Thursday, April 18, 2019

बचपन की एक याद।


आज से कोई बीस पच्चीस साल पहले की बात है तब दहेज में साइकिल, घड़ी और रेडियो का लेन देन का चलन था। बेटी को विदा करते समय लोग आटा को डेलवा में बाँधकर देते थे, आजकी तरह नहीं बोरी में। साथ ही साथ रंगीन पेटरिया (इसे खजूर की पत्ती और कुश से बनाया जाता था)। तब लड़कियां, महिलाएं कारीगर होती थीं। उन्हें बेजोड़ कला का ज्ञान था। वे ऐसी ऐसी डिजाइन बनाती आजकल के कम्प्यूटर पर बनी डिज़ाइन फेल हो जाए। हाथ से बने बेना (पंखा) का जवाब नहीं होता था। नरई (गेहूं की पौध) को विभिन्न रंगों में रंग कर ऊन से बीनती, आह क्या खूबसूरत कारीगरी होती मन मुग्ध हो जाता। तब बरात में महिलाएं ऐसे ऐसे गीत गातीं कि बराती वाह वाह कह उठते और उन्हें निछावर में पैसे देते।

कलेवा के समय चारपाई पर बैठने वालों से ज्यादा इर्दगिर्द लोगों का जमावड़ा लगा रहता था। एक से बढ़कर एक अनमोल गिफ्ट मिलते, भले ही उनकी कीमत कम हो लेकिन लोग देखकर ही खुश हो जाते, गोल सीसा, चौकोर सीसा, कंघा, बेना, रंगीन डलैय्या, चुटीला, फीता, दीवाल घड़ी, बतासा के साथ मुनक्के, गर्री गोला, छोहरे। भांति भांति के उरमाल (रूमाल) ऐसे ही अनगिनित तोफे जिन्हें देखकर बराती अंदाजा लगाते कि किसकी शादी मैं ज्यादा अच्छी कलेवा हुई। तब पैसे का उतना चलन नहीं था। लिखने वाला हर सामान कॉपी में लिखता। तब कलेवा पर तोफे लिखना हंसी मजाक नहीं था।

बारात के कुछ दिनों बाद जब लड़का विदाई कराने जाता दो तीन लोग और जाते। जो जानबूझकर पांव में रंग लगवाकर आते। सोने का बहाना करते ताकि कोई उनके पैरों में रंग लगा दे और रंग लगने के बाद कहते भाई ये ठीक बात नहीं, ऐसा नहीं करना चाहिए था। और बिटिया के घर के लिए पूड़ी पकवान बांधकर दिए जाते, ताकि घर जाते ही उसे खाना न बनाना पड़े। इसके अलावा पड़ोसियों में उसे वितरित किया जाता। उसे बैना कहा जाता था।

5 से 6 साइकिलें आ रही हैं किसी साइकिल पर डेलवा, किसी पर सूप कोई रेडियो लटकाए है। रेडियो जोर जोर से बज रहा है, तेज धूप में पसीने से तर बतर होकर लोग चले जा रहे हैं। लड़के की साइकिल पर लड़की पीछे केरियल पर मुँह ढके बैठी है। जब तक गाँव का आखिरी घर रहा वो रोती रही, फिर किसी ने बोला अब चुप हो जाओ। न चुप होने पर लड़के ने धमकाया अब कितना रोवोगी। लड़की डरी सहमी बैठी रही, साड़ी चमकदार, ऊपर से शाल, गर्मी में भी पैरों में चप्पल के साथ मोजे। लोग दूर से अंदाजा लगा लेते ये कौन सी जाति के लोग जा रहे हैं। सबका अपना अपना रिवाज था। लाल चप्पल, लाल मोजा, अपने आप जातिगत कहानी बयां कर देता था।

ऐसी ही एक बारात में जब मैं कोई 10 बारह साल का रहा हूँगा विदाई करा के मैं पिताजी की साइकिल पर आ रहा था, अचानक भयानक आंधी तूफान आ गया, साइकिल आगे की बजाय पीछे जा रही, लड़की के घर से अभी कोई 2 किलोमीटर ही चले थे, कोई बोलता वापस चल लें। कोई बोलता वापस जाना अपशगुन होता है। जितने मुँह उतनी बातें, कोई कहता कुछ दूर चलने पर हमारी रिश्तेदारी है वहाँ रुक जाएंगे। लेकिन तिल तिल चलना मुश्किल, सब पैदल चलने लगे, मैं साइकिल पर बैठा रहा पिताजी पैदल ही चल रहे थे। लड़की भी पैदल चल रही थी, अचानक वह रोने लगी। सबसे छोटा मैं ही था मुझसे वह लाज न करती इसलिए पिताजी ने कहा तुम जाकर उसके साथ चलो थोड़ी दूर। जैसे ही मैंने उससे कहा चुप हो जाओ वह और जोर जोर रोने लगी। मैं भी रोने लगा। मुझे रोता देखकर सब हँसने लगे और वह लड़की भी मुस्करा दी। बस यादें हैं। आज भी जब  मेरी मामी मुझे देखती हैं वही किस्सा छेड़ देती हैं।

Monday, April 8, 2019

फूलमती

फूलमती गोबर उठा रही थीं कि अचानक गनेशवा ने जले पर नमक छिड़कते हुए कहा, काहे जिया (दीदी), किसका का गोबर उठाई रही हैं।
फूलमती ने उलझे बालों को झटकते हुए झल्लाकर कहा, नासपीटा कहीं का। गोबर भैंस का हो या गाय का उठाना तो हमें ही पड़ेगा, जा अपने जीजा से पूँछ। गाय पर प्रवचन झाड़ रहे हैं, एक दिन भी बताएं जब गोबर उठाया हो और उस पर गाय और भैंस के गोबर में फर्क भी न कर पाएंगे।
गनेशवा यही तो चाहता था। उसका ये सब सुनकर पेट भरता था। पेट पर हाँथ फेरकर एक लंबी डकार लेकर बोला, जिया हमका काहे गारी दे रही हैं। हमका बिगाड़े हैं। हम सुने हैं कि आप गाय के अलग और भैंस के अलग कंडे पाथथीं हैं, सुना है आजकल गाय वाले बहुत डिमांड में है।
फूलमती ने मुँह बिदकाकर कहा, काहे बाबा रामदेव से डर लगताहै का, सो हमसे पूछ रहा है। फायदा नहीं होता तो क्या ऐसे ही इतना महंगा बिकता। सब बीमारी हजारी इसी से ठीक हो जाती हैं, हाँ नहीं तो क्या?
गनेसवा ने गुटखा फाड़कर मुँह में डाला और असली मुद्दे पर आ गया। तो अबकी बहन जी को जिता रही हो जिया।
काहे तुम्हारी काहे छाती फटी जा रही है, महिला जीत जाए तब भी परेशानी और हार जाए तो चटकारे लेकर उड़ाओ मजाक। तुम बहन..दों को अपनी बहन से नहीं दूसरों की माँ बहनों से से परेशानी है।
गनेशवा थूंक गटककर बोला, तुम से न जीजा जीत पायेंगें न ही यह गाँव। मायके में रहती हैं अबकी परधानी का एलक्शन लड़ जाइए। कोई नहीं हरा पायेगा।
फूलमती हीं हीं करके हंस दीं। गनेशवा ब्रम्ह राक्षस की तरफ बथान से गायब हो गया।

Sunday, April 7, 2019

चले आओ, निकालो प्रभात फेरी तुम।


चले आओ, निकालो प्रभात फेरी तुम।
बेख़ौफ़ डालिए वोट, न लगाओ देरी तुम।।

हमारे वोट से जो बैठ गए हो कुर्सी पर।
गुज़ारिश है न उड़ाओ मजाक मेरी तुम।।

तुम्हें रिश्वत से मिली है नौकरी 'ए दोस्त'।
अब हक़ है- 'ख़ूब करो फेराफेरी तुम'।।

तुम सियासतदां हो मियाँ, बात मानेंगे लोग।
सुब्ह को सुब्ह नहीं, कहो रात अंधेरी तुम।।

रास्ते में काँटे डालने का गर शौक़ है तुम्हें।
क्यों उगा रहे हो आम? उगाओ बेरी तुम।।

Sunday, March 31, 2019

सफ़रनामा, भाग-2

मेरा पालन पोषण घोर गरीबी और अभाव में हुआ। मेरे माता-पिता छोटे काश्तकार होने के कारण इतनी कमाई नहीं कर सकते थे कि मैं ग्रेजुएशन की पढ़ाई किसी अच्छी यूनिवर्सिटीज में कर पाता। मेरा चयन लखनऊ विश्विद्यालय में बीए में हो गया था, लेकिन परिवार के ख़र्च न उठा पाने की वजह से मैंने अपना एडमिशन कानपुर विश्विद्यालय के एक बदनाम डिग्री कॉलेज में करवा लिया था। जो नकल के विख्यात था और जहाँ कम फीस थी। वहाँ रिगुलर क्लासेस करने की जरूरत नहीं थी। इसलिए मैं कमाने के उद्देश्य से मेरठ आ गया था।

दिल्ली जाने से पहले मैं मेरठ की पुरानी प्रेमपुरी की जिस गली में मैं रहता था, वहाँ ज़्यादातर लोग चाट मसाले का ठेला लगते थे। हालाँकि कुछ एक लड़के शराबी थे लेकिन उनके बुजुर्ग बड़े मेहनती थे। महिलाएँ पुरुषों से ज्यादा मेहनतीं थीं। वे घर का काम करने के बाद पूरे दिन गोल गप्पे बनाती थीं। हमारी गली गोल गप्पे वाली गली के नाम से मशहूर थी। मेरा कमरा पहली मंजिल पर था, जहाँ मकान मालकिन के लड़के ने कबूतरों के लिए एक दड़बा भी बना रखा था। यह काफी पुराना घर था और अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था। मेरी मकान मालकिन बहुत भली औरत थीं। मैं शारीरिक रूप से अक्षम था, इसलिए मुझ पर सब दया भाव दिखाते। किरायेदार होने के बावजूद भी मुझे वहाँ अपनापन लगता। जब घर की याद सताती तो आंटी से बात कर लेता। मेरे पड़ोसी जब कभी कुछ अच्छा बनाते तो मुझे खाने के लिएअवश्य देते। मुझे उस गली के सभी निवासी बहुत स्नेह देते। मैं उनके छोटे बच्चों को शाम को फ्री ट्यूशन पढ़ाता था। लोगों की आमदनी कम थी। लेकिन दिल बहुत बड़े थे। मैं कमरे में ताला नहीं लगाता था, कारण, एक तो मेरे पास कुछ कीमती सामान न था और दूसरे मुझे वहाँ रहने वालों पर पूर्ण भरोसा था।

मुझे सुबह जल्दी कम्प्यूटर क्लासेस के लिए जाना होता था। चार बजे उठकर अपनी पढ़ाई करता, रोटी बनाता, सब्जी कम ही बनाता था क्योंकि कोई न कोई मुझे दे ही देता। उस घर में कुल मिलाकर 12 लोग रहते थे। घर चार मंजिला था। मुझे प्रतिदिन की चाय वहाँ रहने वाली एक किराये पर रहने वाली आंटी देती थीं। उनके दो बच्चे थे, जो उम्र में बहुत छोटे थे, आंटी अंकल की मृत्यु के बाद पीडब्ल्यूडी में नौकरी करतीं थीं। बड़ी सीधी, मधुर बोलने वाली। वो पंडित थीं लेकिन जाति पाँति में विश्वास नहीं करती थीं।

मैं आने जाने के लिए साइकिल प्रयोग में लाता था। यह साइकिल एक चोर ने मुझे बेंच दी थी जिस पर उसने नीले और लाल रंग से पुलिश लिख दिया था ताकि कोई शक न कर सके। साइकिल बेंचने से पहले उसने मुझे बता दिया था कि यह साइकिल चोरी की है। मुझे चोर की ईमानदारी और उसकी होशियारी बहुत अच्छी लगी थी। बाद में उसने मुझे पैसे वापस कर दिए थे और हम दोस्त बन गए थे। चोर ने मेरे कहने के बाद चोरी छोड़कर साइकिल मिस्त्री की नौकरी कर ली थी। कुछ दिन बाद उसकी एक एक्सीडेंट में मौत हो गई। ऐसे ही अनेकों अच्चे बुरे लोगों से मेरा वास्ता पड़ा।

मेरी कप्यूटर सेंटर कचहरी रोड मोहनपुरी में था। वहाँ से 10 बजे छुट्टी होती। उसके बाद बेगमपुल के पास एक फोटोकॉपी और पीसीओ की दुकान में काम करता था, वहाँ एक कंप्यूटर भी था, जिस पर डीटीपी का काम किया जाता था, शादी कार्ड भी डिजाइन किए जाते थे। मुझे कम्प्यूटर की दुकान पर राजू भइया ने लगवाया था, उनका मेरी जिंदगी बदलने में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। वहाँ मुझे 600 रुपये तनख्वाह मिलती थी। कमरे का किराया 300 था, खाना ख़र्चा करने के बाद भी मैं कुछ पैसे बचा लेता था, जिन्हें जोड़कर मैं अपने गरीब माँ बाप को भेज देता था।

मेरा काम था दुकान खोलना, साफ सफाई, डस्टिंग करना, और जनरेटर के लिए तेल लाना, (उन दिनों मेरठ में बिजली बहुत जाती थी), फिर मैं पानी का जग भरकर रखता और दुकान पर आने वालों के लिए चाय लाता। सुबह से ही फोटोकॉपी वालों की लाइन लग जाती। मेरा मुख्य काम था पीसीओ पर फ़ोन करने वालों को फ़ोन उपलब्ध करना उनका नंबर नोट करना और हिसाब किताब रखना, इसके अलावा फोटोकॉपी सेट बनाना, बाद में फोटोकॉपी करने वाली लड़की नौकरी जब छोड़ गई तब यह काम भी मुझ पर आ गया। कभी कभी फोटोकॉपी मशीन पर दो दो घंटे खड़े रहना पड़ता था। एक पैर से कमजोर होने के बावजूद भी आराम न करता। दुकान के मालिक बहुत अच्छे इंसान थे, वह बैंक से रिटायर बैंक मैनेजर थे। फिर एक दिन अचानक कम्प्यूटर वाला लड़का नौकरी छोड़कर चला गया तब मुझे कम्प्यूटर पर काम करने का मौका मिला। वहाँ मैंने 2 साल काम किया और जब मैं दिल्ली आया तब मेरी सैलरी 2,500 रुपये थी। तब तक मेरा कम्प्यूटर का डिप्लोमा पूरा हो चुका था।

क्रमशः.... अगले भाग में राजू भैया के बारे में।

Friday, March 29, 2019

सफ़रनामा, भाग-1

सफ़रनामा, भाग-1

जब मैं दिल्ली आया था, मयूर विहार फेस वन के पास चिल्ला गाँव मेरा ठिकाना था। गाँव देखकर कहना मुश्किल था कि हम दिल्ली में रहते हैं, सड़कों पर कीचड़ इतना ज्यादा की ऑफिस जाते समय पालिश किए जूते कीचड़ में सन जाते। साल के बारहों महीने सड़कों पर कीचड़। उस समय हमारा गाँव उस गाँव से लाख गुना बेहतर था।  फर्क था तो केवल मकानों का। वहाँ के मूल निवासियों की भाषा हमारी जैसी न थी। मकान मालिक गाय भैंस पालते थे। और बड़े बड़े मकानों में अनगिनित कमरे बनाकर किराए पर उठाते जिससे उनकी धुंआधार कमाई होती थी।  किरायेदार चूहों बिल्ली की तरह रहते थे। दस दस कमरों पर एक बाथरूम, टट्टी पेशाब के लिए लाइन लगानी पड़ती थी। मकान मालिक अपने लिए अलग साफ सुथरा बाथरूम बनाते और किराएदारों के लिए अलग जहाँ सही से रोशनी न आती। मुँह बांधकर बाथरूम जाना पड़ता था। कई बार जैसे ही अंदर जाता कोई कड़ी बजा देता। निकलो बाहर बड़ी जोर की लगी है लोग कहते। हम 3 लोग रहते थे। हमारा कमरा साफ सुथरा था, लेकिन बाथरूम के लिए नीची जाना पड़ता था, भगवान कसम बड़ी चिल्लमपो होती।

जैसे ही उस गाँव से हम बाहर निकलते हमें राहत मिलती, वहाँ चमचमाती सड़कें, सड़क किनारे फुटपाथ, छायादार पेड़ और ऊँची ऊँची इमारते देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता कि हम इसी आसपास के इलाके में रहते हैं।

वहीं समाचार अपार्टमेंट्स के पास मार्किट में मेरा ऑफिस था। जहाँ मैं कम्प्यूटर ऑपरेटर था। बड़े-बड़े पत्रकार, लेखक, आर्टिस्ट, फिल्मों में स्टोरी लिखने वाले, कलाकार, वहाँ आकर कम्प्यूटर पर काम करते थे, मेल लिखते, प्रिंट निकलते, अखबार  निकालते, पत्रिकाएँ  निकालते। हर कोई जल्दी में रहता। उम्र दराज़ लोग फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते। कई बार जब कोई ओल्ड लेडी अंग्रेजी में बात करती तो गाँव की दादी नानी की याद आ जाती। तुलनात्मक रूप से जमीन आसमान का अंतर। लोग विभागीय पत्र टाइप करवाने आते, ज़्यादातर रिटार्यड लोग अपनी पेंशन या बेटे को जो विदेश में रहता था के लिए पत्र मेल लिखवाते। व्यक्तिगत पत्र जिन्हें सार्वजनिक करना ठीक नहीं ऐसे पत्र लिखवाते। कोई कोई अपने बच्चों की याद में भावुक पत्र लिखवाते, हम टाइप करते करते   स्वयं  ही भावुक हो जाते।

हिंदी में लिखा पढ़ी कम ही होती। मैं हिंदी भाषी था, अंग्रेजी में हाथ तंग था, स्पेलिंग मिस्टेक कर देता। कड़ी डाँट फटकार मिलती। किसे हायर किया है, लोग अंग्रेजी में बुदबुदाते। मुझे कोसते, मुझसे काम करवाने से मना कर देते। बड़ी खीज़ होती, हताशा से मन विचलित हो जाता। एक बार एक रिटायर अंकल किसी कंपनी के लिए प्रोजेक्ट लिखवा रहे थे, वो बोल रहे थे मैं टाइप कर रहा था, गलती होने पर जो डाँट पिलाते, नानी याद आ जाते। एक बार तो इतना डाँटा कि बाथरूम में जाकर रोया आया।

वहाँ एक दीदी आती थीं जो एक नामी गिरामी सामाजिक संस्था में बड़े पोस्ट पर थीं। वो अक्सर बच्चों के लिए कहानी लिखवाती थीं। कई अखबारों में लेख और कॉलम लिखती थी। उनका ज़्यादातर काम हिंदी में होता था। मैं जब टाइप करता यदि कोई स्पेलिंग मिस्टेक होती स्वयं से सही कर देता। बड़ा मान देतीं। हमारे बॉस को बोल देतीं उसी बच्चे से ही करवाना। एक दिन बातों बातों में उन्होंने अपने ऑफिस में मुझे नौकरी की पेशकश कर दी। मुझे अजीब लगा, इससे पहले मैंने वहाँ से नौकरी बदलने का कभी सोचा नहीं था। क्यंकि वहाँ मुझे समय पर सैलरी मिलती और सीखने का वह सबसे बड़ा स्थान था। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मैंने वहाँ बहुत कुछ सीखा। सीखने के लिए इससे बेहतर और कोई जगह हो ही नहीं सकती। अगले दिन मैं बहाने से छुट्टी लेकर वहाँ गया और इंटरव्यू दिया। मैं सेलेक्ट हो चुका था और तनख्वाह पहले स्थान से दूनी थी। यहाँ से जिंदगी की शुरुआत हो चुकी थी।

शेष अगले भाग में-

तुमसे है प्यार

ये धरती ये गगन 
फूलो से भरा चमन
कलकल करती नदियाँ 
और उसकी धवल धार
समुद्र की लहरे
जगाये दिल में उदगार
पहाड़ो की ऊँची चोटी
बर्फ का उस पर सिंगार
हाँ मुझे तुमसे है प्यार l
वो बसंत की बहार
पुरवा की रसति बौछार
माटी से आती खुशबु
मन में आये अब कहदु
ऐसा नहीं कोई संसार
जहाँ ऋतुओ का मने त्यौहार
हाँ मुझे तुमसे है प्यार l
जहाँ अतिथि देवो भवः मान
सभी धर्मो का यहाँ सम्मान
जहाँ तरह तरह के व्यंजन
एक दूसरे का पूर्ण अभिनन्दन
संस्कृतियों का जहाँ खजाना
ये यथार्थ सभी ने जाना
स्वर्ग हो धरती का जहाँ
वो है प्यारा हिंदुस्तान
सिखाये जग को सदाचार
हाँ मुझे तुमसे है प्यार l
वेद प्रकाश, मुम्बई, 

Wednesday, March 20, 2019

बरगद

सावन लगने से एक दिन पहले वाली शाम बेहद खूबसूरत लग रही थी, बादल हल्के पीले और आसमान अपने रंग के अनुसार सुर्ख़ नीला था। अचानक पश्चिम से हल्की सी हवा ने बादलों के हाव भाव बदल दिए, पलक झपकते ही पीला रंग कब काले में बदल गया पता ही नहीं चला। हालांकि, उमस भरे मौसम में हवा की नमी से मौसम खुशगवार हो गया लेकिन बादलों का रूप देखकर खेतों में खरीफ़ की निराई कर रहे किसानों के माथे पर बल गिर गए। सभी ने अपने अपने खुरपे, दराती और घास के बंडलों को जल्दी जल्दी समेटना शुरू कर दिया। किसान मुसीबत का अंदाजा लगाने में कई बार हलबुली (जल्दबाजी) कर देते हैं। लेकिन उनके अंदाजे लगभग सही निकलते हैं। 'लगता है आज बारिश कम मुसीबत ज्यादा आने वाली है, किसी ने कहा। सब उस ओर भागे जहाँ इस मुसीबत से अपने साथ अपने जानवरों को भी बचाया जा सकता था।

तब वहाँ एक बरगद का पेड़ उस समय बारिश और धूप के बचाव का देवदूत था। गर्मी में गेंहूँ की कटाई करने के बाद इलाके की किसान वहाँ जमा होते और राशि (गेंहूँ की पौध) को बंडल जिसे बोलचाल की भाषा में बींडा कहा जाता है के लिए जूना वहीं बैठकर बनाए जाते थे। लोग ठठ्ठा मजाक करते और कहावतों और किदवंतियों को सुनते और सुनाते।

बरगद का पेड़ एक घने बाग में था, जहाँ महुआ, आम, शीशम  के अलावा ऐसे अनगिनित पेड़ों का निवास था जिन्हें लोग नाम से नहीं जानते थे, हाँ, कुछ बुजुर्ग इसकी किदवंती थे जिन्हें हर प्रकार के पेड़ पौधों और खरपतवार तक का नाम रटा था। बाग के बीचों बीच एक छोटा तालाब था, जिसमें बरसात में नारगुज़रिया और उसके बाद सेरुआ (नारगुज़रिया की जड़ों में लगने वाला फल) निकलता थे। से बाग के उत्तर बड़े बड़े चक (खेत) थे और दक्षिण की तरफ चकरोट (एक प्रकार की कच्ची सड़क, जिसे इलाके के खेतों के आने-जाने के लिए जाना जाता था)। 

बरगद इस बाग का बड़ा बुजुर्ग था। हालाँकि उसे देखकर कोई बूढ़ा नहीं कह सकता था लेकिन आसपास के गांव बुजुर्गों की याददाश्त के अनुसार सबसे उन्होंने होश संभाला है उसे वैसे ही देखा है। बरगद पर अनेकों घोसले थे, चिड़ियों की चहचहाहट संगीत समारोह जैसा आनंद देती थी।

बरगद पर किसी का साया है ऐसा लोग कहते थे, कोई कोई तो उस साये को देखने का दंभ भी कर चुका था। इस लिए बच्चे तो छोड़िए जवान आदमी भी अकेले जाने से डरता था। यदि बैलगाड़ी लेकर कोई अकेले जाता तो बैलों की लगाम कस देता और दौड़ाते हुए निकल जाता। लेकिन इतिहास गवाह था बरगद के पेड़ के नीचे अब तक किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था।

बरगद की जड़ो को लोग उसकी मूंछें कहते और बसंत के बाद उनमें नई नई लाल और सफेद रंग की नई मुलायम जड़ें जब निकलतीं तो बच्चे उन्हें तोड़कर खाते और अनोखे स्वाद का वर्णन करते। बरगद की डालें उसकी भुजाएं थीं जो किसी दैत्य की तरह फ़ैली थीं। ये भुजाएँ ही चरवाहों, किसानों और राहगीरों को छांव के साथ धूप और गर्मी से निजात दिलातीं। दोपहर ।इन किसान इसके नीचे बैठकर खाना खाते तो किसी फाइव स्टार रेस्टोरेंट से कम न लगता, कुछ लोग जब इसके नीचे भौंरियाँ डालते, आलू भूनते, होरा भूनते तब बरगद के ऊपर निकलता धुवाँ ऐसा लगता जैसे बरगद चिलम पी रहा है।

इस बरगद के पेड़ के नीचे अनुपचारिक शिक्षा की कक्षाएँ चलतीं थीं जहां से कढ़े (अनुभवी) लोग निकलते थे, ऐसी शिक्षाओं को किसी भी विश्वविद्यालय से नहीं सीखा जा सकता। किसानों की पाठशाला यहीं लगती थी, कब किस सीजन में कौन सी फसल।बोना है, निराई कब करनी है, कैसा पता चलेगा कि खेत जोतने वाला हुआ कि नहीं यही बैठकर किसानी करने वाली नई पौध यहीं से शिक्षा पाती थी। चरवाहों के चौगोले यहीं सुनाई देते थे जिन्हें लकड़ी के नक्कारे से कोई गवैया सुनाता तो बरगद हर्ष से खिल उठता।

अबकी जब गाँव गया तो बरगद का पेड़ देखने की बड़ी इच्छा हुई, लेकिन जानकर निराशा हुई कि वह बाग उजड़ गया है, तालाब सूख गया है और बरगद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। चकरोट के किनारे खरपतवार समाप्त हो गई है , लोगों ने आधे चकरोट को अपने अपने खेत में जोत लिया है और ऐसा इसलिए हुआ कि लोगों ने अब पारम्परिक खेती किसानी छोड़कर मशीनों पर निर्भर जो हो गए हैं।

हे बरगद तुम्हें बारम्बार प्रणाम है।

Popular Posts

आंदोलन

यह बात सन 1994 की है। उस समय मैं लखनऊ के एक आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन हॉस्टल में बच्चों को खराब खाना परोसे जाने को...