Wednesday, February 15, 2017

असली न लोग रंग किसको लगाऊं मै.....

रंग भी न असली है ढंग भी न असली है,
असली न लोग रंग किसको लगाऊं मै!
रंग किसको लगाऊं मै!

प्यार है दिखावा ही प्रेमिका न अपनी है,
अपनी न भाभी कोई सारी ही मैडम हैं !
रंग किसको लगाऊं मै!

भीड़-भाड़ इतनी है मेला हाट जितनी है,
कौन कौन अपनों है कुछ न समझ आवे है!
रंग किसको लगाऊं मै!

इंग्लिश ही मिलती है देशी का नाम नहीं,
'और हम जैसे लोंगन का यंहा कोई काम नहीं !
रंग किसको लगाऊं मै!

'शिशु' कहें पीने पिलाने का दौर यंहा कन्हा,
जितना मज़ा गाँव में है उतना और कन्हा
रंग किसको लगाऊं मै!

प्रातःकाल करो मतदान, वोट कीमती है जानो।

पाँच साल का समय बहुत है,
यदि कुछ करने की इच्छा है।
अब तक वोटर को नेता से,
मिली भीख में बस भिक्षा है।।

समय के अपराधी होंगे हम,
अब भी नहीं चेतना जागी।
अपना वोट डालने की यदि
ख़ुद में लगन नहीं लागी।।

फिर पीछे से मत कहना,
सब नेता भ्रष्टाचारी हैं।
'शिशु' समझ में ये आयेगा,
बुद्धि भ्रष्ट तुम्हारी है।।

प्रातःकाल करो मतदान,
वोट कीमती है जानो।
लोकत्रंत के इस संगम की
महिमा को सब पहचानों।।
#उत्तरप्रदेश #चुनाव कुरसठ युवा मंच

Monday, February 13, 2017

कविता का शीर्षक आप जो उचित समझें।


बाग़ हुए ग़ायब क्यों-
पसरा खेतों में सन्नाटा है।
क्यों हमने खेती की ख़ातिर
तालाबों को पाटा है?

पगडंडी को काट-छाँट कर
फ़सलें बोयी जाती क्यों?
चरागाह के लिए नज़र अब
भूमि नहीं आती है क्यों?

सड़क किनारे आम और
महुए के पेड़ नहीं दिखते।
क्यों पढ़ने-लिखने वाले अब
इन पर शोध नहीं लिखते?

सुना है विद्यालय, शिक्षा की-
परिभाषा है बदल गयी।
पढ़ने और पढ़ाने वालों की
भाषा भी बदल गयी।।

'शिशु' याद हैं वो दिन,
जब हम विद्यालय जाते थे।
उपयोगी शिक्षा के साथ
ज्ञान प्राकृतिक पाते थे।

याद आ गए बाग़ और वो-
जंगल जिनमें जाते थे।
जहाँ इमलिया, खट्टे बेर
यार-दोस्त संग खाते थे।।

अब विद्यालय के नज़दीक
कोई बाग़ नहीं दिखते।
पर्यावरण प्रदूषण पर अब
बच्चे हैं निबंध लिखते।।

Wednesday, August 17, 2016

'शिशु' गुजरी है वो गुजर गयी,

'शिशु' गुजरी है वो गुजर गयी,
अब अमन चमन में बना रहे।
वो चले गए ग़म बहुत भरा,
दिल प्यार में उसके सना रहे।
पतझड़ में पत्ते गिरते हैं,
पर जड़ के साथ में तना रहे।
अब जीत गए तब कहते हैं,
मंहगाई का पेड़ ये घना रहे।
उनको समझा था नेक हैं दिल,
वो सांप अभी फन फना रहे।

मिलते हैं भीड़ में, और खो जाते हैं।

मिलते हैं भीड़ में,
और खो जाते हैं।
इनमें कुछ ख़ास,
अपने से हो जाते हैं।।
पता ही नहीं क्यों,
हम याद करते हैं।
वो अनजान हैं,
बताने से डरते हैं।
सपनों में खो जाते हैं।
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
कई बार ऐसा होता है
वो आते ही मुड़ते हैं
बिना बात किये ही
एक दुसरे से जुड़ते हैं
फिर अपने आप में खो जाते हैं
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
कहीं धुप में छाता लिए,
कभी बारिश में भीगते हुए।
और चले जा रहे हैं मस्ती में
यूँ ही रीझते हुए।
दिल में खिंचे चले आते हैं
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।
एक हल्की सी आहट,
उनकी वो मुस्कराहट,
ये बंदिशों की रेखा,
'शिशु' पलटकर नहीं देखा।
चलो अब सो जाते हैं।
इनमें से कुछ ख़ास,
अपने हो जाते हैं।

भक्त संग आपिया भी महंगाई का मारा है।

हाय महंगाई है! हाय महंगाई 'शिशु'
शोर चहुँओर सुनायी रहा भोर से।
जाति-धर्म इसका न सभी जन एक हैं,
त्राहि-माम त्राहि-माम सुनो सभी छोर से।।
बड़े बड़े लोग भी दाल-भात बोल रहे,
कितने बेहाल सभी भेद जो हैं खोल रहे।
आते-जाते पैदल ही हेल्थ की दुहाई देते।
अच्छे दिन कहाँ हो, ख़ुदा की ख़ुदाई लेते।
हैं इतने बेहाल, अब होता न गुजारा है,
भक्त संग आपिया भी महंगाई का मारा है।

'शिशु' पान के ऐसे हैं अजब अनोखे किस्से।

बिन चूने का पान चबाकर चौबे बाबा बोले।
बचा-खुचा भी ऐसे बीते जय शिवशम्भू भोले।
लौडे चक्कर लगा रहे हैं सभी पान के खोखा।
घरवालों को चकमा देकर दुकानदार को धोखा।।
चूना कम कत्था है ज्यादा, खाकर बोले कोके,
उधरा पूरा मिल जायेगा, हमका काहे हो रोके।
खाके मीठा पान, पिचकारी थूक की छोड़ी।
घुमि रहे हैं गॉव में शोहदा हंसी हँसे हैं भोंडी।।
'शिशु' पान के ऐसे हैं अजब अनोखे किस्से।
लिखते रहो दोस्तों इसमें अपने भी हिस्से।।

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