Sunday, July 12, 2020

जब एक गदहिया कुम्हार ने निरुत्तर कर दिया था-

जब एक गदहिया कुम्हार ने निरुत्तर कर दिया था-

तो इसमे बुरा कहाँ सरकार
पढ़ा जो सोलह दूनी आठ।
जमाता हूँ गदगे पर ठाठ...

शहर में ख़ाक कमाते हो,
गाँव तो खाली आते  हो।
बिना  मूँछों  के  मुँहचोट्टा,
नज़र तक जाली आते हो।।
रात में पीकर मैं अद्धा-
खुले में सोता डाल के खाट।
पढ़ा जो सोलह दूनी आठ।
जमाता हूँ गदहे पर ठाठ...

शहर में प्रतिदिन ही बेचैन-
बॉस के सुनते कड़वे बैन।
मोहमाया में पड़कर आप-
न लेते पलभर तक का चैन।।
खरीदा तो क्या है गद्दा-
नींद के लिए चाहिए टाट।
पढ़ा जो सोलह दूनी आठ।
जमाता हूँ गदहे पर ठाठ...

साथ में क्या ले जाएंगें?
कमाएंगे, क्या पाएंगें?
अधिक से अधिक यही होगा-
दाल रोटी ही खाएंगें।
बुरा तुम मानो पर दद्दा-
अंत में उठ जाती है हाट।
तो इसमे बुरा कहाँ सरकार
पढ़ा जो सोलह दूनी आठ।
जमाता हूँ गदहे पर ठाठ।।

Saturday, July 11, 2020

ट्रक शायरी-1


भाँग,  धतूरा, गाँजा  है, माचिस,  बीड़ी-बंडल भी।
चिलम, जटाएँ, डमरू है, कर में लिए कमंडल भी।।
गंगाजल की  चाहत में  क्यूँ  होते  हलकान  'शिशु'।
कोरोना का काल भयानक,  घूम रहा भूमंडल भी।।

ट्रक शायरी-2
कार  चलना  सीख  रहा है,  स्कूटी तो  सीख गया।
संभल न पाता लेकिन साइकिल तक का हैंडल भी।
मामूली  ख़रोंच थी लेकिन, टांकें  पंद्रह  बीस लगे।
साइकिल सीख रहा था जब टूटी चप्पल सैंडल भी।।

पाला पड़ा गपोड़ों से।डर लग रहा थपेड़ों से।।

पाला  पड़ा  गपोड़ों  से।
डर  लग रहा थपेड़ों  से।।

अर्थव्यवस्था  पटरी  पर
आई  चाय  पकौड़ों  से।

बच्चे बिलखें कलुआ के,
राहत   बँटी  करोड़ों  से।

जीत गए फिर से खच्चर,
शर्त  लगाकर  घोड़ों  से।

जो  ठोकर  के  आदी  हैं,
उनको क्या डर रोड़ों  से।

अँग्रेजी सीख रहा हूँ-😊



बॉरोइंग  ड्यूज़  रखता   हूँ।
ज़ुबाँ    एब्यूज़   रखता   हूँ।।
 
वर्क  पेंडिंग  रहे  कुछ  दिन,
ख़ुद को कन्फ्यूज़ रखता हूँ।

माइजर    संग   मक्खीचूस,
बर्फ़  तक  यूज्ड  रखता  हूँ।

कहीं  ज़्यादा  न  बिल आए,
बल्ब  भी  फ़्यूज  रखता  हूँ।

ख़बर  झूठी  न  दिखला  तू,
न्यूज़  की  न्यूज़  रखता  हूँ।

©शिशु #नज़र_नज़र_का_फ़ेर

शब्दार्थ–
Borrowing: उधारी
Dues: देय राशि न देना
Abuse: ग़ाली गलौच
News: ख़बर
Pending: टालना
Confuse: भ्रम में रहना
Miser: कंजूस
Used: पहले से प्रयोग की गई
Fuse: बेकार

Wednesday, June 17, 2020

क्या होगा भविष्य भारत का स्वयं लेखनी पड़ी हो-राम सिंह 'प्रेमी'

----------एक गीत----------

मल्लाहों की मक्कारी से नाव भँवर में डूब रही जब,
क्या होगा भविष्य भारत का स्वयं लेखनी पड़ी हो।।टेक।।

पदलिप्सा की मोह निशा में शासन तंत्र हुआ जब अंधा,
लोकतंत्र के मूल्यों की हत्या करना ही हो जब धंधा, 
शांत प्रदर्शन सत्याग्रह पर भी जब दमन चक्र हो चलता,
आतंकी दानवता का शिशु जब अपहरण गर्भ में पलता,
हिंसा भ्रष्टाचार दलाली शासन के पर्याय बने जब,
संविधान का दम घुटता जब गिनता अपनी मौत घड़ी हो--

शासन ने ही वोटों के हित हिन्दू-मुस्लिम को भड़काया,
तुष्टिकरण के ही चक्कर में मन्दिर-मस्जिद विष फैलाया,
पंथ सम्प्रदायों के पीछे जाता मानव धर्म ढकेला,
कूटनीति के पाँसों में जब राष्ट्र धर्म बनता सौतेला,
अपनों के ही हाथों से जब अपनों की ही गर्दन कटती,
जब मानव-मूल्यों की हत्या करने की बेअंत कड़ी हो-----

सदनों में आपस में ही जब करते सभी घिनौनी बातें,
और वहाँ जब बात बात पर प्रचलन में हों जूता लातें,
राष्ट्र नायकों का जनहित से हो जाता है जब उच्चाटन,
बिना बनी ही सड़कों का जब मंत्री जी करते उद्घाटन,
मर्यादा जब बनी भिखारिन सरकारी योजना खोखली,
ठौर ठौर जब राजनीति में अपराधों की लगी झड़ी हो-----

राष्ट्र समस्याओं की उलझन पहले जैसी बनी हुयी है,
तालमेल के रंग बाहरी घात भीतरी घनी हुयी है,
जाति धर्म दल प्रान्त भेद की शाल विषैली तनी हुयी है,
राष्ट्र धर्म में सम्प्रदाय की तुच्छ भावना सनी हुयी है,
जब संकुचित स्वार्थ की आँधी नैतिकता के मूल्य ढहा दे,
प्रजातन्त्र की लाश घिनौनी जब कुर्सी के तले गड़ी हो----

झोपड़ियों में सदा मोहर्रम सदनों में जब दीवाली हो,
शाख शाख पर बैठे उल्लू सूख रही जब हर डाली हो,
राजनीति के पण्डे ही जब सदाचार की कब्र बना दें,
मानवता, ईमान,न्याय की लाशें जब उसमें दफ़ना दें,
जनता का जनसेवक पर से 'प्रेमी'जब विश्वास हट गया,
जब शासन की काया रोगी राजनीति की देह सड़ी हो-----

क्या होगा भविष्य भारत का स्वयं लेखनी मौन पड़ी हो,
मल्लाहों की मक्कारी से नाव भँवर में डूब रही जब,
क्या होगा भविष्य भारत का स्वयं लेखनी मौन पड़ी हो।।

Sunday, May 10, 2020

सब रिश्तों से बढ़कर तुम,रिश्तों की पुरवाई माँ...!

सब रिश्तों से बढ़कर तुम,
रिश्तों की पुरवाई माँ...!

तुमसे खेत, तुम किसान माँ।
मेरे घर का राष्ट्रगान माँ।।
सुख-समृद्धि सब तुमसे है,
छप्पर-छानी और मकान माँ।
मेरा पहला विद्यालय हो,  
तुम ही विद्यामाई माँ...!

सब रिश्तों से बढ़कर तुम,
रिश्तों की पुरवाई माँ...!

सुर, लय, राग, तराना माँ।
भजन, कहानी, गाना माँ।।
त्यौहारों की रौनक तुमसे,
भोजन, पानी, दाना माँ।।
पाककला में सबसे माहिर,
लगता तुम हलवाई माँ...!

सब रिश्तों से बढ़कर तुम,
रिश्तों की पुरवाई माँ...!

#शिशु #नज़र_नज़र_का_फ़ेर #माँ

Monday, May 4, 2020

घंटा


आज एक पुरानी याद आ गई। हमारे समय प्राइमरी पाठशाला कुरसठ बुजुर्ग में पढ़ने वाले हर बच्चे की ये इच्छा होती थी कि स्कूल बंद होने की घंटी वे बजाएं। हर बच्चा समय से पहले तैयार रहता था, लेकिन समस्या ये थी कि तब घड़ी किसी-किसी अध्यापक के पास होती थी। आदरणीय मुरारीलाल दीक्षित जी हमारे प्रधानाचार्य थे। उनके हाथ में पीतल की एक घड़ी बंधी रहती थी। सफ़ेद ढीला कुर्ता पायजामा, ऐनक और वह पीतल की घड़ी उनके व्यक्तित्व की शोभा बढ़ाती थी। उनके अलावा उस स्कूल में कुल पाँच अन्य अद्यापक भी थे, श्री सोबरन लाल जी, श्री अहिबरन जी, श्री पांडेय जी, श्री राठौर जी (जलिहापुर वाले) और श्री मूलचंद जी।

हमारी क्लास चबूतरे के नीचे नीम के पेड़ के नीचे लगती थी और पाँचवी कक्षा के बच्चों को विद्यालय के पक्के कमरे में बिठाया जाता था। वह घण्टी भी इसी कक्षा की शोभा बढाती थी। इसलिए उसे बजाने के ज़्यादा मौके पाँचवी कक्षा के बच्चों को ही मिलता था। लेकिन सर्दी के दिनों में उनकी क्लास भी चबूतरे पर लगती तब अन्य क्लास के बच्चों को भी मौका मिल जाता। 

हमारी कक्षा के बच्चों ने घड़ी से मिलान करके दीवाल की परछाईं को एक निशान से सेट कर लिया था फिर क्या जैसे ही परछाई वहां आती उससे पहले ही बच्चे वहां जमा हो जाते और छीनाझपटी करके घंटी बजा देते। एक दिन घंटा समय से पहले ही बज गया। जैसे ही घंटी बजी सभी बच्चे धमाचौकड़ी मचाते हुए भाग खड़े हुए। बाद में पता चला कि दिन छोटे बड़े के चक्कर में परछाई ने अपना समय बदल दिया था...

आज हमारे मुहल्ले के एक शरारती लड़के ने भी यही कारस्तानी कर दी और साढ़े चार बजे ही थाली पीट दी, फिर क्या सभी लोग उसके सुर में सुन मिलाने लगे, किसी ने भी घड़ी देखने की जहमत न उठाई जबकि अब सबके घर में घड़ी, मोबाइल है तब।

अभी अभी ख़बर पढ़ी है कि, कई जगह कुछ देशभक्तों ने घण्टा बजाने की प्रशंसा में रैली निकाली है, सब गुड़ गोबर कर दिया। क्या कहें, हिंदुस्तान का आदमी घंटा नहीं सुधारने वाला मोदी जी कितनी ही घंटी बजवा लें!

#कोरोना #को_रोना

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