Friday, September 14, 2018

इतना अच्छा झूठ, कवि जी किससे सीखा है?

इतना अच्छा झूठ!
कविजी किससे सीखा है?
वाह, वाह की लूट!
कविजी किससे सीखा है?
अच्छा होता अच्छे कवि की
कुछ कविताएं पढ़ देते।
नई विधा में नव शब्दों के
नूतन छंद ही गढ़ देते।
सच कह देता है आलोचक
तब जाते तुम रूठ!
कविजी किससे सीखा है?
आह, वाह की लूट!
कविजी किससे सीखा है?

देशभक्ति की कविताओं में
नफरत भी फैलाते तुम।
रीतिकाल के छंदों में तो
मादकता भर लाते तुम।।
शेर, शायरी, गीतों में तब
क्यों जाती लय छूट!
कविजी किससे सीखा है?
वाह, वाह की लूट!
कवि जी, किससे सीखा है?

कवि मंचो पर झगड़ा-झाँसा
मोल भाव कर लेते हो,
वहाँ शेर जैसा दहाड़ते,
पब्लिक को डर देते हो।
नफरत के काँटे तक में
तुम घुसा रहे हो ठूँठ!
कवि जी किससे सीखा है?

इतना अच्छा झूठ!
कविजी किससे सीखा है?
वाह, वाह की लूट!
कविजी किससे सीखा है?

Sunday, September 2, 2018

इसलिए' पतंग से पेंच आजकल वो लड़ाने लगे हैं।

अजीबोगरीब ख़्वाब आजकल मुझे आने लगे हैं।
और हकीकत में सुबहो-शाम मुझे डराने लगे हैं।।

जिन्होंने पढ़ा नहीं कभी 'सामाजिक विज्ञान' 'शिशु'
वो समाज को 'समाज की परिभाषा' सिखाने लगे हैं!

सरेआम कत्लेआम का इल्जाम था जिन पर कभी,
वो 'इंसानियत' को 'अहिंसा का पाठ' पढ़ाने लगे हैं!

राजनीतिक 'दाँव-पेंच' का शौक जबसे चढ़ा है उन्हें,
तभी' वे आजकल 'पतंग' से पेंच लड़ाने लगे हैं!

बहुत उड़ाते थे दूसरों की खिल्ली 'सोशल मीडिया' में,
अब अपने पर आई तब 'कायदे-कानून' बनाने लगे हैं।

Thursday, August 30, 2018

कबहूँ बैंक के बाबू देते दिलासा।

नरोत्तम दास की प्रसिद्ध कविता 'सुदामा चरित्र' की लयताल पर आधारित है-
सीस पगा न झगा तन में,
प्रभु जाने को आहि बसे केहि ग्रामा।

लाइन लगी कि लगी न लगी,
कि, नोट बदलने की है नहि आशा।
लोग लगे वो लगे कहने-
चहुँओर है छायी घोर निराशा।
नोटबंद से ग़रीब-किसान का'
घाटा हुआ है अच्छा-ख़ासा।
पुलिश बजाती थी लठ्ठ कि,
कबहूँ बैंक के बाबू देते दिलासा।
'मन की बात' रेडियो से कहकर,
'चौकीदार' ने सबको फाँसा।
मीठे-मीठे बोल बोल अब,
वित्त मंत्री जी देते हैं झांसा।
भक्त मंडली श्राप देति 'शिशु'
जैसे देते थे ऋषि दुरवासा।
काला धन है आया नहीं,
कुल बीत गए कितने चौमासा।

Friday, August 24, 2018

इस हद तक गिर सकते लोग ऐसा सोचा नहीं कभी था।

इस हद तक गिर सकते लोग,
ऐसा सोचा नहीं कभी था!

देशप्रेम की भाषा गढ़कर,
आ जाते हैं घर पर चढ़कर,
सब झूठी खबरों को पढ़कर।
मार-पिटाई काम से बढ़कर,
ऐसा पहले नहीं कभी था...
हमने सोचा नहीं कभी था।

गाय हमारी माता कहकर,
भावनाओं में आते बहकर,
भीड़भाड़ में रह-रह रहकर,
मारो, मारो, मारो कहकर,
ऐसा देखा नहीं कभी था।
सोचा ऐसा नहीं कभी था।

इस हद तक गिर सकते लोग
ऐसा सोचा नहीं कभी था।

पूछते सवाल हैं।।

बाढ़ में,
सुखाढ़ में
मदद की दरकार थी,
तब सो रही सरकार थी,
लोग जो बेहाल हैं।
पूछते सवाल हैं।।

Tuesday, August 14, 2018

हौसला-अफजाई में पड़ा रहता है जाने क्यों?

न ही आता उसे कुछ भी, न ही कुछ काम करता है।
देखता हूँ उसे जब भी पड़ा आराम करता है।।

हकीकत को 'शिशु' समझें, मजे में हैं सभी चमचे!
पकाता है जो खाने को उसे बदनाम करता है।।

हौसला-अफजाई में पड़ा रहता है जाने क्यों?
गप्पबाजों के संग बैठा सुब्ह से शाम करता है।

तसल्ली दे रहा तुमको, तुम्हारा भी भला होगा!
कहीं मंदिर, कहीं मस्जिद फ़क़त ये काम करता है।

Monday, July 9, 2018

ख्वाबों पर बंदिश लगा जीना हराम करते हैं

ख्वाबों पर बंदिश लगा जीना हराम करते हैं,
अब ऐसे शख़्स को ही लोग सलाम करते हैं।

जो देते हैं फ़िरक़ा परस्ती को अंजाम 'शिशु',
ऐसे लोगों को हम दूर से ही राम राम करते हैं।

उनको ही वेतन कम मिलता है कार्यालय में,
जो व्यक्ति वास्तव में अधिक काम करते हैं।

जिन माँ-बाप ने मेहनत से पढ़ाया है बच्चों को,
उनके बच्चे ही असल में उनका नाम करते हैं।

मँहगाई है बोलकर सत्ता में आये थे जो कभी,
अब आये दिन चीजों के महंगे दाम करते हैं।।

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