था कि हम दिल्ली में रहते हैं, सड़कों पर कीचड़ इतना ज्यादा की ऑफिस जाते समय पालिश किए जूते कीचड़ में सन जाते। साल के बारहों महीने सड़कों पर कीचड़। उस समय हमारा गाँव उस गाँव से लाख गुना बेहतर था।  फर्क था तो केवल मकानों का। वहाँ के मूल निवासियों की भाषा हमारी जैसी न थी। मकान मालिक गाय भैंस पालते थे। और बड़े बड़े मकानों में अनगिनित कमरे बनाकर किराए पर उठाते जिससे उनकी धुंआधार कमाई होती थी।  किरायेदार चूहों बिल्ली की तरह रहते थे। दस दस कमरों पर एक बाथरूम, टट्टी पेशाब के लिए लाइन लगानी पड़ती थी। मकान मालिक अपने लिए अलग साफ सुथरा बाथरूम बनाते और किराएदारों के लिए अलग जहाँ सही से रोशनी न आती। मुँह बांधकर बाथरूम जाना पड़ता था। कई बार जैसे ही अंदर जाता कोई कड़ी बजा देता। निकलो बाहर बड़ी जोर की लगी है लोग कहते। हम 3 लोग रहते थे। हमारा कमरा साफ सुथरा था, लेकिन बाथरूम के लिए नीची जाना पड़ता था, भगवान कसम बड़ी चिल्लमपो होती।

जैसे ही उस गाँव से हम बाहर निकलते हमें राहत मिलती, वहाँ चमचमाती सड़कें, सड़क किनारे फुटपाथ, छायादार पेड़ और ऊँची ऊँची इमारते देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता कि हम इसी आसपास के इलाके में रहते हैं।

वहीं समाचार अपार्टमेंट्स के पास मार्किट में मेरा ऑफिस था। जहाँ मैं कम्प्यूटर ऑपरेटर था। बड़े-बड़े पत्रकार, लेखक, आर्टिस्ट, फिल्मों में स्टोरी लिखने वाले, कलाकार, वहाँ आकर कम्प्यूटर पर काम करते थे, मेल लिखते, प्रिंट निकलते, अखबार  निकालते, पत्रिकाएँ  निकालते। हर कोई जल्दी में रहता। उम्र दराज़ लोग फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते। कई बार जब कोई ओल्ड लेडी अंग्रेजी में बात करती तो गाँव की दादी नानी की याद आ जाती। तुलनात्मक रूप से जमीन आसमान का अंतर। लोग विभागीय पत्र टाइप करवाने आते, ज़्यादातर रिटार्यड लोग अपनी पेंशन या बेटे को जो विदेश में रहता था के लिए पत्र मेल लिखवाते। व्यक्तिगत पत्र जिन्हें सार्वजनिक करना ठीक नहीं ऐसे पत्र लिखवाते। कोई कोई अपने बच्चों की याद में भावुक पत्र लिखवाते, हम टाइप करते करते   स्वयं  ही भावुक हो जाते।

हिंदी में लिखा पढ़ी कम ही होती। मैं हिंदी भाषी था, अंग्रेजी में हाथ तंग था, स्पेलिंग मिस्टेक कर देता। कड़ी डाँट फटकार मिलती। किसे हायर किया है, लोग अंग्रेजी में बुदबुदाते। मुझे कोसते, मुझसे काम करवाने से मना कर देते। बड़ी खीज़ होती, हताशा से मन विचलित हो जाता। एक बार एक रिटायर अंकल किसी कंपनी के लिए प्रोजेक्ट लिखवा रहे थे, वो बोल रहे थे मैं टाइप कर रहा था, गलती होने पर जो डाँट पिलाते, नानी याद आ जाते। एक बार तो इतना डाँटा कि बाथरूम में जाकर रोया आया।

वहाँ एक दीदी आती थीं जो एक नामी गिरामी सामाजिक संस्था में बड़े पोस्ट पर थीं। वो अक्सर बच्चों के लिए कहानी लिखवाती थीं। कई अखबारों में लेख और कॉलम लिखती थी। उनका ज़्यादातर काम हिंदी में होता था। मैं जब टाइप करता यदि कोई स्पेलिंग मिस्टेक होती स्वयं से सही कर देता। बड़ा मान देतीं। हमारे बॉस को बोल देतीं उसी बच्चे से ही करवाना। एक दिन बातों बातों में उन्होंने अपने ऑफिस में मुझे नौकरी की पेशकश कर दी। मुझे अजीब लगा, इससे पहले मैंने वहाँ से नौकरी बदलने का कभी सोचा नहीं था। क्यंकि वहाँ मुझे समय पर सैलरी मिलती और सीखने का वह सबसे बड़ा स्थान था। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मैंने वहाँ बहुत कुछ सीखा। सीखने के लिए इससे बेहतर और कोई जगह हो ही नहीं सकती। अगले दिन मैं बहाने से छुट्टी लेकर वहाँ गया और इंटरव्यू दिया। मैं सेलेक्ट हो चुका था और तनख्वाह पहले स्थान से दूनी थी। यहाँ से जिंदगी की शुरुआत हो चुकी थी।

शेष अगले भाग में-

तुमसे है प्यार

ये धरती ये गगन 
फूलो से भरा चमन
कलकल करती नदियाँ 
और उसकी धवल धार
समुद्र की लहरे
जगाये दिल में उदगार
पहाड़ो की ऊँची चोटी
बर्फ का उस पर सिंगार
हाँ मुझे तुमसे है प्यार l
वो बसंत की बहार
पुरवा की रसति बौछार
माटी से आती खुशबु
मन में आये अब कहदु
ऐसा नहीं कोई संसार
जहाँ ऋतुओ का मने त्यौहार
हाँ मुझे तुमसे है प्यार l
जहाँ अतिथि देवो भवः मान
सभी धर्मो का यहाँ सम्मान
जहाँ तरह तरह के व्यंजन
एक दूसरे का पूर्ण अभिनन्दन
संस्कृतियों का जहाँ खजाना
ये यथार्थ सभी ने जाना
स्वर्ग हो धरती का जहाँ
वो है प्यारा हिंदुस्तान
सिखाये जग को सदाचार
हाँ मुझे तुमसे है प्यार l
वेद प्रकाश, मुम्बई, 

Wednesday, March 20, 2019

बरगद

सावन लगने से एक दिन पहले वाली शाम बेहद खूबसूरत लग रही थी, बादल हल्के पीले और आसमान अपने रंग के अनुसार सुर्ख़ नीला था। अचानक पश्चिम से हल्की सी हवा ने बादलों के हाव भाव बदल दिए, पलक झपकते ही पीला रंग कब काले में बदल गया पता ही नहीं चला। हालांकि, उमस भरे मौसम में हवा की नमी से मौसम खुशगवार हो गया लेकिन बादलों का रूप देखकर खेतों में खरीफ़ की निराई कर रहे किसानों के माथे पर बल गिर गए। सभी ने अपने अपने खुरपे, दराती और घास के बंडलों को जल्दी जल्दी समेटना शुरू कर दिया। किसान मुसीबत का अंदाजा लगाने में कई बार हलबुली (जल्दबाजी) कर देते हैं। लेकिन उनके अंदाजे लगभग सही निकलते हैं। 'लगता है आज बारिश कम मुसीबत ज्यादा आने वाली है, किसी ने कहा। सब उस ओर भागे जहाँ इस मुसीबत से अपने साथ अपने जानवरों को भी बचाया जा सकता था।

तब वहाँ एक बरगद का पेड़ उस समय बारिश और धूप के बचाव का देवदूत था। गर्मी में गेंहूँ की कटाई करने के बाद इलाके की किसान वहाँ जमा होते और राशि (गेंहूँ की पौध) को बंडल जिसे बोलचाल की भाषा में बींडा कहा जाता है के लिए जूना वहीं बैठकर बनाए जाते थे। लोग ठठ्ठा मजाक करते और कहावतों और किदवंतियों को सुनते और सुनाते।

बरगद का पेड़ एक घने बाग में था, जहाँ महुआ, आम, शीशम  के अलावा ऐसे अनगिनित पेड़ों का निवास था जिन्हें लोग नाम से नहीं जानते थे, हाँ, कुछ बुजुर्ग इसकी किदवंती थे जिन्हें हर प्रकार के पेड़ पौधों और खरपतवार तक का नाम रटा था। बाग के बीचों बीच एक छोटा तालाब था, जिसमें बरसात में नारगुज़रिया और उसके बाद सेरुआ (नारगुज़रिया की जड़ों में लगने वाला फल) निकलता थे। से बाग के उत्तर बड़े बड़े चक (खेत) थे और दक्षिण की तरफ चकरोट (एक प्रकार की कच्ची सड़क, जिसे इलाके के खेतों के आने-जाने के लिए जाना जाता था)। 

बरगद इस बाग का बड़ा बुजुर्ग था। हालाँकि उसे देखकर कोई बूढ़ा नहीं कह सकता था लेकिन आसपास के गांव बुजुर्गों की याददाश्त के अनुसार सबसे उन्होंने होश संभाला है उसे वैसे ही देखा है। बरगद पर अनेकों घोसले थे, चिड़ियों की चहचहाहट संगीत समारोह जैसा आनंद देती थी।

बरगद पर किसी का साया है ऐसा लोग कहते थे, कोई कोई तो उस साये को देखने का दंभ भी कर चुका था। इस लिए बच्चे तो छोड़िए जवान आदमी भी अकेले जाने से डरता था। यदि बैलगाड़ी लेकर कोई अकेले जाता तो बैलों की लगाम कस देता और दौड़ाते हुए निकल जाता। लेकिन इतिहास गवाह था बरगद के पेड़ के नीचे अब तक किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था।

बरगद की जड़ो को लोग उसकी मूंछें कहते और बसंत के बाद उनमें नई नई लाल और सफेद रंग की नई मुलायम जड़ें जब निकलतीं तो बच्चे उन्हें तोड़कर खाते और अनोखे स्वाद का वर्णन करते। बरगद की डालें उसकी भुजाएं थीं जो किसी दैत्य की तरह फ़ैली थीं। ये भुजाएँ ही चरवाहों, किसानों और राहगीरों को छांव के साथ धूप और गर्मी से निजात दिलातीं। दोपहर ।इन किसान इसके नीचे बैठकर खाना खाते तो किसी फाइव स्टार रेस्टोरेंट से कम न लगता, कुछ लोग जब इसके नीचे भौंरियाँ डालते, आलू भूनते, होरा भूनते तब बरगद के ऊपर निकलता धुवाँ ऐसा लगता जैसे बरगद चिलम पी रहा है।

इस बरगद के पेड़ के नीचे अनुपचारिक शिक्षा की कक्षाएँ चलतीं थीं जहां से कढ़े (अनुभवी) लोग निकलते थे, ऐसी शिक्षाओं को किसी भी विश्वविद्यालय से नहीं सीखा जा सकता। किसानों की पाठशाला यहीं लगती थी, कब किस सीजन में कौन सी फसल।बोना है, निराई कब करनी है, कैसा पता चलेगा कि खेत जोतने वाला हुआ कि नहीं यही बैठकर किसानी करने वाली नई पौध यहीं से शिक्षा पाती थी। चरवाहों के चौगोले यहीं सुनाई देते थे जिन्हें लकड़ी के नक्कारे से कोई गवैया सुनाता तो बरगद हर्ष से खिल उठता।

अबकी जब गाँव गया तो बरगद का पेड़ देखने की बड़ी इच्छा हुई, लेकिन जानकर निराशा हुई कि वह बाग उजड़ गया है, तालाब सूख गया है और बरगद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। चकरोट के किनारे खरपतवार समाप्त हो गई है , लोगों ने आधे चकरोट को अपने अपने खेत में जोत लिया है और ऐसा इसलिए हुआ कि लोगों ने अब पारम्परिक खेती किसानी छोड़कर मशीनों पर निर्भर जो हो गए हैं।

हे बरगद तुम्हें बारम्बार प्रणाम है।

Friday, March 15, 2019

चरवाहा

चरवाहा।
जहाँ आजकल लहलाती धान की फसल दिखाई देती है, वहाँ कुछ समय पहले एक भयानक जंगल था। हाँ जंगल के किनारे एक पगडंडी जरूर थी जहाँ से हिम्मती लोग निकलते थे। इस जंगल में अनेकों जंगली फल मिलते थे जिन्हें खाने के लिए पढ़े लिखे लोगों के मुह में पानी आ जाता था, यहाँ कैथा, इमली, जामुन, आम, महुआ के पेड़ थे लेकिन झरबेरी यहां का मुख्य फल था। वैसे जंगल में अनेकों फूल खिलते थे लेकिन टेसू के फूल जंगल की शोभा बढ़ाते थे। रेहुआ (ऊसर ज़मीन की पपड़ी जमी रेत जिसे ग़रीब लोग कपड़े धोने के लिए इस्तेमाल करते थे) और छोही, गेरुआ (इससे अमीर और गरीब दोनों ही घर की पुताई करते थे) निकलती थी।
जंगल भयानक होने के बावजूद आसपास के गाँव के लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता था। कटीली झाड़ियाँ रौब दिखाती थीं, जेठ की तपती दोपहरी में जंगल से सायं सायं की आवाज आती थी। यहाँ खतरनाक जानवर तो नहीं लेकिन आजकल जिन्हें हम दुर्लभ जानवर कहते हैं वे सब कभी न कभी दिख ही जाते-स्याही, लोमड़ी, नीलगाय, खरगोश आहे बगाहे दिख ही जाते थे, वैसे नट और कंजड़ों ने खरगोश का शिकार करके उन्हें विलुप्त कर रहे थे, नीलगाय किसानों के लिए मुसीबत थीं लोमड़ी और स्याही कौतूहल पैदा करते थे, जंगल दुर्लभ सर्पों, से भरा पड़ा था। नेवला तो ऐसे दिख ही जाते थे। जैसे ही किसी को नेवला दिखता वो सांप और नेवले की लड़ाई देखे जाने की डींग हांक देता। हालांकि कहना मुश्किल था कि किसी ने उनकी लड़ाई देखी भी है। इलाके में ऐसे अनेकों जंगल थे, जहाँ से लोग निकलने के बाद अपने पर गर्व करते थे। लेकिन यह जंगल अपने में अलग था। इसे डंडियाँ कहते थे।
बात उन दिनों की है, जब लोग साझे में खेती करते थे। तब फ़सल से गेहूँ को निकलने के लिए जानवरों द्वारा एक विशेष मशीन द्वारा खींचा जाता था और गन्ने का रस बैलों को कोल्हू में जोतकर निकाला जाता था तथा सिंचाई के परंपरागत तरीके अपनाए जाते थे। उन दिनों गांवों में चाय की जगह सिखन्ना (एक प्रकार का पेय पदार्थ जिसे गुड़ के शरबत से बनाया जाता था और उसमें स्वादानुसार गाढ़े मठ्ठे या दही को मिलाया जाता था।) पीने का चलन था। खेती जीविकोपार्जन का उस समय सबसे अच्छा तरीक़ा था। तब ग़रीब लोग दिल्ली बम्बई नहीं जाते थे। हां, यदि बटाई खेती से बहुत ज्यादा मन ऊब गया तब ज्यादा से ज्यादा मेरठ चला गया। और मजदूरी और रिक्सा चलाने का कार्य करता था। उस समय मनोरंजन के लिये लोग नौटंकी, ड्रामा और नाच देखते थे। धोबिहा नाच, कहरहा नाच, और इसी तरह कितने ही नाच शादियों में आते थे, जिनमें चकल्स होती थी। बेनिबाज़ा भी शादियों की शान बढ़ाता जिसमें आदमी औरत बनकर नाचता था। तब लोग समय के सदुपयोग के लिए सिरबग्घू, लठ्ठबाजी आदि खेलते और सीखते थे। इस खेल में दो लोग खेलते बाकी लोग तसल्ली से उनको देखते। हालांकि ताश के खेल की शुरुआत भी हो चुकी थी लेकिन लोग इसे जुए का खेल मानते थे।
उन दिनों इस जंगल में चरवाही करना चरवाहे गर्व की बात समझते थे। तब पढ़ाई के साथ जानवरों को चराने, घास छीलने और खेत से चारा काटकर लाना कोई शर्म की बात नहीं थी। पढ़े लिखे, सम्पन्न लोगों के बच्चे तक जानवर चराया करते थे। गाय, भैंस दूध देती है इससे फर्क नहीं पड़ता था, तब जानवरों को जंगल ले जाना, तालाब में नहलाना, उसको चूमना, गोबर उठाना, आदि ओछे काम नहीं समझे जाते थे, हालांकि उस समय गौ रक्षकों की भीड़ नहीं थी। तब चरवाहा समझकर आप उसकी जाति का पता नहीं लगा सकते थे।
उस समय किसी गाँव में एक चरवाहा रहता था। अव्वल दर्जे का, इतना हुनरमंद कि अन्य घरों के लोग अपने बच्चों से कहते देखो उसको, सीखो उससे कभी भी भैंस चराने से मना नहीं करता। और होती भी क्यों न वह एक बार चिल्लाता, वापस आ, भैंस दौड़ी-दौड़ी वापस आ जाती। लोग कहते यह जानवरों पर जादू कर देता है। जानवर चराने के साथ ही साथ घास भी छीलने में उस्ताद। लोग बोलते आजकल घास नही है लेकिन ये जरा सी देर में पल्ली भर घास छील लाता। कई बार जानवर चराते चराते भी घास छील लेता और शाम को भैंस के ऊपर रख कर लाता तब रास्ते में प्रश्नों की बौछार लग जाती भाई कहाँ से हाथ मार लाए। वह मुस्करा देता, कहीं से नहीं चाचा, मेंढ पर भैंस चरा रहा था वहीं लगे हाथ छील ली। हां भाई एकदम हरी हरी घास है। लोग ईर्ष्या से मुँह बनाते और तारीफ भी कर देते।
घर से सुबह खा पीकर करीब 11 बजे निकलता, तब शरबत का जमाना था, वो भी मठ्ठा मिलाकर लोग इसे सिखन्ना कहते थे। क्या स्वाद होता। राब या गुड़ मिलाकर इसे बनाया जाता था। लोग कहते थे चरवाहा एक गगरा शर्बत पी जाता है। भगवान जाने इसमें क्या सही है क्या गलत। लोग तो यहाँ तक कहते थे कि इसका पेट अन्य व्यक्तियों की तुलना में काफी लंबा और गहरा है। चरवाहे को कभी किसी ने गुस्से में नहीं देखा, हमेशा मुस्कराहट बिखरी रहती थी। किसी से कोई लड़ाई नहीं। जिसने बोला उससे हँसकर बात कर ली। दोपहर के खाने के लिए वह 4 मोटी रोटी, एक साबुत प्याज और किलहा की खटाई साथ में रख लेता था। उन दिनों पानी लेकर चलने का चलन नहीं था, तब इंसान और जानवर एक ही घाट का पानी पीते थे। तालाब लबालब भरे रहते थे जिसमें नर गुजरिया, कमल सिंघाड़े आदि की बेल भी रहती थी। तब अबके जैसा जमाना नहीं था कि तालाब में पानी ही नहीं। खेतों में भी कुंवें होते थे, पत्ते तोड़कर एक दोना बनाया और जंगल में लगी बेल बांधकर पानी खींच लिया अंजुली बांधकर पानी पी लिया, पानी में इतना ज्वाद कि बिसलरी की बोतल शर्म से दम तोड़ दे।
जब ज्यादा चरवाहे एक साथ हो जाते शर्त लगाकर सिरबग्घू का खेल खेलते, लेकिन शर्त बदकर, कोई जुआ नहीं बस खेल में जीतने की होड़ होती। चरवाहा खेल में इतना उस्ताद कि लोग उससे पहले ही हार मान लेते। कई बार दोपहर में लोग बाली भूनते, चने, मटर का होरा भूनते घर से लहसुन और हरी धनिया का नमक लाते। पत्ते जमा करते और भूनकर खाते, किसान कभी भी खाने के लिए मना नहीं करते थे। बस नुकसान नहीं होना चाहिए। चरवाहा इस काम में इतना उस्ताद कि मजाल कोई जान पाए कि किस खेत से बाली काटकर लाया है या चने कहाँ से तोड़कर लाया है। तब चना चबेना का दौर था। लोग पूरा पूरा दिन इसी से काट देते।
अब जंगल के कटने से चरवाहे विलुप्त हो रहे हैं, लोगों ने जानवर पालना बंद कर दिया है, जो पाल भी रहे हैं वे घर में बांधकर रखते हैं चारा पट्ठा करते हैं,तालाब सूख गए हैं, उन दिनों लोग कमाने शहर कम ही जाते थे। सुना है अब चरवाहा भी यहीं कहीं नोएडा में किसी फैक्ट्री में काम कर रहा है, कुछ दिन पहले मुलाकात हुई थी, बातों बातों में जिक्र हुआ। यादें ताजा हो गईं, काफी भावुक होते होते रह गया। नाम लिखकर व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक करना ठीक नहीं समझा, इसलिए उसे चरवाहा ही लिखा है।
आज ये सब लिखकर स्वयं भी भावुक हो गया हूँ। आप अपने अनुभव भी साझा करें। लिखने से मन हल्का हो जाता है।

Tuesday, March 5, 2019

रविवार की एक घटना

रविवार की एक घटना

बात उन दिनों की है जब मैं 8वीं जमात में पढ़ता था। यह सन 1992 और 6 दिसम्बर की एक छोटी सी घटना है। मेरा विद्यालय लखनऊ शहर के बीचोबीच नक्खास में स्थित था। मुख्य सड़क आलमनगर रेलवे स्टेशन जाती थी। विद्यालय के ठीक सामने यादव डेरी थी, जहाँ आए दिन झगड़ा-झाँसा होता रहता था, झगड़ा दूध में पानी को मिलाकर और झाँसा डेयरी वाला हम बच्चों को देता था, मेरा विद्यालय आवासीय विद्यालय था और हमारे लिए दूध उसी डेयरी से आता था। दूध में आधे से अधिक पानी की मात्रा पहले ही होती थी जबकि, आधा पानी स्कूल के कर्मचारी बाद में मिला देते थे। दूध का दूध और पानी का पानी मुहावरा वहीं से याद हुआ। 

यह वह दौर था जब टीवी का दौर नहीं था। हमारे विद्यालय में केवल दो टीवी थे- एक रंगीन और एक श्वेत श्याम। हॉस्टल वार्डन के यहाँ श्वेत श्याम और प्रिंसिपल साहेब के पास रंगीन टीवी था। हमारे लिए टीवी देखने का एक निर्धारित समय तय था। हम उस समय चिढ़ जाते जब किसी कार्यक्रम के बीच में समाचार आ जाते। तब हमें समाचार का उतना महत्व ज्ञात नहीं था। हाँ, उन दिनों खबरों के लिए अखबार पढ़ना जरूरी था, प्रतिदिन अखबार से एक बुरी और एक अच्छी ख़बर को हिंदी के अध्यापक को पढ़कर सुनाना एक नियम था। मुझे अखबार पढ़ने की लत वहीं से लगी थी। हमारे आवासीय विद्यालय में दो अखबार आते थे एक हिंदी का जिसे कर्मचारी, अध्यापक और बच्चे पढ़ते, दूसरा अंगरेजी का जिसे प्रिंसिपल का बेटा बब्बू पढ़ता था।

भूमिका न बनाते हुए सीधे सीधे मुद्दे पर आता हूँ, अक्सर लोग तारीख़ याद रखते हैं लेकिन दिन नहीं और बाद में तारीख़ को दिन के नाम से उच्चारित करते हैं। लेकिन मेरे लिए वह दिन महत्वपूर्ण था, तारीखें इतिहास में लिख ही ली जाती हैं, लेकिन दिन गुमनाम हो जाते हैं। मेरी घटना दिन से जुड़ी हुई है, इसलिए मुझे याद है उस दिन रविवार था। आवासीय विद्यालय होने के कारण हमारे लिए रविवार भी अन्य दिनों की ही तरह था, प्रातः 4 बजे की घंटी के बाद सुबह की प्रार्थना होती थी, "इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना" फ़िर पढ़ने के लिए बैठना पड़ता था, नियमित सुबह पढ़ाई करना नियम था जिसे बच्चे बखूबी निभाते थे. छः दिसंबर से पहले तक हम बच्चों को मंदिर मस्जिद के मुद्दे के बारे में कुछ भी पता नहीं था। रविवार को कपड़े धोना होता था, हमारे विद्यालय में एक लंबा-चौड़ा दलान था जहाँ काफी मात्रा में नल लगे थे, पानी सुबह 5 बजे से लेकर 9 बजे तक आता था इसलिए कपड़े धोने की होड़ लग जाती, हमें अपनी सादगीपूर्ण ड्रेस से बेहद लगाव था। सफ़ेद शर्ट और सफ़ेद फूल पैंट। साफ़, सफ़ेद कपड़े हमारे विद्यालय की एक पहचान थी, हमारे पड़ोसी हमें उन कपड़ों से पहचानते थे, रंगीन कपड़े न के बराबर पहनते थे, बाहर जाने की सख़्त मनाही होने के बावजूद इसलिए हम जब कभी बाहर जाते भी हमें पहचान लिया जाता और कोई न कोई शिकायत कर देता था।

रविवार को अक्सर हम नक्खास का बाजार देखने निकल जाते, खरीदना कुछ नहीं, केवल मोल भाव करना, दूर से चीजों को देखने भर से मन को अच्छा लगता था। कभे कभी हम दोस्तों के साथ उनको सामान खरीदवाने जाते थे।

रविवार से पहले की कोई भीबघटना की जानकारी हमें नहीं थी। हम बाजार जैसे ही पहुँचे, भोंपू की आवाज़ आने लगी, किसी ने जोर से चिल्लाया अयोध्या में कार सेवक मस्जिद तोड़ रहे हैं, शायद उन्हें फोन से यह ख़बर आई, पुलिश की गाड़ियां सायरन बजाती हुई इधर से उधर दौड़ने लगीं लेकिन बाजार बंद करने की कोई मुनादी नहीं की गई। इससे पहले मैंने मस्जिद तोड़ने की कोई खबर नहीं सुनी थी। हमारे विद्यालय में हिन्दू मुस्लिम और अन्य धर्मों के बच्चे पढ़ते थे, हमें मंदिर और मस्जिद से कोई खास लगाव नहीं था। हम पढ़ाई और मनोरंजन पर चर्चा किया करते थे। हम एक साथ बैठकर खाना खाते, हमने अपने विद्यालय में कभी भी जातिगत, छुआछूत आदि की बातें नहीं सुनी थी।

बाज़ार में कोई चिल्ला रहा था 'देशभर से लाखों की संख्या में पहुंचे कारसेवक मस्जिद तोड़ रहें हैं।' बाजार बंद कर दो कर्फ़्यू लगने वाला है। कर्फ़्यू शब्द पहली बार हमने सुना था। मेरे साथ बाजार में मेरा सहपाठी हबीब था। हबीब उम्र में मुझसे कोई 2 साल बड़ा था, उम्र में बड़ा होने की वजह से उसे मुझसे ज्यादा तजुर्बा था। हबीब ने कहा जल्दी करो हमें कर्फ़्यू लगने से पहले विद्यालय पहुँचना है। अफरा तफ़री मच गई थी। आनन फानन में दुकानें बंद होने लगीं। पीछे से किसी दुकानदार ने आवाज लगाकर कहा इन बच्चों को मैं जानता हूँ ये उस विद्यालय से कोई जाओ इनको इनके स्कूल छोड़कर आ जाओ। फौरन कोई हमारे साथ साथ चलने लगा। हम थोड़ी देर में विद्यालय में पहुँच गए। कर्फ़्यू लग गया था।

हमारे विद्यालय के आसपास मुस्लिम रिहायशी कॉलोनी थी। हम हमारे पड़ोसियों की पतंगबाजी के दौरान खिंचाई करते थे। बब्बू भइया का पड़ोस में कोई चक्कर चलता था वो इशारेबाजी करते थे। हमें इशारेबाजी देखने में मजा आता था। कर्फ़्यू लगने के बाद उसदिन सब अपने अपने घरों में कैद हो गए। हम अपने अपने कमरों में बंद हो गए। अफ़वाह ये थी कि हमारे विद्यालय पर पत्थर बाजी हो सकती है, गोलियां चल सकती हैं इसलिए सबको अपने अपने कमरों में रहना है कमरे बाहर जब भी कोई आएगा विद्यालय का चपरासी उनके साथ होगा। हमें डर लग रहा था। लेकिन कोई भी पत्थर बाजी और गोली की कोई भी आवाज नहीं आई। केवल पुलिश की गाड़ियां इधर से उधर सायरन बजा रहीं थीं। कोई अप्रिय घटना नहीं घटी, हालांकि हम ऐसी घटना का इंतजार कर रहे थे। हमारे मन में कौतूहल था ऐसा कुछ देखने के लिए हम बेताब थे। हमारा रशोइया शाम को आकार खाना बनाता था उस दिन वह नहीं आया। हमारा किचन बाहर खुले मैदान की दीवाल से सटकर था। दीवाल की दूसरी तरफ घनी जनसंख्या वाली मुस्लिम बाहुल्य कॉलोनी थी। डर की वजह से कोई भी खाना बनाने नहीं गया। हमारे पड़ोसी अपने घरों में कैद थे, उनके घरों से हमारे किचन और खाना खाने का दलान साफ दिखाई देता था। हम लाइन में बैठकर खाना खाते और खाना खाने से पहले बहुत तेज आवाज में एक श्लोक बोला जाता था, फिर हम बोलते 'गोविंद जी आइए भोग लगाइए'। उस दिन वे उस आवाज से महरूम थे।

अगले दिन हमें खाने से ज्यादा अखबार की चिंता थी, अखबार नहीं आया, हम टीवी भी नहीं देख पा रहे थे क्योंकि टीवी देखने के लिए हमें छत पर जाना पड़ता जहां प्रधानाचार्य के घर में रखी टीवी हम बाहर से देखते थे। हमारे पड़ोसी नेक थे। लखनऊ से बहुत अप्रिय घटनाएं घटित हुईं लेकिन हमारे पड़ोस में कोई भी बुरी खबर नहीं आई।

शेष अगली कड़ी में....

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